/अब हो जाइए तैयार, आ रहा है कलमाडी का चैनल – एक्सप्रेस पर सवार

अब हो जाइए तैयार, आ रहा है कलमाडी का चैनल – एक्सप्रेस पर सवार

ऐसा लगता है कि भारत में जिसे भी मीडिया की मार पड़ती है वही अपना बचाव करने को एक मीडिया हाउस खोलने में जुट जाता है। मीडिया की तत्परता से जेसिका लाल हत्या कांड में सजा पाए मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा ने जब इंडिया न्यूज की शुरुआत की थी तो सिद्धांतों वाले कई पत्रकारों ने उनकी नौकरी बजाने से इंकार कर दिया था। बाद में उस चैनल में कुछ दोयम दर्ज़े के मीडीयाकर्मियों ने मोर्चा तो संभाला, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद मनु को जमानत या सजा से माफी नहीं दिला पाए और न ही उस सजा़याफ्ता धनकुबेर के पक्ष में कोई अच्छी राय कायम करवा पाए।

नीतीश कटारा हत्याकांड के आरोपी विकास यादव के बाहुबली पिता डीपी यादव ने भी स्पेस टेलिविजन के जरिए मीडीया में घुसपैठ करने की कोशिश की लेकिन बहुत कामयाब नहीं हो पाए। वहां भी कुछ बेरोज़गार हो रहे मीडीयाकर्मी ही नौकरी करने गए और वे भी कुछ ही महीनों में भाग खड़े हुए। खबर ये भी थी हाल में डीपी बिहार के एक न्यूज़ चैनल के साथ पार्टनरशिप पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन बात नहीं बन पाई।

ताजा खबर यह है कि एक सुपरफास्ट एक्सप्रेस नुमा चैनल ऐसा भी आ रहा है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह सीडब्ल्यूजी घोटाले के मुख्य आरोपी सुरेश कलमाडी के पैसे से चलेगा। अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित होने का दावा करने वाले इस चैनल में करोड़ों रुपए मूल्य के उपकरण खरीदे जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि किसी भी बड़े ग्रुप ने इस चैनल में निवेश की बात नहीं स्वीकार की है।

चैनल की  वेबसाइट के मुताबिक यह एक फूड कंपनी की इकाई है जो सुरेश कलमाडी की कर्मभूमि पुणे में स्थित है। इस कंपनी के निदेशक तथा मालिक साईं बाबा के भक्त माने जाते हैं जो अपने लगभग हर उपक्रम का नाम उन्हे ही समर्पित करते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि सुरेश कलमाडी के निजी सचिव मनोज भूरे के पेट्रोल पंप का नाम भी साईं सर्विसेज़ है जिस पर सीबीआई ने छापेमारी की थी।

इस चैनल की कमान एक ऐसे मीडीयाकर्मी (पत्रकार नहीं लिखा जा सकता) को सौंपी गई है जो इसके पहले एक बदनाम बिल्डर का दुर्नाम चैनल लांच कर चुके हैं। खबर है कि उस स्वनामधन्य चैनल प्रमुख की तनख्वाह सात लाख रुपए प्रतिमाह है। इतना ही नहीं, लाइसेंस के लिए आईबी रिपोर्ट और दूसरे कागजातों को मैनेज करने के नाम पर भी उन प्रमुख महोदय ने लाखों की हेराफेरी की है।

इस चैनल में कई ऐसे मीडीयाकर्मियों को भर्ती कर लिया गया है जो कहीं नौकरी में नही थे या अन्य संस्थानों से निकाले जा चुके हैं। इस विशाल सेना में कई सेनापति हैं जो अक्सर एक दूसरे के खिलाफ ही मोर्चा खोले रहते हैं। हालांकि इस फौज़ को संभालना चैनल प्रमुख के लिए भी मुश्किल हो रहा है और वहां से अक्सर झड़पों और मारपीट की खबरें आती रहती हैं।

सूत्रों के मुताबिक सीडब्ल्यूजी घोटाले की जांच कर रही एजेंसियों को इस नवोदित ‘मीडीया संस्थान’ के गुमनाम मालिक के बारे में खबर मिल गई है और इसके दस्तावेज़ों को खंगालने के लिए छापेमारी भी की गई है। अभी इस बारे में खबर नहीं मिली है कि इस अपकमिंग चैनल पर कोई कार्रवाई तय हुई है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस खबर के सार्वजनिक होने पर कुछ गैरतमंद मीडीयाकर्मी जल्दी ही संथान को गुडबाय कह देगें।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.