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इंदिरा-भिंडरावाला, सत्ता, सियासत, मज़हब, मोहरे और सवाल…

By   /  October 31, 2013  /  4 Comments

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वो दोनों ख़ुदा बनना चाहते थे….

-मयंक सक्सेना||

24 अक्टूबर 1984 को ही देश भर में दीवाली मनाई गई थी, लेकिन धमाकों का माहौल जून के महीने से ही शुरु हो चुका था। पंजाब में श्री हरमंदिर साहब में जरनैल सिंह भिडरावाला के नेतृत्व में इकट्ठा हो चुके चरमपंथियों और बारूद को खत्म करने के लिए आखिरकार उसी पीएम को फौज भेजनी पड़ी, जिस पीएम ने ये सारी ताक़त भिडरावाला को दी थी। अमृतसर के स्वर्णमंदिर में 3-4 जून को ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ था और संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष होने की घोषणा करने वाले गणतंत्र को अब अलगाववाद की एक नई लड़ाई से जूझना था…अलगाववाद की आग, धर्म की अफ़ीम जिसके पीछे सियासी फ़ायदे के लिए उसे हवा देने वाली सियासत ही अब उसके निशाने पर थी। पंजाब की दरबारा सिंह सरकार को बर्खास्त किया जा चुका था, हरमंदिर साहब के अंदर और बाहर से भीषण गोलीबारी हुई थी, फ़ौज अंदर घुसी थी..और अकाल तख्त भी क्षतिग्रस्त हुआ था…यानी कि जो नहीं होना चाहिए था वो सब हुआ था। लेकिन सवाल ये है कि 31 अक्टूबर को इस बारे में बात क्यों…क्योंकि शायद इस दिन हमको याद करना होगा कि धर्म को राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हुए आज हम कहां आ कर खड़े हो गए हैं।Indira Gandhi   Assassination  Cremation

24 अक्टूबर को दीवाली थी, लेकिन देश में गोलियों और बारूद के धमाके लगातार गूंज रहे थे, पंजाब हिंसा का शिकार हो चुका था, सिक्ख चरमपंथी अब किसी भी कीमत पर, कितना भी खून बहा कर खालिस्तान चाहते थे। उनके कई नेता विदेशों में बैठ कर और कुछ देश के अंदर से ही हिंसा को संचालित कर रहे थे। दिल्ली के 1, सफ़दरजंग रोड पर अल सुबह से ही दीवाली के पटाखों के टुकड़ों को साफ़ करने की कवायद हो रही थी; इंदिरा गांधी पर एक वृत्तचित्र बना रहे एक आयरिश निर्देशक उनका इंटरव्यू करने की तैयारी में थे। इंदिरा गांधी उस रास्ते की ओर बढ़ रही थी जो 1 सफ़दरजंग को 1, अकबर रोड से जोड़ता है, उनके साथ थे उनके निजी सचिव और वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आर के धवन और ठीक पीछे चल रहा था छाता लिए हुए एक कांस्टेबल। ब्लू स्टार और हरमंदिर साहब की आग एक ओर से अभी बुझी नहीं थी और शायद ये ही वो पल था जब वो दूसरी ओर भी लगने वाली थी। गेट पर मौजूद दोनों सिक्ख सुरक्षाकर्मियों को इंदिरा गांधी ने हमेशा की तरह मुस्कुरा कर देखा और पलक झपकने से भी कम वक्त में सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह के 0.38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर की 3 गोलियां एक के बाद उसी पीएम के जिस्म में पैबस्त कर दी, जिसकी सुरक्षा के लिए उसे ये पिस्तौल मिली हुई थी। इंदिरा गांधी ज़मीन पर गिर चुकी थी और पीछे के सुरक्षा बूथ से कांस्टेबल सतवंत सिंह की स्टेनगन ने आग उगलनी शुरु कर दी थी, और देश के पीएम का जिस्म छलनी होता जा रहा था। जब तक बाकी की फोर्स और सुरक्षाकर्मी आकर इन दोनों को कब्ज़े में लेते तब तक शायद वो अपना काम पूरा कर चुके थे। अब बाकी थी एक आग, जो इस देश को जलाने वाली थी, ऐसी आग जिसे सियासतदानों ने ही लगाया था और उसने सियासतदानों के ही कब्ज़े में रहने से इनकार कर दिया था।

Indira-Gandhiशाम तक ख़बर आम होने लगी थी कि इंदिरा गांधी की सिक्ख चरमपंथियों ने हत्या करवा दी थी, अगले ही रोज़ से दिल्ली की सड़कों पर बलवाई घूमने लगे थे। उन दंगों की कवरेज में शानदार और बहादुराना काम करने वाले पत्रकारों में से एक स्वर्गीय आलोक तोमर ने कोई 4 साल पहले एक बातचीत में बताया था कि किस तरह से उनको मोहन सिंह नाम के एक शख्स से इन दंगों की ख़बर मिली थी और एच के एल भगत, सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर के इलाकों में हिंसक भीड़ ने त्रिलोकपुरी समेत पूर्वी दिल्ली के तमाम इलाकों में सिक्खों का क़त्ल ए आम किया था। पुलिस 2 नवम्बर तक सिर्फ दो मौतों का आंकड़ा बता रही थी, लेकिन आलोक तोमर समेत और 3 पत्रकारों ने दंगों का सच जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में लिखना शुरु किया। तब तक दंगे धीरे धीरे दिल्ली से और शहरों तक पहुंच रहे थे। दिल्ली में तो चश्मदीदों ने लगातार बयान किया है कि किस तरह कांग्रेस के कई नेता ही दंगईयों की भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे, लेकिन सवाल एक और था कि आखिर ये सब हो क्यों रहा था। सवाल एक और था कि क्या हमारी चुनावी राजनीति और बहु-पार्टी संसदीय लोकतंत्र आज़ादी के 37 साल बाद सिर्फ वोटबैंक की राजनीति पर खड़ा था, जो भूख-गरीबी से लेकर मज़हब तक का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करती है। इंसानों को टिश्यू पेपर की तरह यूज़ एंड थ्रो के सिद्धांत पर ला खड़ा करती है। आइए चलते हैं थोड़ा पीछे…

हो सकता है कि कुछ लोगों को इस पर आपत्ति हो लेकिन इंदिरा गांधी के अंदर जागा तानाशाह भले ही उन परिस्थितियों की उपज हो, जो उनके लिए कांग्रेस के ही अंदर के विरोधियों और साज़िशों ने बनाई लेकिन उसका असर ये था कि नीचे तक न जाने कितने और तानाशाह खड़े हो गए थेइंदिरा गांधी के नीचे संजय गांधी और उनके नीचे उनके करीबियों और चापलूसों से लेकर के चापलूसों के चापलूसों तक एक फ़ौज थी अलग अलग तानाशाहों की, जो सिर्फ और सिर्फ अपना फ़ायदा देख रहे थे। इमरजेंसी के बाद चुनावों में ध्वस्त हो चुकी कांग्रेस को दोबारा सत्ता तो हासिल करनी थी, बल्कि साथ ही नए साथी भी तलाश करने थे। संजय गांधी अघोषित रूप से ख़ुद को देश का मालिक मानने लगे थे और इंदिरा गांधी समेत पूरी कांग्रेस उनकी इच्छा से ही चल रही थी। पंजाब की चुनावी राजनीति में अकाली दल के उभरने और कांग्रेस को पटखनी दे देने के बाद कांग्रेस को पंजाब में कुछ चाहिए था, जो पंजाब की राजनीति में कांग्रेस की वापसी कराए और वो कुछ दिखा संजय गांधी और देश कांग्रेस नेता ज्ञानी जैल सिंह को मज़हब और सियासत के गठजोड़ में। सिखों की धर्म प्रचार की शीर्ष संस्था दमदमी टकसाल के संत जरनैल सिंह भिडरावाले को कांग्रेस के लिए चुनावी प्रचार में साधा गया। लेकिन शायद उस वक्त संजय गांधी और जैल सिंह राजनीति का एक मूलभूत सिद्धांत भूल गए थे कि मज़हब की सियासत के अपने नफे नुकसान होते हैं और खासतौर पर जो उस सियासत को न जानते हों, उन को उस से दूर ही रहना चाहिए।

