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पटेल की विरासत जरूरत के हिसाब से तय करने की साजिश…

By   /  October 31, 2013  /  3 Comments

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स्वाधीन भारत के पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की विरासत पर कब्जे को लेकर जारी राजनीतिक घमासान बढ़ता जा रहा है. इस घमासान में आधुनिक भारत के महान शिल्पकार सरदार पटेल को खास राजनीतिक खांचे में कैद करने की कोशिश की जा रही है. इस घमासान में इतिहास तथ्यों से नहीं बल्कि जरूरतों के अनुसार तय किया जा रहा है.Vallabh Bahi

29 अक्टूबर को अहमदाबाद में खुद को भावी प्रधानमंत्री समझने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतिहास में एक ‘काश’ जोड़ा तो उसी मंच पर मौजूद मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने याद दिला दिया कि पटेल एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे. ये उस राजनीतिक युद्ध की बानगी है जो पटेल के नाम पर छिड़ा है.

मोदी, दरअसल, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के उसी प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं. जिसमें बार-बार कहा जाता है कि सरदार पटेल, नेहरू से बेहतर नेता थे. यही नहीं, पटेल को हिंदुत्व के दर्शन के करीब बताने की कोशिश भी होती है. आम चुनाव 2014 की आहट बढ़ने के साथ ये कोशिश तेज होती जा रही है. नरेंद्र मोदी ने गुजरात में पटेल की ऐसी प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान किया है जो दुनिया में सबसे ऊंची होगी. अमेरिका की ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से भी ऊंची. सरदार पटेल की 182 मीटर की प्रतिमा गुजरात के नर्मदा जिले के सरदार सरोवर बांध के करीब स्थापित की जाएगी. बीजेपी की ओर से इसका धुआंधार प्रचार जारी है.

वाकई गांधीवादी मूल्यों के प्रति जीवन भर समर्पित रहने वाले सरदार पटेल के प्रति संघ परिवार की ये भक्ति सामान्य नहीं है. खासतौर पर जब पटेल ने बतौर गृहमंत्री आरएसएस को कई बार शक की निगाह से देखा.

30 जनवरी 1948

दिल्ली के बिरला हाउस में शाम की प्रार्थना सभा की तैयारी हो रही थी. गांधी जी सभास्थल की ओर बढ़ रहे थे. तभी एक नौजवान ने अचानक सामने आकर उनकी छाती पर तीन गोलियां उतार दीं. दुनिया भौंचक्की रह गई. खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी पर गोली किसी और ने नहीं, सावरकर के शिष्य और हिंदू महासभा के कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने चलाई थी. गोडसे कभी आरएसएस में भी सक्रिय था.

गांधी की हत्या एक ऐसे हिंदू की हत्या थी जिसने सत्य को ही ईश्वर माना गया. जिसका धर्म मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता था. वे ईश्वर के साथ अल्लाह का नाम भी लेते थे. दोनों को एक समझते थे. लेकिन हिंदू गांधी के हत्यारों का आदर्श हिंदुत्व था. जिसके हिसाब से भारत के प्रति उनकी निष्ठा ही सच्ची हो सकती है, जिनकी पितृभूमि और पवित्र भूमि, दोनों भारत में हों. इस परिभाषा से अल्पसंख्यक कभी देशभक्त नहीं हो सकते.

गांधी की हत्या ने दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे. जिसकी जिम्मेदारी गृहमंत्री के नाते सरदार पटेल के पास थी. तमाम तथ्यों को देखते हुए उन्होंने माना कि गांधी की हत्या में आरएसएस का भी हाथ है. और 4 फरवरी 1948 को पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया. हालांकि आरएसएस गांधी की हत्या में शामिल होने से इंकार करता रहा है. उसका आज भी दावा है कि पटेल ने नेहरू की इच्छा को देखते हुए आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था.

आरएसएस के बारे में पटेल की राय के कुछ दस्तावेजी प्रमाण

आरएसएस के बारे में पटेल की राय के कुछ दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हैं. ये साबित करते हैं कि गांधी जी की हत्या के बाद पटेल ने नेहरू जी के कहने पर आरएसएस पर प्रतिबंध नहीं लगाया था बल्कि खुद भी उसे देश के लिए खतरा मानते थे.

11 सितंबर 1948 को पटेल ने आरएसएस के सर-संघचालक एमएस गोलवलकर को पत्र लिखा. पत्र में लिखा था- ‘हिंदुओं को संगठित करना और उनकी सहायता करना एक बात है, लेकिन अपनी तकलीफों के लिए बेसहारा और मासूम पुरुषों, औरतों और बच्चों से बदला लेना बिल्कुल दूसरी बात. इनके सारे भाषण सांप्रदायिक विष से भरे थे, हिंदुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए आवश्यक न था कि जहर फैले. इस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी. सरकार व जनता की रत्ती भर सहानुभूति आरएसएस के साथ नहीं रही बल्कि उनके खिलाफ ही गई. गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया. इन हालात में सरकार को आरएसएस के खिलाफ कदम उठाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.’

