/इंदिरा-भिंडरावाला, ख़ुदाओं की जंग में इंसानियत की मौत…

इंदिरा-भिंडरावाला, ख़ुदाओं की जंग में इंसानियत की मौत…

पिछले अंक से आगे

(इंदिरा गांधी की का जिस्म गोलियों से छलनी हो कर 1, सफ़दरजंग रोड के द्वार पर पड़ा था, आर के धवन कुछ समझ पाते इससे पहले ही ये सब हो चुका था, सुरक्षाकर्मी स्तब्धता से हरक़त में आ चुके थे, दोनों हमलावर सुरक्षाकर्मियों को कब्ज़े में ले लिया गया था…सन्नाटा पहले गोलियों की आवाज़ से टूटा था, फिर सन्नाटा छाया था कुछ देर स्तब्धता का…अब फिर से शोर था, पीएम के आवास की एंबुलेंस नहीं आ सकती थी… सोनियां गांधी घर के अंदर से बाहर की ओर भाग कर आ रही थीं, इंदिरा बेहोश थीं और खून से आस पास की ज़मीन भीग रही थी, अभी शायद धरती की खून की प्यास बुझी नहीं थी…और खून चाहिए था ज़मीन को…आखिर इसका स्वाद चखाया भी तो सियासत ने ही था….)

-मयंक सक्सेना||

इंदिरा गांधी पर गोलियां बरसाते सतवंत और बेअंत रुके तो आस पास के सारे लोग सकते में थे, अचानक छाई खामोशी को बेअंत सिंह ने ही तोड़ कर कहा, जो करना था…कर दिया…अब जो करना हो कर लो…होश में लौटे लोगों को पता ही नहीं था कि करना क्या है, आर के धवन चीखे एंबुलेंस लाओ लेकिन एंबुलेंस थी ही नहीं, पीएम की एंबुलेंस का ड्राइवर वहां मौजूद ही नहीं था। 1 सफदरजंग पर भगदड़ मच चुकी थी, ठीक वैसी ही भगदड़ जैसी कि त्रिलोकपुरी की सिक्खों की बस्ती में 1 नवम्बर, 1984 की सुबह से मची हुई थी। जो घर से जान बचाने के लिए सड़क पर जाता, वो सड़क पर घेर कर मारा जा रहा था, हालांकि इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर के बाद से ही एम्स और सफ़दरजंग अस्पताल के पास हिंसा शुरु हो चुकी थी।

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सिक्ख ऑटोरिक्शा वालों पर लगातार हमले हो रहे थे लेकिन अब निशाना थीं वो बस्तियां, जहां उन पर हमला आसान था। पूर्वी दिल्ली में 31 अक्टूबर की रात जो आग सुलगी वो पूरे इलाके और इंसानियत को जलाने लगी थी। आग लगाने वाले सड़क पर बेखौफ़ घूम घूम कर बेगुनाह सिक्खों का शिकार कर रहे थे, और उनकी मदद कर रहे थे कांग्रेस के ही कुछ स्थानीय नेता। देश की राजनीति अपना वो चेहरा दिखा रही थी, जिसका इस्तेमाल कर के इंदिरा गांधी और संजय गांधी चुनावी राजनीति को साधना चाह रहे थे। इंदिरा गांधी ने ये तथ्य भुलाया था कि एक तरह का चरमपंथ दूसरे तरह के चरमपंथ को ताक़त देता है, पंजाब में हिंदुओं की हत्या का बदला अब इंदिरा गांधी के नाम पर लिया जा रहा था। दोनों ही ओर बेगुनाह मारे गए थे, पंजाब में हिंदू और दिल्ली में सिक्ख…कुसूरवार थी सियासत और सज़ा मिल रही थी इंसानों को…

दिल्ली के त्रिलोकपुरी के ब्लॉक नम्बर 36 के गुरद्वारे को आग लगाई जा चुकी थी, दंगई राजनैतिक संरक्षण में पूरे इलाके में फैल कर तोड़फोड़ और आगजनी करने लगे थे। सिक्ख परिवार घरों में छिपे हुए थे, पुलिस ने उनको सुरक्षा का भरोसा दिलाया था, संभवतः ठीक वैसा ही भरोसा जैसा अल्पसंख्यकों को दिलाया जाता है। एकाएक लगने वाले नारों की आवाज़ तेज़ होती गई और हिंसा शुरु हो चुकी थी, शाम होते होते सैकड़ों लोगों की भीड़ ने लोगों को घर से निकाल कर उन पर तेल छिड़क कर उन्हें ज़िंदा जलाना शुरु कर दिया था।

