/यह अश्लीलता नहीं, क्रूर चेहरा है अखिलेश सरकार की पुलिस का…

यह अश्लीलता नहीं, क्रूर चेहरा है अखिलेश सरकार की पुलिस का…

उत्तर प्रदेश पुलिस अपनी कार्यशैली को लेकर यूँ तो हमेशा ही सवालो के घेरे में रहती है लेकिन अखिलेश यादव कि सरकार में उत्तर प्रदेश पुलिस पूरी तरह निरंकुश हो चुकी है. समाजवादी पार्टी के मंत्रियो और विधायको के पैर छू छू कर उन्हें सैल्यूट मारनी वाली हमारी यूपी पुलिस आम जनता के लिए खलनायक की भूमिका में नज़र आ रही है या यूँ कहना कि अखिलेश यादव कि पुलिस आम जनता की पिटाई को सदैव तत्पर रहती है, गलत नहीं होगा! ये बात हम हवा में नहीं कह रहे बल्कि इन तस्वीरों को देख कर आपको भी यकीन आ जायेगा कि समाजवाद का रंग अब यूपी पुलिस पर भी पूरी तरह चढ़ चुका है.
up police

ये पहली तस्वीर है बाराबंकी सदर तहसील की जिसमे बाराबंकी के सीओ सिटी विशाल विक्रम सिंह और कुछ पुलिसकर्मी अज़हर नाम के व्यक्ति को लातों और घूंसों से जानवरों की तरह पीट रहे है. अज़हर का कसूर महज़ इतना था कि वो तहसील दिवस के मौके पर सजे डीएम और एसपी के दरबार में अपनी पत्नी से झगड़ बैठा था. अज़हर की यही करतूत सीओ सिटी विशाल विक्रम सिंह को इतनी नागवार गुज़री कि उन्होंने अज़हर को तहसील परिसर में दौड़ा दौड़ा कर उसे जानवरो की तरह पीटा और ऐसी भद्दी भद्दी गालियां दी जो सड़क छाप मवालियो के मूँह से ही सुनी जा सकती है. इस घटना के वक़्त बाराबंकी की डीएम और एसपी दोनों ही मौजूद थे लेकिन किसी ने भी न तो इस बर्बरता का विरोध किया और न ही बर्बरता दिखाने वाले पुलिसकर्मियो पर कोई कार्रवाई. शायद बड़े अधिकारी भी भी इस कड़वे सच को करीब से जान गए हैं कि प्रदेश में जंगल राज चल रहा है और कोई कुछ भी कर सकता है.

ये दूसरी तस्वीर भी दास्तान बयान कर रही है अखिलेश की पुलिस के उस तालिबानी कहर कि जो पुलिस ने क़ुर्बान अली नाम के एक व्यक्ति पर बरपाया है. बाराबंकी के टिकैत नगर इलाके में रहने वाले क़ुर्बान अली को पुलिस 3 सितम्बर को खेत से उठा ले गयी और उस पर जुवा खेलने का आरोप मढ़ कर इतना सितम बरपाया कि जिसे देख कर क्रूरता के लिए मशहूर तालिबान भी शर्मिंदा हो जाये. इस मामले में पीड़ित ने बाराबंकी के पुलिस कप्तान से शिकायत भी की लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई. थक हार कर क़ुर्बान अली ने अदालत से न्याय कि फ़रियाद की और अदालत ने आरोपी पुलिस कर्मियों के खिलाफ बंधक बना कर मारपीट और जान से मारने कि धाराओं में मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए है जिसके बाद पुलिस को मज़बूरन मुकदमा दर्ज करना पड़ा है.

(कामरान अल्वी की फेसबुक वाल पोस्ट पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.