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भारतीय राजनीति के दो योद्धा: एक अज्ञानी, दूसरा दंभी…

By   /  October 31, 2013  /  No Comments

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-वत्सला मिश्र||

देश की राजनीति में दो योद्धा एक दूसरे से मल्लयुद्ध पर आमादा हैं. एक हैं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी और दूसरे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी. वैसे इन दोनों की पहचान सोशल साइट्स पर फेंकू और पप्पू नाम से भी है. मोदी और राहुल गांधी दोनों इन दिनों रैलियों में व्यस्त हैं. ये रैलियां पिछले कुछ महीने से हिंदी पट्टी के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में या तो आयोजित हो चुकी हैं या फिर होने वाली हैं. अब तक हुई रैलियों में कुछ चीजें खासतौर पर ध्यान देने लायक हैं. नरेंद्र मोदी जब भी बोलते हैं, तो उनका निशाना कांग्रेस, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी होते हैं. अभी कुछ ही दिन पहले जब वे बिहार गए, तो नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के साथ-साथ नीतीश कुमार को ही निशाने पर लिया. राहुल गांधी भी कमोबेश ऐसा ही करते हैं. नरेंद्र मोदी को सुनें, तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई दबंग आदमी अपने समर्थकों से कह रहा हो, ‘इस बार कांग्रेस से चुन-चुनकर बदला लिया जाएगा.’ दरअसल, मोदी के सिर पर अहंकार चढ़कर बोल रहा है.rahul_modi

वे पिछले कुछ दिनों से ऐसा हाव-भाव प्रदर्शित कर रहे हैं, मानो यह तय हो चुका है कि अगले प्रधानमंत्री वही होंगे. वहीं कांग्रेस के स्टार प्रचारक और उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी दादी, पिता की हत्या की गाथा सुनाकर लोगों को रिझाने के प्रयास में हैं. रैलियों में दोनों की बातें सुनने पर यह साफ तौर पर महसूस होता है कि मोदी झूठ बोलने और झूठी बात को अपने समर्थकों के दिल में बैठाने की कला में माहिर हैं. वे जब तक्षशिला को बिहार का गौरव बताते हैं, तो पटना के गांधी मैदान में उपस्थित उनके समर्थक हर्षध्वनि करके उनकी बात समर्थन करते हैं. ऐसा नहीं है कि मोदी का यह झूठ पकड़ा नहीं जाता? सोशल मीडिया के साथ-साथ प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में तुरंत मोदी की थू-थू होने लगती है, लेकिन इस बेशर्म राजनीति को क्या कहा जाए, जहां बड़ी बेहयाई से झूठ बोलने के बाद अगले दिन फिर हमारे देश के नेता गरजने लगते हैं. अपने को सच्चा और पाक साफ बताने की कोशिश करते हैं. यही हाल राहुल गांधी का है. मुजफ्फरनगर में हुए दंगे का आरोप भाजपा और सपा के सिर पर मढ़ने की जल्दबाजी में वे ऐसा बयान दे बैठते हैं, जिसका खुलासा न करना ही देश के लिए बेहतर होता.

वैसे तो नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों विकास की बात करते हैं. राहुल गांधी आम आदमी को अधिकार देने, सत्ता में भागीदार बनाने, ग्राम प्रधान तक केंद्र सरकार द्वारा भेजी जाने वाली रकम सीधे पहुंचाने की बात करते हैं. जिस देश की नौकरशाही, नेताशाही पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेंध लगाकर परियोजनाओं से पैसा चुराने की कला में प्रवीण हो, जब पूरी दुनिया में मुनाफे पर आधारित बिकाऊ माल की अर्थव्यवस्था सड़ांध मार रही हो, उस व्यवस्था में केंद्र या राज्य सरकार द्वारा समाज के अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने का मनसूबा कहां तक सफल होगा और कैसे? यह बताने की जहमत राहुल गांधी नहीं उठाते. उनके पास ऐसी कौन-सी जादू की छड़ी है जिसको घुमाते ही देश के सभी ग्राम प्रधानों, इस देश के आखिरी आदमी तक सारे अधिकार, सुख-सुविधाएं पहुंच जाएंगी. दरअसल, राहुल गांधी जिस परिवार के चश्मोचिराग हैं, उस परिवार के चार-पांच पीढ़ी पहले से ही लोग इतने अमीर रहे हैं कि भूख क्या होती है? गरीबी क्या होती है? कपड़े फटे हों, तो मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग के लोगों को कैसी शर्मिंदगी महसूस होती है, इस बात से राहुल गांधी कतई वाकिफ नहीं हैं? वे कलावती के घर जाकर एक दिन खाना खाने का ढोंग भले ही कर लें, बुंदेलखंड के किसी गांव का पानी पीकर एक दिन के लिए अपना पेट भले ही खराब कर लें, लेकिन देश की बहुसंख्य आबादी रोज कितनी जिल्लत, जलालत और परेशानी झेलती है, इसका अंदाजा नहीं लगा सकते हैं. दरअसल, गरीबी, बेकारी, भुखमरी, शोषण और दोहन जैसी बातें उनके लिए सत्ता हासिल करने के लिए एक लुभावने नारे से इतर कुछ नहीं है. वे ऐसे लुभावने नारे गढ़कर सत्ता तो हासिल कर सकते हैं, लेकिन किसी गरीब के घर में हाड़तोड़ मेहनत करने के बावजूद चूल्हा न जल पाने की विडंबना का साक्षात्कार और शिद्दत से महसूसने की हद तक नहीं जा सकते हैं. विदेश से पढ़-लिखकर आए राहुल गांधी न देश को समझ पाए हैं, न देश की आम जनता का दुख-दर्द और न ही उसकी मानसिकता. राहुल गांधी किसी जनसभा को संबोधित कर रहे हों, तो आप गौर कीजिए. आपको तुरंत लगेगा कि कोई नौसिखिया नौजवान अपने अधकचरे ज्ञान और समझ के साथ इस देश की जनता को लुभाने की कोशिश कर रहा है.

अब बात करते हैं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र भाई मोदी की. अपनी रैलियों में वे केंद्र सरकार और प्रादेशिक सरकारों को धमकाने की भाषा में बात करने लगे हैं. पटना रैली में उन्होंने भाषण सुनने आए कार्यकर्ताओं से हाथ उठवाकर बार-बार यह कहलवाया कि इस बार नीतीश सरकार को सबक सिखा दिया जाएगा. उनकी सरकार बनी तो कांग्रेसियों का पक्ष लेने वाले अधिकारियों को सबक सिखा दिया जाएगा. यही नहीं, वे बात-बात में अपने बचपन में चाय बेचने और पिछड़ी जाति के होने का उल्लेख करते रहते हैं. पटना रैली के दौरान तो उन्होंने पटना में कई जगहों पर नमो टी स्टाल तक लगवा दिया. इससे क्या साबित करना चाहते हैं नरेंद्र मोदी? सच तो यह है कि यह नरेंद्र मोदी का ब्रांडिंग स्किल है. वे इन्हीं बातों को दोहराते-दोहराते आज प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने हैं. वे इन बातों को उभारकर क्या जाहिर करना चाहते हैं कि भारतीय राजनीति में एकमात्र वे ही ऐसे नेता हैं, जो जमीन से उठकर आए हैं? सिर्फ वे ही जमीनी कार्यकर्ता हैं. यह सही है कि इन दिनों भाजपा में फाइव स्टार कल्चर वाले नेताओं की भरमार है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि भाजपा में सिर्फ एक मोदी ही काबिल और प्रधानमंत्री पद के योग्य नेता हैं. भाजपा में काबिलियत और पार्टी के प्रति समर्पण का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक उस पर आरएसएस का ठप्पा न लगा हो. मोदी पर संघ ने मोहर लगा दी है, तो वे योग्य हो गए, बाकी सब नाकारा हैं. इधर जब से रैलियां शुरू हुई हैं, तब से नरेंद्र मोदी कई ऐसी बातें भी कह गए, जिनका न कोई औचित्य था, न उसकी कोई प्रामाणिकता. एक दैनिक को दिए गए साक्षात्कार में सरदार वल्लभ भाई पटेल के अंतिम संस्कार में जवाहर लाल नेहरू के शामिल न होने की बात को कहकर वे नेहरू-गांधी परिवार को नीचा दिखाना चाहते थे. (हालाँकि बाद में इस अख़बार ने इस मुद्दे पर मोदी की फज़ीहत होती देख दवाब में आकर या किन्ही और कारणों से इस खबर का खंडन कर दिया) सरदार पटेल की बात जोर शोर से उठाने के पीछे की मानसिकता समझने की कोशिश कीजिए, तो नरेंद्र मोदी की क्षुद्र प्रांतीयता की भावना के दर्शन होते हैं. वैसे तो भाजपाइयों और संघियों को महात्मा गांधी और उनसे जुड़े नेताओं से उस हद तक परहेज है, जैसे कभी अछूत समझी जाने वाली जातियों से सवर्णों को थी. लेकिन अब नरेंद्र भाई मोदी को गांधी और पटेल प्रिय प्रतीत होते हैं. क्यों? क्योंकि ये दोनों गुजरात के थे. ज्यादा नहीं, तीन-चार महीने पहले तक बात-बात में ‘हमारे गुजरात में ऐसा है, हमारे गुजरात में वैसा है’ कहकर गुजरात के विकास मॉडल की बात करने नरेंद्र मोदी अभी प्रांतीयता की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं.

अपनी प्रांतीयता और सांप्रदायिक मानसिकता को छद्म निरपेक्षता की आड़ में छिपाने का प्रयास भी नरेंद्र मोदी ने करना शुरू कर दिया है. वे अब मुसलमानों की बात करने लगे हैं. उन्होंने पटना रैली में भी गरीब हिंदुओं और गरीब मुसलमानों से गरीबी के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया. समझ में नहीं आता कि गरीबों को हिंदू-मुसलमान में विभाजित करने की क्या तुक थी? आमतौर पर मुसलमानों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे अंध विश्वासी, विकास विरोधी, कट्टर होते हैं. मुसलमानों पर ऐसे आरोप लगाने वालों ने भारत में रहने वाले करोड़ों मुसलमानों की स्थिति पर विचार नहीं किया है. देश और प्रदेश की सरकारों ने मुसलमानों को उनके रीति-रिवाजों और धर्म के साथ कोई छेड़छाड़ न करने की आड़ में उन्हें विकास की मुख्यधारा से काट दिया है. मदरसों में जिस तरह की पढ़ाई होती है, उससे अगर आप वाकिफ हों, तो आप यह बात दावे के साथ कह सकते हैं कि मुसलमानों के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा उनका अज्ञान है. वे अज्ञानता के चलते ही ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं. उन्हीं की तरह अज्ञान बनने का फरमान अभी कुछ ही दिन पहले आरएसएस के दत्तात्रेय होसाबले ने दिया है. वे कहते हैं कि देश में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए हिंदुओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहिए. अधिसंख्य मुसलमानों को स्वार्थ के चलते उनके नुमाइंदे समाज और विकास की मुख्य धारा में नहीं आने देना चाहते हैं. ठीक वैसे ही समाज की मुख्य धारा से होसाबले हिंदुओं को काट देना चाहते हैं. चाहे हिंदू हो या मुसलमान या दूसरे धर्म के लोग, जिन्होंने मदरसों, धार्मिक स्कूलों के बजाय सरकारी या गैर सरकारी स्कूलों से शिक्षा पाई है, वे कतई कट्टरपंथी नहीं हैं. तालिबानी क्यों कहते हैं कि दुनिया के सारे मुसलमान सिर्फ मस्जिदों और मदरसों में ही शिक्षा ग्रहण करें? क्योंकि ज्ञान-विज्ञान और दुनिया को समझने-जानने का नजरिया न पैदा होने से तालिबानियों को अपनी बातें इस्लाम के नाम पर लादने में सहूलियत होती है. ऐसा नहीं है कि इस्लाम में सब कुछ बुरा है या हिंदू धर्म ग्रंथों में सब कुछ अच्छा. युग, काल और परिस्थितियों के मुताबिक कभी वे अच्छे साबित हुए, तो कभी बुरे. इस्लाम में स्त्री स्वतंत्रता को मुख्य माना गया है, लेकिन बाद में मुल्ला-मौलवियों ने उसकी जो व्याख्या की, पुरुष प्रधान समाज को ध्यान में रखते हुए जो फतवे जारी किए, वे स्त्री को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ते गए. यही हाल हिंदुओं में भी है. हिंदुओं में भी सवर्ण औरतों की जो दशा है, कमोबेश वैसी ही दशा दलित, पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति की औरतों की है. औरतों की बदतर हालात सब जगह है, चाहे वह हिंदू औरतें हो, मुस्लिम औरते हों या आदिवासी औरतें हो.

नरेंद्र भाई मोदी और राहुल गांधी दोनों बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन उनकी या उनकी पार्टी की अर्थ नीति क्या है? विदेश नीति कैसी होगी? भारत-पाकिस्तान, भारत-बांग्लादेश, भारत-चीन का सीमा विवाद कैसे हल होगा? पड़ोसी देशों से लगती सीमा पर बहने वाली नदियों के जल बंटवारे को लेकर उनका दृष्टिकोण क्या है? महंगाई, बेकारी और गरीबी को कैसे दूर किया जाएगा, इसका कोई रोडमैप आज तक किसी ने नहीं पेश नहीं किया है. सिर्फ   लच्छेदार बातें करके मतदाताओं को रिझाने की कोशिश हो रही है. यही हाल वामपंथियों, समाजवादियों, लोहियावादियों, बहुजन समाज पार्टी के कर्ताधर्ताओं का है. जनता का ध्यान उनकी मूल समस्या से हटाकर सिर्फ धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और प्रांत पर ही लाने की कोशिश सभी कर रहे हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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