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प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो किसी भी तरह भागने के अलावा न तो कोई चारा था और न ही कोई रास्ता। कई लोगों ने आनन फानन में कैंचियों से अपने केश काटे और बाग कर जान बचाई तो कई ने केश हटाने की जगह जान दे देना बेहतर समझा, देश की राजधानी में इंसान ने इंसानों के खिलाफ़ हिंसा का सबसे बदसूरत खेल दिखाया। सुरक्षा का वादा करने वाली पुलिस नदारद थी, धीरे धीरे लोगों की समझ में आने लगा था कि पुलिस दंगे नहीं रोकेगी…न ही सरकार…न ही कांग्रेस…दंगे वाकई स्टेट स्पॉंसर्ड भी होते हैं, बस सरकारें बदलती हैं और शिकारों के धर्म…

लेकिन 31 अक्टूबर की उस सुबह इंदिरा गांधी का जिस्म सफदरजंग रोड के पहले मकान के बाहर अचेतन पड़ा था, सोनिया गांधी अंदर से दौड़ कर बाहर आ चुकी थीं, लौह महिला के जिस्म से खून बहता जा रहा था…उसी अफरातफरी में एक सरकारी एंबेसडर में इंदिरा जी के अचेत शरीर को डाला गया और गाड़ी बढ़ चली एम्स की ओर। गाड़ी में इंदिरा गांधी के सिर को गोद में रखे सोनिया गांधी थीं, जिनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। गाड़ी तेज़ रफ्तार से एम्स की ओर बढ़ रही थी, वैसे ही बढ़ रही थी 5 अक्टूबर 1983 को वो एक बस भी जो कपूरथला से जालंधर की ओर बढ़ रही थी। इस बस में हिंदू और सिक्ख दोनों ही सवार थे, अचानक रास्ते में बस को रोक लिया जाता है, हिंदू परिवारों को अलग किया जाता है और औरतों-बच्चों के सामने उनके परिवारों के पुरुषों की हत्या कर दी जाती है। कांग्रेस की सरकार इसके लिए भिडरावाला के नेतृत्व में चल रहे पूरे खालिस्तान आंदोलन को दोषी ठहराती है लेकिन अपनी ही राज्य सरकार को बर्खास्त कर के पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा देती है। सवाल ये था कि क्या पंजाब में उस दौर में चल रही हिंसा के लिए क्या सिर्फ अलगाववाद और अलगाववादी नेता ज़िम्मेदार थे, या फिर ज़िम्मेदारी थी शासक वर्ग की वो राजनीति जिसके तहत संजय गांधी और जैल सिंह ने जरनैल सिंह भिंडरावाला को चुना और इंदिरा गांधी सरकार ने भिंडरावाला को वो असीमित ताकत दे डाली कि उसे रोकना ख़ुद उनके लिए भी मुश्किल हो गया? क्या अल्पसंख्यकों के अलगाववादी रास्ते पर जाने के लिए वो ज़िम्मेदार होते हैं या फिर राज्य की नीतियां? क्या सरकार अगर आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को थोड़ा लचीला कर के अमली जामा पहना पाती तो भिंडरावाला और खालिस्तान की मांग को थामा जा सकता था? क्या इस हिंसा और अलग खालिस्तान की मांग की ज़िम्मेदारी कहीं ज़्यादा कांग्रेस और उसके नेताओं की थी, जिन्होंने मज़हब की सियासत की भट्टी में एक भस्मासुर तैयार किया? ख़ैर हिंदुओं के खिलाफ़ हिंसा ही लगातार एक पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की हिंसा की पृष्ठभूमि…1384873_10151993130811605_405876395_n

