/उल्लास और जिंदादिली के पर्याय थे विजयदान देथा…

उल्लास और जिंदादिली के पर्याय थे विजयदान देथा…

-केदारनाथ सिंह||

मैं अभी एक सप्ताह पहले जोधपुर गया था और जाने का उद्देश्य यही था कि विजयदान देथा जी से मिल सकूंगा. उनका गांव जोधपुर से करीब 60-70 किलोमीटर दूर है.vijaydan
मुझे बताया गया कि वृद्धावस्था के कारण अब उनसे बात नहीं हो पाएगी. वो अब लगभग मौन हो गए हैं. कुछ भी कहने पर उनकी तरफ के कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है.
इसके बाद मैंने उनके पास जाना स्थगित किया, लेकिन फिर भी मैंने फोन पर संपर्क किया. मेरी आवाज़ उन तक पहुंचाई गई, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला. इस तरह उनके जाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो गई थी.
जहां तक उनके साहित्य का सवाल है तो एक बात जाननी ज़रूरी है कि वो मूल रूप से राजस्थानी के लेखक थे और सौभाग्य से उनका लगभग पूरा साहित्य हिंदी में अनुदित होकर आ गया है.
उनकी रचनावली कई खंड में प्रकाशित होने जा रही है.
मैं कहूंगा कि वो एक जादुई कथाकार थे. क्योंकि वो अपने ढंग के अकेले ऐसे कथाकार थे जिन्होंने लोक साहित्य और आधुनिक साहित्य के बीच एक बहुत ही मज़बूत पुल बनाया था.
मेरी जानकारी में नहीं कि भारत के किस दूसरे आधुनिक लेखक ने यह काम किया.
उन्होंने राजस्थान के लोक साहित्य में बहुत गहराई तक पैठ की. बातां री फुलवारी नाम से राजस्थानी में उनका जो कथाओं का संग्रह प्रकाशित हुआ था, वो एक अलग कृति है और मेरा ऐसा विश्वास है कि 20वीं सदी के जो लेखक इतिहास अक्षुण्ण रहेंगे उनमें विजयदान देथा का नाम भी होगा.
उनके जैसा मनुष्य भी मिलना मुश्किल है. बहुत ही जिंदादिल और जीवन को रस की अंतिम बूंद तक निचोड़ कर जीने वाले व्यक्ति थे वो.
मैंने अपने एक बहुत ही प्रिय मित्र को खो दिया है और भारतीय साहित्य ने अपने एक विलक्षण आधुनिक लेखक को खो दिया है, जिसकी कोई भरपाई है ही नहीं.
उनके साहित्य का मूल्यांकन तो होता ही रहेगा क्योंकि हमारे बीच से उनका साहित्य नहीं गया है. वह व्यक्ति गया है जो उस साहित्य का निर्माता था.
मेरा ख्याल है कि इस समय हम उस व्यक्ति को याद करें और मेरे सामने उनकी अनेक तस्वीरे हैं. मैं कहूंगा कि मैं उन्हें लगातार चलते-फिरते हुए देख रहा हूं.
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं उनसे मिलने गया था, लेकिन मिल नहीं पाया. आप समझ सकते हैं कि यह मेरी व्यक्तिगत पीड़ा है, जिसे मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं.
वो बीच-बीच में कभी फोन कर देते थे कि “केदार आ जाओ.” और जिस प्यार से वो आवाज़ लगाते थे, उसमें गहरी आत्मीयता की कशिश होती थी, जो उनकी ओर खींचती थी.
अब यादें ही शेष हैं
उनके जाने से राजस्थानी साहित्य तो दरिद्र हुआ ही है, लेकिन पूरे भारतीय साहित्य का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कोना हमेशा के लिए खाली हो गया है.
मुझे याद आता है कि साल 1986 के आसपास हम कश्मीर में साथ गए थे और वहां हमने चीड़ के एक विशाल वृक्ष को देखा. इस पेड़ की छाल पर कुछ नाम खुदे हुए थे.
तो उन्होंने बहुत दुख प्रकट करते हुए कहा, “इससे पेड़ कमजोर होगा. उसकी छाल सूखेगी. इसे सूखने से बचाना चाहिए.”
इस पर कश्मीर के एक युवक ने आपत्ति करते हुए कहा कि यह वृक्ष हमारा है और हम इसका जैसे उपयोग करना चाहेंगे, करेंगे. उसकी इस बात पर विजयदान देथा ने प्यार भरा आक्रोश प्रकट किया.
वो वृक्षों, फूलों और पत्तियों के चाहने वाले थे.
वो रवीन्द्र नाथ टैगोर के बहुत बड़े प्रशंसक थे और शरत के वो लगभग भक्त थे. उन्होंने पूरा विश्व साहित्य गहराई के साथ पढ़ा था.
जहां उन्हें अच्छा लगता था वो एक लाल पेंसिल से बहुत गहराई से उसे रेखांकित करते थे. इस तरह उनकी पूरी किताब रंगी हुई मिलती थी.
आज से करीब तीन साल पहले उनके गांव में मैं उनसे अंतिम बार मिला था. शाम को मेरे एक मित्र ने प्रस्ताव दिया कि ठंडी शाम है, इसलिए उसे थोड़ा गरमाया जाए और वहां कुछ जाम का इंतजाम किया गया.
विजयदान देथा अस्वस्थ थे और बिस्तर पर पड़े हुए थे. वो उठ कर बैठ गए. बोले भाई कि आज मैं भी लूंगा थोड़ी. उन्हें सुनने में कठिनाई हो रही थी, लेकिन बात करने में कोई कठिनाई नहीं थी.
इस तरह उन्होंने वो शाम मनाई हमारे साथ. वो काफी प्रसन्न थे. आम तौर पर वो खाने की मेज तक नहीं जा सकते थे, लेकिन उन्होंने कहा कि वो खुद़ खाना लेंगे.
जीवन का उल्लास और उसकी अंतिम लौ का साक्षात्कार मैंने उस यात्रा में उनके साथ किया था.

(प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह से बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी की बातचीत पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.