Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  कला व साहित्य  >  Current Article

वो इंटरव्यू जो अब कभी नहीं लिया जा सकेगा…

By   /  October 29, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-संजीव चौहान||

बात है ब-मुश्किल एक महीने पहले की…राजेंद्र यादव जी का नंबर मिलाया…अपने बारे में बताया…यू-ट्यूब पर चल रहे अपने चैनल क्राइम्स वॉरियर (Crimes Warrior) के बारे में बताया. मैंने उनसे गुजारिश की..सर मैं आपका एक लंबा इंटरव्यू करना चाहता हूं…उधर से जबाब मिलने के बजाये…सवाल आया…क्यों ऐसा मैंने क्या नया फसाद खड़ा कर दिया कि अब यू ट्यूब वालों को भी मेरा इंटरव्यू लेने की जरुरत महसूस होने लगी? मैंने कहा, नहीं सर ऐसी बात नहीं है. बस मन हुआ. सोचा कि आपसे कई साल से मुलाकात नहीं हुई है. इंटरव्यू के साथ आपका आशीर्वाद भी मिल जायेगा. मैंने कहा. तो राजेंद्र जी बोले- ऐसा हो ही नहीं सकता है कि, जिस दौर से मैं (राजेंद्र यादव) गुजर रहा हूं, उसमें आपको (क्राइम्स वॉरियर) को कोई मसाला न चाहिए हो…फिर जोर से हंसे और बोले- ‘आजकल कुछ कमजोरी महसूस कर रहा हूं. और तुम टीवी (चैनल) वाले इंटरव्यू में सामने वाले को (जिसका इंटरव्यू होना हो) बुलवाते बहुत ज्यादा हो. ताकि कुछ ऐसा मसाला गरमा-गरम मिल जाये, जिसे बाजार में जोर-शोर से बेचा जा सके. राजेंद्र यादव का इंटरव्यू भी अगर बाजार में नहीं बेच सके तो और लानत मलामत होगी. इसलिए आप अपने इंटरव्यू का मकसद पहले साफ करो, तभी मैं बात करने की सोचूंगा.’rajendra-yadav

इधर से मैंने कहा, कि सर मैं आपके अतीत पर बातचीत करना चाहता हूं…मैं आगे कुछ बोलूं उससे पहले ही उन्होंने उधर से रोक दिया और बोले- ‘सुनो संजीव चौहान साहब मेरा अतीत कोई ऐसा नहीं है जिसे आने वाली पीढ़ियों को दस्तावेज बनाकर सौंपा जाये. दूसरे तुम लोग न (पत्रकार जमात) मेरे अतीत से शुरु करते हो और वर्तमान पे आकर अटक-भटक जाते हो. इसलिए अब सोचता हूं कि, मेरी जुबांन तुम लोग न ही खुलवओ, तो ठीक रहेगा. तुम लोग मेरे गिरहबान में झांकने की कोशिश करते हो, यह सोचकर कि मसाला मिलेगा. और मुझे तो बदले दौर का पूरा मीडिया ही मसालेदार दिखाई देने लगा है.’ मैंने उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करते हुए कहा- सर मैं तो आपके बच्चे के बराबर हूं. ऐसा कुछ नहीं होगा. हर पत्रकार एक सा नहीं है. आप तो मुझसे बहुत सीनियर रहे हैं. आप मुझ पर विश्वास तो कीजिए. इतना सुनते ही वे बोले… ‘तो फिर वो खबर और खबरनवीस ही क्या जो मसाले में न लिपटा हो. अब तो थू-थू करने कराने वाली खबरों का बोलबाला है. कोई बात नहीं. अब मुझे कुछ थकान सी महसूस हो रही है. तुम दो-चार दिन बाद मुझसे संपर्क करना. बैठने (इंटरव्यू) की जगह तय कर लेंगे. लेकिन कुछ ऐसा उल्टा-पुल्टा मत पूछ बैठना कि बची हुई जिंदगी के दो-चार दिन भी सफाई देने में ही गुजर जायें. मुझे इंटरव्यू देने में कोई दिक्कत नहीं है. आने से पहले फोन पर बात जरुर कर लेना.’

‘ठीक है सर नमस्कार आने से पहले आपसे बात कर लूंगा पक्का’ कहकर मैंने काट दिया. उस वक्त मुझ या राजेंद्र यादव जी को अहसास भी नहीं रहा था/ रहा होगा…कि अब न हमारी कभी बात होगी. न वो (राजेंद्र यादव) कुछ ऐसा बोल पायेंगे, जो मसाला साबित होगा. न इसकी सोची थी, कि जिस इंटरव्यू के लिए मैं इतने समय तक राजेंद्र यादव जी को समझाने की कोशिश करता रहा, वो इंटरव्यू भी अब कभी नहीं होगा. क्या कहूं या समझूं इसे! यही समझना शायद ज्यादा बेहतर होगा कि एक ऐसा इंटरव्यू जो अब कभी न लिया जा सकेगा….

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

सामाजिक जड़ता के विरुद्ध हिन्दी रंगमंच की बड़ी भूमिका..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: