/प्रति व्यक्ति गप्प…

प्रति व्यक्ति गप्प…

-आलोक पुराणिक||

निम्नलिखित निबंध एमए हिंदी के उस छात्र की कापी से लिया गया है, जिसने हिंदी निबंध के परचे में टाप किया है. छात्र ने गप विषय पर ललित निबंध यूं लिखा है-
गप जैसा कि सब जानते हैं कि गप होती है. Alok Puranik
गप का हमारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महती महत्व है.
बल्कि कतिपय विशेषज्ञ जानकार तो मानव जीवन की उत्पत्ति के मूल में गप का योगदान मानते हैं. गप स्कूल आफ मानव ओरिजिन स्कूल के विशेषज्ञों का विचार है कि जब कुछ नहीं था, तब परमेश्वर थे और हव्वा और आदम थे.

परमेश्वर रोज अपना प्रवचन दोनों को सुनाया करते थे.
उनके प्रवचनों से बोर होकर एक दिन आदम ने हव्वा से कहा या हव्वा ने आदम से कहा-चल छोड़, ऐसे बोरिंग प्रवचनों को, गार्डन में चलकर गप करते हैं.
दोनों ने खूब गप की.
तत्पश्चात भूख लगी तो सेब खाया.

सेब खाने के बाद जो हुआ, वह सब जानते हैं. मानव जाति यूं अस्तित्व में आयी. जरा कल्पना कीजिये कि अगर आदम-हव्वा गप के लिए गार्डन में नहीं आते, तो क्या होता. तो बस यह होता जी कि परमेश्वर अब भी प्रवचन सुना रहे होते और आदम और हव्वा अब भी प्रवचन सुन रहे होते.
और कोई ना होता.
इस तरह से गप ने मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त किया.

गप का भारी राजनीतिक महत्व भी है. ऐसा कई विद्वानों का मानना है कि संसद में जो भी कुछ नेतागण करते हैं, वह दरअसल परिष्कृत किस्म की गप की श्रेणी में ही आता है. पर कुछ विद्वानों का मत है कि नहीं ऐसा नहीं है. नेता संसद में और भी बहुत कुछ करते है, जिन्हे गपबाजों के खाते में नहीं डाला जा सकता. जैसे इतिहास में किसी गपबाज पर कभी यह आरोप नहीं लगा कि उसने सवाल पूछने के लिए किसी से पैसे लिये. असली गपबाज घंटों सिर्फ और सिर्फ निर्मल आनंद के लिए बहुत चिरकुट किसिम के सवाल पूछ सकते हैं, बिना कुछ लिये हुए. सो सांसदों की हरकतों को गप मानना सरासर अनुचित है.
कई विद्वानों का मानना है कि क्या ही बेहतर हो कि हमारे नेता लोग सिर्फ और सिर्फ सच्ची की गप करें. तब हम उनकी दूसरी हरकतों से बच जायेंगे.

गप का बौद्धिक योगदान भी कम नहीं है, एक जमाने में जिन आइटमों को विशुद्ध चंडूखाने की, चकाचक लंतरानी की श्रेणी में रखा जाता था, अब उन्हे बाकायदा खबर, बौद्धिक चिंतन का विषय माना जाता है. जैसे कुछ दिनों पहले एक गप आयी थी कि उन्नाव के एक गांव के एक मंदिर में टनों सोना निकलनेवाला है. ढेर से टीवी चैनल कूद लिये भाई को कवर करने.कुछ दिन के लिए सोना ही सोना ही मचा रहा, टीवी चैनलों पर, हम नेताओं के फोटू से बच गये.

इस तरह हम कह सकते हैं कि गप का हमारे समाचार जगत में भारी योगदान है, गप और गपोड़ी न हों, तो सारे समाचार चैनल सूने हो जायें.