सरदार पटेल के मुताबिक गांधी जी की हत्या के बाद संघवालों ने मिठाई बांटी और प्रतिबंध के अलावा कोई चारा नहीं था. जाहिर है, सरदार पटेल नेहरू की जबान नहीं बोल रहे थे, अपना मन खोल रहे थे. बतौर गृहमंत्री उन्हें देश भर से खुफिया जानकारियां मिलती थीं.

सरदार पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिंदू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी एक पत्र लिखकर बताया कि प्रतिबंध के बावजूद आरएसएस बाज नहीं आ रहा है. उन्होंने लिखा हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका. मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षड़यंत्र में शामिल था. आरएसएस की गतिविधियां, सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं. हमें मिली रिपोर्टं बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं. दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है.

दरअसल, संघ परिवार की ओर से पेश की गई हिंदूराष्ट्र की अवधारणा सरदार पटेल को कभी रास नहीं आई. वे भारत को हिंदू पाकिस्तान बनाने के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने साफ कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इस देश में मुसलमानों के भी उतने ही अधिकार हैं जितने की एक हिंदू के हैं. हम अपनी सारी नीतियां और आचरण वैसा नहीं कर सकते जैसा पाकिस्तान कर रहा है. अगर हम मुसलमानों को यह यकीन नहीं दिला पाए की यह देश उनका भी है तो हमें इस देश की सांस्कृतिक विरासत और भारत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं है.

1925 में गठित आरएसएस का गांधी की हत्या तक न कोई संविधान था और न सदस्यता रसीद. प्रतिबंध हटाने के लिए उसने खुद को सांस्कृतिक कामकाज तक सीमित रखने और अपना संविधान बनाने का आश्वासन दिया. 11 जुलाई 1949 प्रतिबंध हटाने का ऐलान करने वाली भारत सरकार की विज्ञप्ति में कहा गया है कि आरएसएस के नेता ने आश्वासन दिया है कि आरएसएस के संविधान में, भारत के संविधान और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा को और सुस्पष्ट कर दिया जाएगा. यह भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हिंसा करने या हिंसा में विश्वास करने वाला या गुप्त तरीकों से काम करनेवाले लोगों को संघ में नहीं रखा जाएगा. आरएसएस के नेता ने यह भी स्पष्ट किया है कि संविधान जनवादी तरीके से तैयार किया जाएगा. विशेष रूप से, सरसंघ चालक को व्यवहारत: चुना जाएगा. संघ का कोई सदस्य बिना प्रतिज्ञा तोड़े किसी भी समय संघ छोड़ सकेगा और नाबालिग अपने मां-बाप की आज्ञा से ही संघ में प्रवेश पा सकेंगे. अभिभावक अपने बच्चों को संघ-अधिकारियों के पास लिखित प्रार्थना करने पर संघ से हटा सकेंगे. इस स्पष्टीकरण को देखते हुए भारत सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आरएसएस को मौका दिया जाना चाहिए.

इस विज्ञप्ति से साफ है कि संघ पर किस तरह के आरोप थे और भारत सरकार को उसके बारे में कैसी-कैसी सूचनाएं थीं. लेकिन प्रतिबंध हटाना शायद लोकतंत्र का तकाजा था और इसके सबसे बड़े पैरोकार तो प्रधानमंत्री नेहरू ही थे.

1 अगस्त 1947 को नेहरू का पटेल को खत

1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा कि कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं. इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं.

3 अगस्त को पटेल का नेहरू को जवाब

पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा- आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद. एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है और लगभग 30 साल की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता. आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी. आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है. हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है. आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं.

पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी. अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है. 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गए पटेल ने अपने भाषण में कहा, अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं.

साफ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री न बनने पर नरेंद्र मोदी जैसा अफसोस जता रहे हैं, वैसा अफसोस पटेल को नहीं था. वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे.

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  • Published: 4 years ago on October 31, 2013
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  • Last Modified: October 31, 2013 @ 12:33 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Naresh Gupta says:

    Anyhow they want to distract ppl fr corruption.

  2. mahendra gupta says:

    व्यर्थ की बहस,खाली बैठे लोगों को लड़ने के लिए कुछ तो चाहिए ही.काम के मुद्दे पर कोई नहीं बोलना चाहता उसमें पोल खुलने का डर है न.

  3. व्यर्थ की बहस,खाली बैठे लोगों को लड़ने के लिए कुछ तो चाहिए ही.काम के मुद्दे पर कोई नहीं बोलना चाहता उसमें पोल खुलने का डर है न.

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