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राजीव गांधी कमीशन को बतौर पार्टी फंड इस्तेमाल करना चाहते थे…

By   /  November 13, 2013  /  No Comments

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आज जबकि ज्यादातर राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा विवादों के घेरे में है, हाल ही में प्रकाशित एक किताब ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. इस किताब के लेखक पूर्व सीबीआई प्रमुख एपी मुखर्जी ने दावा किया है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हथियारों के सौदे में मिले कमीशन को कांग्रेस पार्टी के लिए बतौर फंड इस्तेमाल करना चाहते थे.rajiv-gandhi

अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी खबर के मुताबिक, एपी मुखर्जी ने राजीव गांधी से जून 1989 में हुई बातचीत के आधार पर अपनी किताब में यह दावा किया है. किताब का नाम है, ‘अननोन फेसेट्स ऑफ राजीव गांधी, ज्योति बसु एंड इंद्रजीत गुप्ता’.

याद रहे कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम बोफोर्स घूस मामले में भी उछला था.

पूर्व सीबीआई डायरेक्टर मुखर्जी ने अपनी किताब में लिखा है, ‘राजीव गांधी को सलाह दी गई कि ज्यादातर रक्षा डीलर ‘रुटीन प्रैक्टिस’ के हिसाब से जो कमिशन देते हैं, उसका इस्तेमाल कांग्रेस पार्टी के ‘अपरिहार्य’ खर्चों के लिए किया जाना चाहिए. राजीव ने इस बात को बढ़ावा दिया. वह चाहते थे कि इस पैसे का ठीक तरह से हिसाब रखा जाए और यह बेईमान अधिकारियों और नेताओं के हाथों में न पड़े.’

मुखर्जी ने आगे लिखा है, ‘इससे देश भर में पार्टी के लिए ढेर सारा फंड जमा किया गया. इससे पार्टी के संगठन, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच एक किस्म का ‘बेशर्म गठजोड़’ पैदा हो गया. राजीव ने मेरे साथ कॉफी पीते हुए बताया कि उन्हें इस बात का अंदाजा था.

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  • Published: 4 years ago on November 13, 2013
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  • Last Modified: November 13, 2013 @ 12:15 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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