खैर गप का सिर्फ इतना भर योगदान नहीं है. गप का प्रेम संबंधों में भी योगदान है.
उदाहरण के लिए प्रेमी प्रेमिका से कहता है-आई लव यू.
वही प्रेमिका पत्नी बनने के पांचेक साल बाद सोचती है कि हाय आई लव यू बयान सिर्फ गप ही था. पर अगर तब ही इसे गप मान लिया गया होता, तो प्रेम संबंधों का विकास कैसे होता. अर्थात सफल प्रेम संबंधों की नींव सफल गप पर ही टिकी होती है, विफल प्रेम संबंधों के मूल में प्राय वे प्रेमी होते हैं, जिनके पास गप-कौशल नहीं होता.

कई आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जिन्हे हम पंचवर्षीय योजनाओं के नाम से पुकारते हैं, वे भी दरअसल गप ही हैं. थोड़ी जटिल किस्म की गप, जिनका आनंद तमाम फाइव स्टार सेमिनारों में अर्थशास्त्री आदि ही ले पाते हैं.

भारतीय सामाजिक जीवन में तो गपों का अत्यधिक ही योगदान है.
अरैंज्ड मैरिज में दोनों पक्ष बात की शुरुआत गप से ही करते हैं.
जैसे कन्या पक्ष कह सकता है-लड़की के मामा अमेरिका के लुजियाना स्टेट में डिप्टी गवर्नर हैं.
जैसे वर पक्ष कह सकता है-लड़के के चाचा हवाई द्वीप में पांच फाइव स्टार होटलों के मालिक हैं.
लड़का और लड़की के क्रमश फूफा, ताऊजी, ताऊजी के साढ़ूजी, साढ़ूजी के सालेजी,सालेजी के साढ़ूजी-सबकी गप होने के बाद ही बात इस ठिकाने पर पहुंच पाती है कि असल में लड़की और लड़की क्या हैं.

जैसा कि सब जानते हैं कि इस तरह की सामाजिक बातचीत में इस तरह की गप को बहुत समादृत भाव से देखा जाता है. इस श्रेणी के गप-कुशल बंदों को व्यवहार कुशल, दुनियादार, चालू आदि विशेषणों से विभूषित किया जाता है.

गप की साहित्य में भी महती भूमिका है.

बल्कि यह कहना अनुचित न होगा, कि बहुत कायदे के गपोड़ी ही श्रेष्ठ साहित्यकार बन पाये हैं. जैसे भारत के प्राचीन ग्रंथ –आल्हा-ऊदल में एक महत्वपूर्ण बयान है, जिसका आशय है कि आल्हा ऊदल बड़े लड़ैया जिनकी मार सही ना जाये, जा दिन जन्म भयो आल्हा को, धरती धंसी अढ़ाई हाथ. अर्थात पृथ्वी अपने लोंगिट्यूड और लेटिट्यूट से करीब ढाई हाथ खिसक गयी. वैज्ञानिक इस विशुद्ध गप मानते हैं, पर गपोड़ी इसे विशुद्ध वैज्ञानिक तथ्य मानते हैं और बताते हैं कि एकदम सटीक कैलकुलेशन है कि ढाई हाथ, वरना तो तीन हाथ भी लिखा जा सकता था.

कई विशेषज्ञों का मानना है कि किसी राष्ट्र की प्रगति का सही पैमाना प्रति व्यक्ति आय नहीं है, बल्कि यह तो पतन का पैमाना है. जहां आय बढ़ती है, वहां गप कम हो जाती है. अरे आदमी कमाता क्यों है, ताकि चैन से आराम से बैठकर गप-शप कर सके. पर हा हंत, ऐसा नहीं होता. विकास का एकैदम सटीक पैमाना है -प्रति व्यक्ति गप. अर्थात किस राष्ट्र में बंदे कितनी गप करते हैं. कहना अनावश्यक है कि गपों का आधिक्य उस राष्ट्र की मौज का इंडेक्स माना जा सकता है. अत यह भी कहना अनावश्यक है कि इस पैमाने पर भारत विश्व का सर्वाधिक विकसित राष्ट्र है. औसतन एक भारतीय रोज कम से कम पांच घंटे की गपबाजी अपने अंदर करता है, बाबाओं और नेताओं के भाषणों समेत.

इस तरह से हम कह सकते हैं कि गपों का राष्ट्र के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महती योगदान है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.