Indira Shot

भिडरावाले की ताक़त दिनों दिन बढ़ने लगी, इसकी वजह एक और थी कि केंद्र में भारी बहुमत के साथ फिर से इंदिरा गांधी या कहें कि कांग्रेस आई सत्ता में लौट आई थी। इसमें पंजाब में भी पार्टी की भारी जीत थी, और ये मानने का इंदिरा गांधी के पास कोई कारण नहीं था कि इसमें भिंडरावाले की मदद अहम नहीं थी, खासतौर पर तब संजय गांधी भी ऐसा मान रहे हों। ज्ञानी जैल सिंह के धुर विरोधी दरबारा सिंह को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया गया, शक्ति संतुलन का ये खेल न जैल सिंह को भाया और न ही भिडरावाले को। लेकिन जैल सिंह गृह मंत्री बन चुके थे और भिडरावाला उन दिनों पंजाब समेत देश भर में अपने हथियारबंद अंगरक्षकों के साथ घूमता था, सिक्खों के बीच सभाएं करता था और धीरे धीरे चरमपंथ के लिए सुनियोजित रास्ता बना रहा था। पंजाब केसरी के मालिक लाला जगत नारायण की हत्या के मामले में भिंडरावाले का नाम आना कोई बहुत आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर में अपने एक भड़काऊ भाषण में वो छात्रों को लाला जगत नारायण के खिलाफ़ भड़का चुका था, सवाल सिर्फ ये ही नहीं था कि आखिर क्यों एक धार्मिक-चरमपंथी नेता यूनिवर्सिटी में जाकर भाषण दे रहा है और उसे इसकी अनुमति किस ने दी? सवाल ये भी था कि आखिर क्यों बार-बार लाला जगत नारायण अपने अखबार में हिंदुओं से अपील कर रहे थे कि वो अपनी मातृभाषा जनगणना के वक्त हिंदी लिखवाएं, क्योंकि एक साधारण समझ है कि धर्म से मातृभाषा का कोई ताल्लुक नहीं है…ख़ैर उनकी व्यावसायिक या राजनैतिक जिस भी मंशा से की गई अपील के जवाब में सिक्ख चरमपंथियों ने उनकी हत्या कर दी। हत्या के आरोप में जरनैल सिंह भिडरावाला को भी गिरफ्तार किया गया लेकिन उसे अदालत से ज़मानत नहीं मिली बल्कि देश के गृह मंत्री और बाद में भारत के राष्ट्रपति बने ज्ञानी जैल सिंह ने संसद में ये घोषणा की कि, “संत जरनैल सिंह भिंडरावाले को रिहा कर दिया गया है क्योंकि इस मामले में उनकी संलिप्तता का कोई सबूत नहीं है।” ये जरनैल सिंह और मज़हबी चरमपंथ का उस सियासत पर जीत का एलान था, जो सियासत जरनैल सिंह और मज़हबी चरमपंथ को अपने हक़ में इस्तेमाल करना चाह रही थी। इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के खिलाड़ी से मोहरा बनते जाने का सिलसिला शुरु हो चुका था।

