Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

साम्प्रदायिकता के खिलाफ तीसरे मोर्चे की अटकलें…

By   /  October 31, 2013  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम के मंच पर एक साथ एक दर्जन से अधिक नेताओं ने एक आवाज़ में सांप्रदायिकता के खिलाफ नारा बुलंद किया. कहने को ये सांप्रदायिकता के खिलाफ एक सम्मलेन में शामिल होने आए थे, लेकिन वो इन अटकलों को नहीं रोक सके कि ये एक गैर कांग्रेस, गैर भाजपा तीसरे मोर्चे के संभावित पुनर्गठन की एक कोशिश है.third_front_rally_in_talkatora_delhi

वामपंथी दलों द्वारा बुलाए गए इस सम्मेलन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि सांप्रदायिक ताक़तों से सावधान रहने की ज़रुरत है.

उनके अनुसार धार्मिक जुलूसों और यात्राओं के ज़रिए समाज को तोड़ने और टकराव की स्थितियां पैदा की जा रही हैं.

समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के शब्द अलग थे लेकिन अर्थ एक.

उन्होंने मुज़फ्फरनगर में हुए हाल के दंगों के हवाले से कहा कि सांप्रदायिक ताक़तें हर जगह दंगे कराना चाहती हैं और इन ताक़तों के खिलाफ एकजुट होना ज़रूरी है.

जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव ने भी सांप्रदायिक तत्वों को ललकारते हुए कहा अब ‘इनकी नहीं चलेगी’.

सम्मेलन में 14 पार्टियों ने हिस्सा लिया लेकिन नेताओं की संख्या इससे कहीं अधिक थी.

तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में मौजूद लोगों ने कभी नेताओं के भाषणों पर तालियां भी बजाईं और नारे भी लगाए.

उत्साह मंच पर भी था और स्टेडियम के अंदर मौजूद लोगों में भी. सभी नेताओं ने जनता से अपील की कि वो ये संकल्प लें कि देश का सांप्रदायिक सद्भाव नहीं बिगड़ने देंगे.

लेकिन वहाँ बैठे सभी लोगों को ये भी अंदाज़ा था कि सम्मलेन का असल मक़सद था तीसरे मोर्चे की सम्भावना को परखना, जैसा कि ट्रिब्यून अख़बार के एक वरिष्ट पत्रकार के वी प्रसाद ने मुझे बताया, “ये नेता तीसरा मोर्चा बनाने के लिए थाह ले रहे हैं.”

नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यादव ने तीसरे मोर्चे की बात खारिज कर दी, लेकिन 2014 के आम चुनाव के बाद क्लिक करें मोर्चे की सम्भावना को किसी नेता ने ख़ारिज नहीं किया.

मोदी फैक्टर

मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से समर्थन देती है और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इस सरकार में कांग्रेस की भागीदार है.

मंच पर मौजूद अधिकतर पार्टियां कांग्रेस विरोधी थीं, लेकिन वो बीजेपी के विरोध के लिए भी जानी जाती हैं.

वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने मुझसे बातें करते हुए ये स्वीकार किया कि अगले साल के चुनाव में बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बढ़ती हुई लोकप्रियता के मद्देनज़र भी ये नेता एक मंच पर बैठने के लिए तैयार हुए हैं.

के वी प्रसाद ने कहा कि मोदी कि बढ़ती हुई ताक़त को रोकना इन नेताओं का ख़ास उद्देश्य है. मोदी एक बड़े नेता के रूप में उभरे हैं जिसके कारण इन पार्टियों में थोड़ी खलबली मची है. उनका कहना था “उन्हें एक साथ जोड़ने के लिए एक गोंद चाहिए और मोदी उनके लिए गोंद काम कर रहे हैं.”

वाम दलों के करीब मानी जाने वाली तेलुगुदेशम पार्टी के क्लिक करें चंद्रबाबू नायडू की इस सम्मेलन में अनुपस्थिति उल्लेखनीय है.

टीडीपी नेता चंद्र बाबू नायडू के बारे में कहा जाता है कि वो इन दिनों भाजपा के क़रीब होते जा रहे हैं. वह आंध्र प्रदेश में अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस, को एक बड़ी समस्या के रूप में देखते हैं.

(बीबीसी)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    ये इकठे हुए नेता पी ऍम पद के गम के मारे हुए हैं.इनकी देश कि राजनीती में पैंठ नहीं रही पाए कुर्सी का मोह कोई अन्य रास्ता भी नहीं दिखने देता .सभी के मुहं में पी ऍम के नाम पर पानी भरा है, कोई भी किसी के प्रति विश्वास नहीं करता.लेकिन इस नाम पर सहायता के लिए हर बार इकठे हो जाते हैं तीसरे मोर्चे कि सड़ी हुए लाश को मोर्चरी से निकाल उसके इर्द गिर्द बैठ स्यापा कर लेते हैं, चुनाव ख़तम होते ही फिर वापस इसे मोर्चरी में रख आते हैं. जनता को बेवकूफ बनाने का उनका यह खेल सतत १९८० से चल रहा है. हर बार कुछ धैर्य खो चुके दल बहार हो जाते हैं तो कुछ नए इनका स्थान ले लेते हैं.यह तीसरा मोर्चा मात्र एक भ्रम है

  2. ये इकठे हुए नेता पी ऍम पद के गम के मारे हुए हैं.इनकी देश कि राजनीती में पैंठ नहीं रही पाए कुर्सी का मोह कोई अन्य रास्ता भी नहीं दिखने देता .सभी के मुहं में पी ऍम के नाम पर पानी भरा है, कोई भी किसी के प्रति विश्वास नहीं करता.लेकिन इस नाम पर सहायता के लिए हर बार इकठे हो जाते हैं तीसरे मोर्चे कि सड़ी हुए लाश को मोर्चरी से निकाल उसके इर्द गिर्द बैठ स्यापा कर लेते हैं, चुनाव ख़तम होते ही फिर वापस इसे मोर्चरी में रख आते हैं. जनता को बेवकूफ बनाने का उनका यह खेल सतत १९८० से चल रहा है. हर बार कुछ धैर्य खो चुके दल बहार हो जाते हैं तो कुछ नए इनका स्थान ले लेते हैं.यह तीसरा मोर्चा मात्र एक भ्रम है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक क्रांतिकारी सफर का दर्दनाक अंत..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: