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इश्तिहार के गब्बर सिंह…

By   /  November 14, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

सुपर-हिट फिल्म कृष थ्री में फिल्म में सिर्फ रितिक रोशन ने रकम कमा कर नहीं दी है, तमाम आइटमों के कम से कम पच्चीस ब्रांडों ने इस फिल्म में रोल किया है. फिल्म की निर्माण लागत करीब 90-100 करोड़ रुपये की आधी रकम तो ब्रांडों ने इश्तिहारी आय के जरिये पहले ही दे दी है.Krrish-3

क्लासिक फिल्म शोले के पुनर्निर्माण में ब्रांडों का रोल क्या रहेगा, यह देखें-
गब्बर सिंह सुगंधा नामक पान मसाला चबा रहा होगा.
सांभा-सरदार पान मसाला चबाना सेहत के लिए हानिकारक है. स्वास्थ्य विभाग केंद्र सरकार के इश्तिहार में आपने बताया था. ये बताने का हमको पांच करोड़ रुपया मिला था.

गब्बर सिंह-अबे सांभा, ये सुगंधा पान मसाला है, स्पेशल पान मसाला, साफ सुपारियों और सुगंधित केवड़े से बनाया जाता है, जैसे मनोज वाजपेयी एक पान-मसाले के इश्तिहार में पान-मसाले फैक्ट्री में विजिट करके चेक करते हैं, वैसे ही हमने भी चेक किया है. सुगंधा पान मसाला बहुतै बढ़िया पान मसाला है, मुंह में खूब सुगंधा, कदमों में रामगढ़.

एक सीन में बसंती गब्बर सिंह के सामने बंधी खड़ी होंगी.
गब्बर सिंह पूछेंगे-अरे ओ सांभा, कऊन सी चक्की का, कऊन से ब्रांड का आटा खिलाते हैं रामगढ़वाले, देख तो बहुत कटीली नचनिया दिखती है.
सांभा कहेगा- कऊन से ब्रांड का आटा खिलाते हैं, आपके इस सवाल का जवाब है कि भक्ति भोग आटा खिलाते हैं.

तब ही बसंतीजी बयान देती हैं-मेरे शानदार डांस का राज चावर डांस स्कूल की ट्रेनिंग, शानदार, जानदार डांस सिखाने का एकमात्र स्कूल चावर डांस स्कूल, संपर्क करें- मोबाइल नंबर……….

एक और सीन में वीरु टंकी पर चढ़कर दारु पीकर मार मचा रहे होंगे.

नीचे मौसी और बसंती वीरु से निवेदन कर रही होंगी-वीरु देसी दारु पीकर अपनी हेल्थ खराब ना कर, नीचे आ तेरे लिए खास उम्दा विशेष इंगलिश दारु टैगपाइपर का इंतजाम है.
वीरु नीचे आकर दारु की बोतल हाथ में लेकर डायलाग बोलता है-टैगपाइपर हमारी दारु.

उफ्फ, इस तरह के दृश्यों-डायलोगों से तो फिल्म की स्टोरी बदल जायेगी, कहां की कहां पहुंच जायेगी.
शटअप स्टोरी चाहे बदल जाये, कहीं की कहीं पहुंच जाये, पर फिल्म में इश्तिहारों का कमाई का आंकड़ा नहीं बदलना चाहिए-200 करोड़ ब्रांड कमा कर देंगे, बसंती-वीरु-गब्बर नहीं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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