2पंजाब में धीरे-धीरे भिंडरावाला का दबदबा बढ़ता गया, दमदमी टकसाल पर कब्ज़े के बाद वो न केवल देश भर में घूम रहा था बल्कि कई और धार्मिक नेता भी उससे मिलने आने लगे थे। जामा मस्जिद के इमाम के साथ भिंडरावाला की तस्वीर बयान करती है कि किस तरह मज़हबी सियासत के तार ऊपर से खिलाफ़ दिखते हैं लेकिन अंदर से आपस में जुड़े होते हैं। भिडरावाला खुलेआम इंदिरा गांधी से अपने रिश्तों के बारे में लोगों से बात करता था, लेकिन इस बीच भिंडरावाले को खोज लाने वाले संजय गांधी की विमान हादसे में मौत हो गई। अब इंदिरा गांधी के लिए भिडरावाला गले की फांस बनता जा रहा था, ज़ाहिर है आप शेर की सवारी करते हैं तो कभी न कभी वो आपको खाएगा, वो दौड़ कर कभी न कभी रुकेगा तो भी और आप नीचे उतरे तो भी। इस बीच पंजाब के तत्कालीन सीएम दरबारा सिंह इस सारी स्थिति को समझ रहे थे क्योंकि कई एनआऱआई सिक्खों के साथ भिडरावाला गुप्त बैठकें कर रहा था, और धीरे-धीरे अलग खालिस्तान की मांग को लेकर ये लोग सामने आने वाले थे। अलग देश की मांग वो भी मज़हबी आधार पर किस कदर हिंसक होती है, ये बंटवारे के दौरान देश देख चुका था, लेकिन भिंडरावाले के आगे केंद्र सरकार किस कदर नतमस्तक थी कि पंजाब के सीएम को भी चुप रहने का हुक्म हुआ। खालिस्तान की मांग के साथ ही पंजाब में हिंसा का दौर शुरु हो चुका था। कभी हिंदुओं के साथ भाईयों की तरह रहने वाले सिक्खों में ही कुछ पर चरमपंथ का ऐसा खून सवार हुआ कि हिंदुओं की हत्या का दौर शुरु हो गया। 1982 में एशियाड के दौरान सिक्खों की बेवजह गिरफ्तारी और जांच को भी भिंडरावाले को अपने पक्ष में भुनाने का मौका मिला, अन्याय हमेशा हिंसा को बल देता है और सरकारी एजेंसियों का धर्मनिरपेक्ष न होना चरमपंथियों को मज़बूत करता है। एशियाड के दौरान सिक्खों को लेकर पुलिस का भेदभाव का रवैया सिक्खों में रोष पैदा कर गया, पंजाब में हिंसा के दौर में सबसे बुरे दो दिन थे 25 अप्रैल, 1983 और 5 अक्टूबर, 1983, जिन्होंने शायद इतिहास का रुख मोड़ दिया। 25 अप्रैल, 1983 को डीआईजी अवतार सिंह अटवाल का शव स्वर्ण मंदिर के परिसर में पड़ा था, उनको चरमपंथियों ने गोली मार दी थी, वो अकाल तख्त और ग्रंथ साहिब को माथा टेक कर लौट रहे थे, हाथ में प्रसाद लिए इस शव को 2 घंटे तक परिसर से हटाया न जा सका। शर्मनाक तरीके से इस शव को ले जाने तक के लिए अकाल तख्त को अपना निवास बना लेने वाले जरनैल सिंह भिडरावाला से सरकार को अनुमति मांगनी पड़ी। दिल्ली से सत्ता का आशीर्वाद और धर्म की अफ़ीम युवाओं को चखा कर ताक़त हासिल कर चुका भिडरावाला ख़ुद को अकाल तख्त पर बिठा कर बादशाह और सरकारों सभी से ऊपर मान चुका था।13

लेकिन शायद 5 अक्टूबर, 1983 उस साल का सबसे ख़ौफ़नाक़ दिन था, कपूरथला से जालंधर जा रही एक बस को रास्ते में खड़े सिक्ख बंदूकधारियों ने रोक लिया। बस में लोगों को नीचे उतारा गया, चुन-चुन कर हिंदुओं को अलग खड़ा किया गया और बीवी –बच्चों की आंखों के सामने 6 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। पंजाब में चरमपंथ अब चरम पर था, एक दूसरे के सुख-दुख और त्योहारों में शरीक रहने वाले…कभी सांझा चूल्हा रखने वाले सिक्ख-हिंदू एक दूसरे को शक़ की निगाह से देख रहे थे…ये जानते हुए भी कि सभी सिक्ख चरमपंथी नहीं है, हिंदू दहशत में थे। होना ये चाहिए था कि इस घटना के तुरंत बाद राज्य सरकार को कार्रवाई करने की हर तरह की आज़ादी दी जाती लेकिन हुआ इसका उल्टा, केंद्र ने पंजाब की दरबारा सिंह सरकार को अगले ही दिन बर्खास्त कर के राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। हरित क्रांति का मॉडल पंजाब हिंसक संघर्ष से लाल हो रहा था, खेतों में खून बिखरा हुआ था, अपने ही अपनों की जान ले रहे थे।