पंजाब में लाला जगत प्रकाश की हत्या के बाद से ही लगातार हिंदू परिवारों पर हिंसा जारी थी, हिंदू परिवार पलायन करने लगे थे; भिंडरावाला इस हिंसा में हाथ होने से साफ इनकार कर रहा था, हर इंटरव्यू में जरनैल सिंह भिंडरावाला की ओर से इस हिंसा का खंडन आता था लेकिन साथ ही वो इस हिंसा की निंदा या फिर इसे रोकने की अपील करने से भी साफ इनकार कर देता था। जरनैल सिंह भिंडरावाला का कद इतना बढ़ चुका था कि वो आत्ममुग्धता की चरम सीमा पर था, वो ईश्वर के लिए आरक्षित अकाल तख्त पर बैठने लगा था। कहीं न कहीं ये सत्ता द्वारा दी गई ताक़त से आया अहम था, और इस के साथ ही पंजाब के गांवों में घूमने वाले इस संत के पास जन समर्थन की भी ऐसी ताक़त आ चुकी थी कि वो अति महात्वाकांक्षी भी हो चुका था। लेकिन दरअसल जनता का भिंडरावाले को समर्थन किसी स्वार्थ के वशीभूत नहीं था, भारत जैसे किसी भी संसदीय लोकतंत्र में वोटबैंक की सियासत जिस तरह से अल्पसंख्यकों की उपेक्षा करती है, वैसा ही भाव सिक्खों के मन में भी था, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लागू करने की मांग लम्बे समय से हो रही थी और साथ ही धीरे धीरे उनके भीतर भरा जा रहा धार्मिक विद्वेष और अलगाव का ज़हर…किसी भी शख्स को धार्मिक चरमपंथी बनाने के लिए सिर्फ उसे ये भरोसा दिलाना होता है कि उसका मज़हब ही सच्चा और सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन इस व्यवस्था में वो उपेक्षित है क्योंकि वो अल्पसंख्यक है…जरनैल सिंह भिंडरावाला भी ये ही कर रहा था, बस इस धारणा का पहला हिस्सा कभी ठीक नहीं होता और दूसरा हिस्सा सच के काफी करीब था। इंदिरा गांधी को लेकर एंबेस़डर तेज़ी से एम्स की ओर बढ़ रही थी, लेकिन शायद देश का मज़हबी-सामाजिक ताना बाना पिछले कई साल से कोमा में था।

1415819_10151993130806605_1011618046_n1 नवम्बर की शाम से फैली हिंसा में दिल्ली के पूर्वी इलाकों की सिक्ख बस्तियों में फैलती जा रही थी, तमाम सिक्खों को अपनी जान गंवानी पड़ी, वो भी उन लोगों के हाथों, जो कभी एक साथ बैसाखी और होली मनाते रहे, घर में रोटियां साझा होती रहीं। गले में टायर डाल कर जो लोग जला दिए गए, उनके घर की औरतों को ज़िंदा कैसे छोड़ा गया होगा, ये सोचना मुश्किल नहीं है…दंगे 1 नवम्बर की रात रुके नहीं, बढ़ते चले गए…2 नवम्बर को पहली बार कुछ पत्रकार दिल्ली के त्रिलोकपुरी समेत तमाम इलाकों में पहुंचे, पुल बंगश और आस पास भी हिंसा शुरु हो चुकी थी। ख़बर थी कि कांग्रेस के नेता जगदीश टाइटलर भीड़ को हिंसा में मदद कर रहे थे, सिक्खों को ढूंढ कर मारा जा रहा था, इस बीच उत्तर प्रदेश के कानपुर से भी हिंसा की ख़बरें आने लगी थीं। दंगों की आग में देश सुलगना शुरु हो चुका था, इस बार भी निशाने पर अल्पसंख्यक थे, मुसलमान नहीं…सिक्ख…अल्पसंख्यकों पर हिंसा के इतिहास में नया अध्याय लिखा जा रहा था, पहली बार देश में हिंदू सिक्खों के खिलाफ़ हिंसा कर रहे थे…धर्म की अफ़ीम का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा था….इंदिरा गांधी की हत्या की वजहों को दरकिनार कर के मज़हबी हिंसा शुरु हो गई थी…इस बीच 1, सफ़दरजंग रोड पर इंदिरा गांधी पर हमला करने वाले बेअंत सिंह और सतवंत सिंह को सुरक्षाकर्मी पकड़ कर अंदर के एक कमरे में ले गए थे और उन पर काबू करने की कोशिश हो रही थी।

मयंक सक्सेना
मयंक सक्सेना

आयरिश टीवी की डाक्यूमेंट्री टीम सन्न खड़ी थी, अभी तक उसकी समझ में नहीं आया था कि आखिर ये हुआ क्या है…एम्स की ओर भागती कार को कुछ पत्रकारों ने भी देख लिया था, उनको इंदिरा तो नहीं दिखीं थी लेकिन बदहवास और रोती सोनिया गांधी दिखाई दी थीं….सियासत और मज़हब का घालमेल खूनी था पर अब सब के सिर पर खून सवार था…ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेने का एलान हक़ीकत में बदल चुका था…खून बहुत बह चुका था…अभी और बहना बाकी था…      

लेखक परिचय – मयंक सक्सेना, अलग अलग मीडिया हाउस से लेकर फ्री लांस तक का काम। कारपोरेट मीडिया से विरोध और उसके खिलाफ़ लगातार लेखन। फिलहाल उत्तराखंड आपदा के वक्त नौकरी छोड़ कर गढ़वाल के आपदा प्रभावित गांवों में राहत-पुनर्वास के काम में जुटे हुए। वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर के शिष्य।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.