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चैनल वन में हर छह महीने बाद सत्ता पलट..

By   /  November 25, 2013  /  No Comments

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चैनल वन का इतिहास हमेशा से बदलने वाला रहा है. हर छ महीने पर यहां सत्ता बदल जाती हैं. दरअसल 3रड ग्रेड के चैनलों में 1 नम्बर स्थान रखने वाला चैनल वन न्यूज का मालिक ही नहीं चाहता कि चैनल को देश का नम्बर 1 न्यूज चैनल बनाया जाए. कई हुक्मरान आये और चले गये लेकिन ना तो चैनल 1 नम्बर बना और ना ही उसकी तासीर बदली. इस चैनल में 5 महीने पहले एक मीडिया का बड़ा नाम जुड़ा जिसने पूरी कोशिश की, कि चैनल का लुक बदल जाए और चैनल एक नम्बर बने लेकिन चैनल को किसी भी एंगल से बदल नहीं पाये. उसके बाद मालिकान ने उन्हें चलता किया. उनके जाने के बाद चैनल फिर उसी ढ़र्रे पर चलने लगा जैसा पहले चलता था. लाजमी है कोई भी पत्रकार आयेगा तो अपनी टीम लेकर आयेगा साथ ही पूरी कोशिश करेगा कि इस चैनल को इंडिया न्यूज बना दें. ये भी सत्य है कि हर कोई दीपक चौरसिया नहीं बन सकता. और दीपक चौरसिया बनने का सपना देख अपने पैर में कुल्हाड़ी मार लेता है. साथ ही जिन पत्रकारों को टीम में लाता है एक से दो महीने में उन्हें भी बेरोजगार कर देता है. ताजा वाकिया संजय पाठक व शंकर अर्निमेष की टीम का हैं ज्यादातर लोग उनकी टीम में आज भी बेरोजगार हैं और रीज्यूम लेकर मीडिया के बाजार में टहल रहे हैं.channel-one-logo-n_1

कुछ दिन पहले एक बार फिर चैनल वन में सत्ता बदला और नये लोग आये, बाकायदा अपनी टीम के साथ. अब नया चेहरा है नवीन पांडे का जो कई सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं. चैनल वन ज्वाईन करने से पहले इंडिया टीवी में 100 न्यूज के प्रोड्यूसर रहे नवीन पांडे जो पिछले दो साल में 4 चैनल बदल चुके हैं. अब चैनल वन को देश का नम्बर 1 न्यूज चैनल बनाने में लगे हैं अच्छी बात है शुभकामनाएं हैं. उनकी टीम कुछ ऐसी है आउट पुट हेड हैं योगेश गुलाटी जिनकी मीडिया में पैदाईश तो ईटीवी की हैं लेकिन उसके बाद फोकस टीवी, जीएऩएऩ, टीवी 100 फिर जनता टीवी गये लेकिन वहां भी ठिकाना नहीं बना पाये तो अब चैनल वन में आये. अब आप इनके बारे में निष्कर्ष निकाल सकते हैं. जहां गये चैनल ही बंद करा दिये. योगेश जी के बारे में एक बात सर्वविदित है वे खुद को सीनियर कहलवाने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं अगर कोई उन्हें सर के साथ जी नहीं लगाया तो वे उसकी शिकायत नवीन पांडे तक करने जाते हैं. कोशिश करते हैं कि उसे संस्थान से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाए और ऐसा करके दिखाया भी. चैनल के विभीषण के मदद से सर ना कहने की गुस्ताखी में 4 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया. खुद तो योगेश जी आये साथ में कुछ टट्टे लाये जो रनडाउन, कापी और फीड पर आये हैं जिनमें कुछ सुदर्शन, महुआ या जनता से हैं. अब आप सोचिये जिसे रनडाउन पर लाया गया उसका खबर लिखने में तो हाथ कांपता है क्या रनडाउन पर काम करेगा. बाद में शिफ्ट की जिम्मेदारी दे दी गयी जिससे उसकी कमजोरी छिप जाए. दूसरे नम्बर के बास हैं कपिल जी जिन्हें यहां क्रियेटिव हेड के पद पर लाया गया है वे भी इंडिया टीवी से आये हैं जब से आये स्क्रीन में कुछ बदलाव तो हुआ नहीं…कपिल जी बस लगे रहते हैं. जैसे गोबर में फैट मारा जाए. इसके बाद स्पोर्ट्स हेड हैं मनीष जी जिन्हे स्पोर्टस का थोड़ा बहुत ज्ञान तो है पर उतना नहीं कि टीवी स्क्रीन को आज तक बना दें. मनीष महुआ के बंद होने पर आये साथ में एक छमिया भी लाय़े जिसे अपने साथ रखे हैं. लेकिन स्पोर्टस बुलेटिन में कोई बदलाव नहीं कर पाये. जैसा पहले था वैसा आज भी है.

इनपुट में देवेश मिश्र जो पुराने पत्रकार तो हैं लेकिन उनका भी तेवर यहां ढीला नजर आ रहा है. किसी भी चैनल की रीढ़ एडिट होती है और एडिट में नवीन जी IBN 7 से एक धुरंधर वीडियो एडिटर लाये जितेंदर को, जो कई सालों से कई चैनलों में बतौर सीनियर वीडियो एडिटर काम कर चुके हैं, लेकिन उन्हें एक लूप काटने में 10 बार सोचना पड़ता है. अब बारी है आलोक नम्बरदन साहब की पकी दाढ़ी सिर में लाल खेजाब जड़ीले पत्रकार देखनें में लगते हैं और काफी टाईम से हिन्दी अखबारों में बतौर कालमिस्ट लिखते हैं, चैनल वन में डिप्टी न्यूज एडिटर ज्वाईन कराया गया है. जिन्हें प्राइम 8 की जिम्मेदारी दी गयी है. प्राइम 8 चैनल वन के चेयर मैन का फेवरिट प्रोग्राम है लेकिन उस प्रोग्राम में कोई परिवर्तन नहीं कर पाये आलोक जी. इसके बाद संस्थान में लगातार बड़े पदों पर लोगों का आना जारी है. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वक्त बदला तस्वीर बदली अगर नहीं बदली तो चैनल वन न्यूज की तासीर, कितने आये और चले गये आखिर में चैनल वन जस का तस है.

लेखक चैनल वन का एक्स इम्पलाई है साथ ही देश के एक प्रतिष्ठित चैनल में कार्यरत है.

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  • Published: 4 years ago on November 25, 2013
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  • Last Modified: November 25, 2013 @ 7:19 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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