इंदिरा गांधी की शह पर ही ताक़त हासिल कर चुका भिडरावाला स्वर्ण मंदिर पर कब्ज़ा कर चुका था, भारी मात्रा में गोला बारूद हरमंदिर साहिब के अंदर इकट्ठे होते जा रहे थे। भिंडरावाला उस अकाल तख्त पर रहने लगा था, जिसे ये दर्शाने के लिए बनाया गया था कि ईश्वर का स्थान मुग़लिया सल्तनत के बादशाह से भी ऊपर है, भिंडरावाला ख़ुद को क्या मानने लगा था ये बताने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन संभवतः इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी ये ही ताक़त तो चाहते थे, इमरजेंसी लगाना क्या इंदिरा गांधी की ईश्वरीय सत्ता जैसे किसी वजूद के आस-पास खुद को महसूस करने की इच्छा नहीं था? क्या संजय गांधी के अराजक फ़ैसले और उनके आस-पास मौजूद चापलूसों की फ़ौज उनकी ऐसी ही भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे? ज़ाहिर है इसी इच्छा के और बढ़ जाने पर हार बर्दाश्त न कर पाने, किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने और किसी भी हाल में जीत हासिल करने की इच्छा होती है और फिर भिंडरावाला जैसे लोगों का इस्तेमाल शुरु होता है। लोकतंत्र में अगर आप हमेशा सत्ता में रहना चाहते हैं, हर कीमत पर तो फिर आप लोकतंत्र के खिलाफ़ हैं, इस अलोकतांत्रिक ख्वाहिश में इंदिरा गांधी जिस धार्मिक नेता के वर्चस्व और प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहती थीं; उसी की ताक़त इतनी बढ़ाती चली गई कि वो उनके काबू से बाहर हो गया। भिंडरावाला की ताक़त इतनी बढ़ चुकी थी आनंदपुर प्रस्ताव पारित करने की मांग के बीच नए स्वायत्त खालिस्तान का झंडा मार्च 1981 में श्री आनंदपुर साहिब पर फहरा दिया गया था। सितम्बर 1981 में लाला जगत नारायण की हत्या के आरोप में भिंडरावाले को गिरफ्तार किया गया तो इंडियन एयरलाइस का विमान अपहृत कर के लाहौर ले जाया जाता है और इसके बदले में भिंडरावाले को रिहाई मिलती है। लेकिन केंद्र सरकार उसके बाद भी इस संत को लेकर नर्म बनी रहती है, वजह सिक्खों को सिर्फ एक वोटबैंक के रूप में देखते रहना। भिंडरावाले की ताकत बढ़ती जा रही थी और साथ ही दुस्साहस भी, अकाली दल धर्म युद्ध का एलान कर चुका था और पंजाब हिंसा, अपहरण और हताशा की चपेट में था।

मयंक सक्सेना

मयंक सक्सेना

स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त पर जरनैल सिंह भिडरावाला काबिज़ था, दिल्ली में कांग्रेस और इंदिरा गांधी, दोनों ही एक-दूसरे पर काबू करना चाहते थे। एक क़ानून की आड़ में और एक धर्म की आड़ में…समानता एक थी, दोनों ही पक्ष संभवतः लोकतंत्र और संविधान की प्रस्तावना पर भरोसा नहीं करते थे…एक ने उसे पढ़ा था, एक को पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी...इंदिरा गांधी की का जिस्म गोलियों से छलनी हो कर 1, सफ़दरजंग रोड के द्वार पर पड़ा था, आर के धवन कुछ समझ पाते इससे पहले ही ये सब हो चुका था, सुरक्षाकर्मी स्तब्धता से हरक़त में आ चुके थे, दोनों हमलावर सुरक्षाकर्मियों को कब्ज़े में ले लिया गया था…सन्नाटा पहले गोलियों की आवाज़ से टूटा था, फिर सन्नाटा छाया था कुछ देर स्तब्धता का…अब फिर से शोर था, पीएम के आवास की एंबुलेंस नहीं आ सकती थी… सोनियां गांधी घर के अंदर से बाहर की ओर भाग कर आ रही थीं, इंदिरा बेहोश थीं और खून से आस पास की ज़मीन भीग रही थी, अभी शायद धरती की खून की प्यास बुझी नहीं थी…और खून चाहिए था ज़मीन को…आखिर इसका स्वाद चखाया भी तो सियासत ने ही था….

