Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

लालू प्रसाद के राजनीतिक भविष्य पर एक आकलनः अंत या अंतराल…

By   /  October 26, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-उर्मिलेश “उर्मिल”||

दस मार्च 1990 को मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में किसी सितारे की तरह उभरे. इससे पहले वे विधायक, सांसद और विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके थे. लेकिन उनकी छवि एक हंसोड़ किस्म के युवा नेता की थी. उन्हें बड़े राजनीतिज्ञों के बीच बहुत गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाता था. जब उन्होंने सन 1990 के चुनाव के बाद अपनी पार्टी के विधायक दल के नेता (मुख्यमंत्री बनने के लिए) पद का चुनाव लड़ने का फैसला किया तो शुरू में लोगों ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी. पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास जैसे दिग्गज इस पद के दावेदार थे और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह का समर्थन प्राप्त था. तब वीपी सिंह अपने दल ही नहीं, “देश की राजनीति में राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ जैसी जनप्रिय छवि के साथ छाये हुए थे. उनके उम्मीदवार को हराना कोई आसान नहीं था.Lalu-yadav

लेकिन लालू ने देवीलाल-शरद यादव समर्थित प्रत्याशी के तौर पर पार्टी के अंदरूनी चुनाव में दास को हरा दिया. कहा जाता है कि चंद्रशेखर ने भी लालू की मदद की. दूसरों के समर्थन से सियासत में जगह बनाने वाले वही लालू महज एक साल में इस कदर उभरे कि बिहार में उनके आकर्षण के आगे बड़े-बड़े फिल्मी सितारे भी फीके पड़ने लगे. यह उनके वायदों और संकल्पों का चमत्कार था. सवर्ण-सामंती उत्पीड़न से त्रस्त बिहार की दो तिहाई से अधिक आबादी को सामंती वर्चस्व को इस तरह चुनौती देने वाला नेता पसंद आया.

शुरू में उन्होंने कुछ करके दिखाया भी. रथयात्रा पर निकले भाजपा नेता आडवाणी को 23 सितंबर 1990 को समस्तीपुर में गिरफ्तार कराया. लोकप्रियता की लहरों पर सवार लालू ने 1991 के संसदीय चुनाव में बिहार में लोकसभा की 54 में 31 सीटों पर अपनी पार्टी को विजय दिलायी. अपने आपको उनका गॉडफादर-गाइड-फिलॉसफर बताने वाले दिग्गज लोकदली-जनतादली नेता भी हैरत में थे.

लेकिन समय बहुत निर्मम होता है. महज सात साल में ही उनका आकर्षण फीका पड़ने लगा. उनके शब्द और कर्म में लोगों को फर्क नजर आने लगा. सन् 1997 में भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तारी का वारंट जारी होने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा और अब 2013 के 30 सितंबर को अदालत ने उन्हें उस मामले में कसूरवार साबित किया. अब वे जेल में सजा काट रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल है, क्या बिहार में उनकी सियासत के अध्याय का अंत हो गया या एक अंतराल के बाद वापसी संभव है? इस सवाल का जवाब “हां’ या “ना’ में नहीं हो सकता. इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ वर्षों से बिहार में उनका जनाधार क्रमशः कमजोर होता गया है. संसद की 31 सीटों पर जीत दर्ज कराने वाले लालू के खाते में पिछले संसदीय चुनाव में महज चार सीटें आयीं. इस से बात बिल्कुल साफ है. लेकिन ताजा घटनाक्रम और बिहार के बदलते राजनीतिक समीकरण में भाजपा से अलगाव के बाद जद(यू) भी कमजोर हुआ है. महानगरों-शहरों में अवस्थित सिविल सोसायटी और शहरी मध्य वर्ग के लिए लालू भ्रष्टाचार के मामले में सजा पाये कैदी भर हैं. यह वर्ग उन्हें खत्म हुआ मान रहा है. महानगरों के शहरी मध्य वर्ग की तरह बिहार के सवर्ण-मध्य वर्ग और भूस्वामी वर्ग को भी ऐसी ही उम्मीद है. लेकिन बिहार में अपने बचे हुए जनाधार में उन्हें अब भी खलनायक नहीं समझा जा रहा है. ऐसे समुदायों को लगता है कि चुनावी राजनीति में लालू न तो पहले भ्रष्टाचारी हैं और न आखिरी होंगे.

लालू प्रसाद की सबसे बड़ी ताकत है उनका जबर्दस्त कम्युनिकेटर होना और सबसे बड़ी कमजोरी है उनका तदर्थवादी और टीमवर्क-विहीन होना. इसीलिए वे प्रशासनिक रूप से विजनरी नहीं हो पाये. उनके पास जमात रही है, जन-पक्षधर लोगों की टीम नहीं. लगभग सात साल, कुल 2689 दिनों के अपने शासन-काल में वे चाहते तो बिहार और वहां के समाज को काफी कुछ बदल सकते थे. लेकिन पिछड़ों-दलितों-अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न-चक्र पर कुछ अंकुश लगाने के अलावा वे कोई और बड़ा काम नहीं कर सके. शेख अब्दुल्ला, देवराज अर्स या ज्योति बसु की तरह अगर उन्होंने सिर्फ भूमि-सुधार का एजेंडा ही हाथ में लिया होता तो वे बिहार में अपराजेय बन जाते. लेकिन उन्होंने उस एजेंडे को नहीं लिया.

वे चाहते तो अपने इर्दगिर्द अच्छे अफसरों, प्रबुद्ध और जन-प्रतिबद्ध सलाहकारों की टीम विकसित कर सकते थे, लेकिन सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद उनका रास्ता बदल गया. जिस चारा घोटाले में वे फंसे, उसके पीछे भी उनके इर्दगिर्द रहने वाले मूर्ख, जन-विरोधी और अहंकारी-चाटुकारों का ज्यादा योगदान रहा. जहां तक 2014 की चुनावी जंग का सवाल है, बिहार की राजनीति के गंभीर प्रेक्षकों का मानना है कि राजद अपनी असरदार मौजूदगी का एहसास तभी करा पायेगा, जब लालू को लंबे समय तक जेल में न रहना पड़े. जमानत या किसी अन्य तरह की राहत पाकर वे अपने समर्थकों के बीच वापस लौटें, अपने परिवार को पार्टी पर थोपें नहीं. चाटुकारों की बजाय विवेकशील सलाहकारों की टीम बनाकर राजनीति करें. सजा पर स्थगन न होने की स्थिति में वे स्वयं चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, लेकिन राजनीति में अपनी पार्टी के लिए जगह तो बना ही सकते हैं. लालू क्या अपनी गलतियों से सबक लेने के लिए तैयार हैं?

(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक क्रांतिकारी सफर का दर्दनाक अंत..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: