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पत्रकारिता का संकटकाल नहीं, संपादकों और पत्रकारों का संकटकाल…

By   /  November 21, 2013  /  No Comments

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-दिलीप सी मंडल||

यह पत्रकारिता का संकटकाल नहीं है. यह संपादकों और पत्रकारों का संकटकाल है. उन महान संपादकों का दौर गया जो गलत खबर दिखाकर दंगा करा पाते थे, छात्रों को आत्मदाह के लिए उकसा पाते थे, जो यह दंभ पाला करते थे कि वे सरकारें बना और बिगाड़ सकते हैं.journalism

प्रिंट और टीवी मीडिया में आई बहुलता तथा सोशल मीडिया और इंटरनेट के विस्फोट ने पत्रकारिता को सूचनाओं और समाचारों के लाखों स्रोतों के दौर में पहुंचा दिया है. अब प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकार कौन है, बल्कि सवाल यह है कि पत्रकारिता कौन कर रहा है. अगर आप सूचनाएं और समाचार लोगों तक पहुंचा रहे हैं, तो आप पत्रकारिता की नौकरी न करते हुए भी पत्रकार हैं.

अब लागों के पास सच जानने के सैकड़ों-हजारों तरीके हैं. पाठक और दर्शक लगातार सीख रहा है और मैच्योर हो रहा है कि विश्वसनीय समाचार कहां से ले. पत्रकारों के लिए विश्वसनीय बने रहने और विश्वसनीय दिखने की गंभीर चुनौती है.

खासकर इसलिए भी कि मीडिया की आंतरिक संरचनाएं और इसके अपने खेल-तमाशे अब लोक-विमर्श के दायरे में हैं. लोग यह मीमांसा करने लगे हैं कि ऐसी खबर क्यों दिखाई जा रही है और कोई खबर क्यो नहीं दिखाई जा रही है.

मीडिया निरक्षरों के युग के अंत का अर्थ, तथाकथिक महान संपादकों के युग का अंत भी है.

(दिलीप सी मंडल की फेसबुक वाल से)

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  • Published: 4 years ago on November 21, 2013
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  • Last Modified: November 21, 2013 @ 8:16 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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