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लेखक परिचय – मयंक सक्सेना, अलग अलग मीडिया हाउस से लेकर फ्री लांस तक का काम। कारपोरेट मीडिया से विरोध और उसके खिलाफ़ लगातार लेखन। फिलहाल उत्तराखंड आपदा के वक्त नौकरी छोड़ कर गढ़वाल के आपदा प्रभावित गांवों में राहत-पुनर्वास के काम में जुटे हुए। वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर के शिष्य।

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  • Published: 4 years ago on October 31, 2013
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  • Last Modified: November 4, 2013 @ 2:27 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. mahendra gupta says:

    ………और देश को आतंकवाद कि गोद में झोंकने वाली कांग्रेस अभी भी सबक नहीं ले पाई है , उसके कारनामे फिर एक बार कोई हादसा कराएँगे. भा ज पा को जान से खतरा बताने वाले राहुल अपने ही दल के कारनामों के शिकार न हो जाएँ, जिस भस्मासुर को वे आज खड़ा कर चुके हैं केवल उसमें नियमित सॉस प्रवाह कि जरूरत है.

  2. ………और देश को आतंकवाद कि गोद में झोंकने वाली कांग्रेस अभी भी सबक नहीं ले पाई है , उसके कारनामे फिर एक बार कोई हादसा कराएँगे. भा ज पा को जान से खतरा बताने वाले राहुल अपने ही दल के कारनामों के शिकार न हो जाएँ, जिस भस्मासुर को वे आज खड़ा कर चुके हैं केवल उसमें नियमित सॉस प्रवाह कि जरूरत है.

  3. हरमीत जी इसीलिए आप से कह रहा हूं कि आगे आने वाले हिस्से पढ़ें…ये पूरा लेख नहीं है सीरीज़ है…और हां, इस लेख को लिखने का मकसद ही अल्पसंख्यकों के मुद्दे और उन को न्याय न मिलने से स्टेट के प्रति उनका अविश्वास ही है…
    In the next few parts of this series I will only be talking about the issues of minorities and how they have been deceived by the Indian State…Just hold on and wait for the whole series to be published…

  4. Harmeet Brar says:

    It was really sorry to read your interpretation of Punjab crisis. You have misquoted and misinterpreted the facts. You have played in the hands of Indera Gandhi when you say that it was all a communal crisis.
    I do not object when you say Bhindrawala was in touch with congress and Sanjay Gandhi. But that was his part of politics to achieve his political aims for which he also scarify his life. You may not agree with his political agenda but you must not misinterpret.
    It was all a political crisis that sparked after Jawhahar lal Nehru step back from his promise to Sikhs made before freedom. If you read Anadpur Sabhib resolution, passed by elected Akali leaders and same was adopted by Bhindrawa later, you will hardly find any religious demand.
    All the demands in Anandpur Sahib resolution were political and demand of Khalistan was nowhere. Bhindrawal too never said Khalistan was his preference. He only said if you cannot meet our demands then you must separate us.
    Only to dilute political agenda, Indera gandhi made it look like communal clash and she had all the resources, as Narinder Modi have in this era, to create a perception of terrorists about Sikhs.
    You proved that she was successful in her agenda as even to criticise her, you adopted misconceptions installed by her in the minds of people to dilute political struggle of Punjabies (Not Sikhs) as Anadpur Sahib resolution had nothing to do with religious demands.
    Your article is laughable.

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