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कॉर्पोरेट मीडिया भूल गया सोनी सोरी को…

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में कल हुए अड़सठ फ़ीसदी मतदान की ख़बरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे भारतीय मीडिया के लिए छत्तीसगढ़ के आदिवासी या सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी कोई TRP नहीं बटोरते शायद इसीलिये जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को अंतरिम ज़मानत देते समय उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार के जुल्मों सितम से बचाने के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस को यह निर्देश देता है कि सोरी और लिंगा को सकुशल दिल्ली पहुंचाए. मगर आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का यह फैंसला भारतीय न्यूज़ चैनलों की नज़रों में यह कोई खबर नहीं बना. हो सकता है कि इस फैंसले पर चलाई गई एक छोटी से पट्टी भी इन न्यूज़ चैनलों के आकाओं को बुरी लगती.soni8

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि कोर्ट इन दोनों को और ज़्यादा ज़ुल्मों से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से ज़मानत पर रिहा करती है. छत्तीसगढ़ पुलिस को अब सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को ससम्मान अपनी देखरेख में दिल्ली तक पहुंचा कर वापिस जाना होगा.

गौरतलब है कि जिस समय सुप्रीम कोर्ट यह फैंसला सुना रहा था ठीक उसी वक्त कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर में भाषण दे रही थी और करीब करीब सभी न्यूज़ चैनल्स सोनिया गांधी के अंबिकापुर रैली दिखा रहे थे.

दरअसल छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका रही, सोनी सोरी को पांच अक्तूबर 2011 को क्राइम ब्रांच और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त अभियान में दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था. उन पर माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप है.

सोनी सोरी का मामला अक्तूबर 2011 में चर्चा में आया था, जब कोलकाता के एक अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने सर्वोच्च अदालत को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें सोनी सोरी के शरीर में कुछ बाहरी चीज़ें पाई गईं. लेकिन यह टीम यह नहीं तय कर पाई कि ये वस्तुएं कैसे सोनी के जननांगों में घुसीं. बाद में सोनी सोरी ने बताया था कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने उसके जननांग में पत्थर इत्यादि भर दिए थे.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.