/‘बदनाम’ हुए तो क्या, ‘नाम’ “दाम” तो हो गया…सोचते होंगे तीनों “दाढ़ी” वाले

‘बदनाम’ हुए तो क्या, ‘नाम’ “दाम” तो हो गया…सोचते होंगे तीनों “दाढ़ी” वाले

-संजीव चौहान।।

23 साल मीडिया के नदी-नालों में गोते खाने के बाद अक्ल कुछ-कुछ खुलती सी नज़र आने लगी है। अहसास होने लगा है कि, धरती पर ऐसे धंधे की इकलौती ‘मीडिया’ ही वो जगह (माध्यम) है, जहां सब ‘निपट और खप’ जाते हैं। कहीं कुछ हाथ या नसीब में न आये तो, पत्रकार बन जाओ। पांच रुपये की कलम तक नहीं खरीदनी पड़ती है ‘कलमकार’ को। जिसे खबर छपवानी होती है, वो खुद ही कलम-कागज (लेटर पैड) का भी जुगाड़ कर देता है। हमें तो सिर्फ वहां कुछ इस स्टाइल/ चाल-ढाल से पहुंचना भर है, जिससे हम इस कथित और ढकोसलेबाज समाज में सबसे बडे़ ‘विद्वान’ (तथाकथित रुप से, खुद ही अपना मन समझाने के लिए) नजर आयें। जिसे कहीं कुछ न मिले, वो किसी पत्रकार का पौंचा (पांव) पकड़ ले। कुछ दिन उसे पान-बीड़ी-सिगरेट, चाय पानी कराये। उसके संग-संग कुछ बेतुकी जगहों पर आये-जाये मंडराये। धीरे-धीरे देखा-दाखी उसके पांव खुद ही उसे पत्रकार बनाने वाला रास्ता दिखा देंगे। सबसे ज्यादा मुश्किल आती है पत्रकार बनने के लिए उस आदमी को तलाशना, जिसका “पिछलग्गू” बनकर पत्रकारों की जमात में शामिल हुआ जा सके। इस धंधे में अगर कोई क़ायदे का “सिर” घुसवाने वाला मिल जाये, तो बदन को फिर उसमें घुसने से रोकने की किसी की कूबत नहीं रहती।

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इन दिनों नेताओं से ज्यादा छीछालेदर में (सुर्खी में) मीडिया और मीडिया के मठाधीश फंसे हैं। बंगारु लक्ष्मण को उनकी नानी याद करा के देश में स्टिंग ऑपरेशन के “पितामाह” बने मठाधीश पत्रकार “सेक्स-स्कैंडल” में लिपे-पुते पड़े हैं। आजकल उनका आलम यह है कि, गोवा और दिल्ली पुलिस उनसे अंग्रेजी में पूछती है, तो वे “पंजाबी”, “उर्दू” “हिंदी” में जबाब दे रहे हैं। अपनी आंख-कान से इसी दिल्ली में मैंने इन कथित ‘सेक्सी’ (गरम कहें तो भी चलेगा) पत्रकार को उस हाल में भी देखा-सुना था, जब हिंदी बोलने में इन्हें शर्म आती थी। बंगारु और बीजेपी की लुटिया डुबोने के बाद से इन “गरम” पत्रकार का हाल तो और भी बुरा हो गया था। हिंदी बोलने की बात छोड़िये, एक स्टिंग करने के बाद साहब ने अंग्रेजी बोलने का भी एक नया उच्च स्तरीय स्टाइल खोज पेला था। बहरहाल समय बलवान है। रावण विद्वान पंडित और शिव-भक्त होके जब खुद को नहीं बचा सका, तो इन पत्रकार साहब को भी समय ने औकात बताने में संकोच नहीं किया। एक अदद “शौक” के चक्कर में, पत्रकारों की आने वाली तमाम अदद पीढ़ियों को भी इन्होंने “माचिस की तीली” दिखा दी है।

दूसरा बवाल एक दाढ़ी वाले किसी “काबिल” पत्रकार को लेकर देश में मचा है। कहा जाता है कि, यह साहब पत्रकार तो धरातल से ही बने हैं, मगर इनकी “बुलंदियों” ने इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। धन्ना हलवाई से लेकर पत्रकारों की जमात में शामिल होने आये “शिशु” भी, यहां-वहां (सोशल मीडिया के माध्यम से या फिर अपने स्तर के सोर्सों से ) पूछते फिर रहे हैं कि, फलां दाढ़ी वाला इतना “सीनियर-जर्नलिस्ट” भी दलाल है? सुना है भाजपा का “पिछलग्गू” आज मोटी आसामी बन चुका है। करोड़ों का वारिस है। चल-अचल संपत्ति का तो हिसाब-किताब तो इस “ठेकेदार-पत्रकार” का अपने पास नहीं है। हां, लेकिन धुंआं वहीं उठता है, जहां आग लगी होती है।anuranjan jha दूसरा दाढ़ी वाला पत्रकार इन दिनों हर सुबह अपनी दाढ़ी की तेल-मालिश कर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे, आम इंसान हर रोज मेहनत-मजदूरी करके खाने-कमाने के जुगाड़ में जुटता है। इस कथित पत्रकार की तारीफ और पहचान यह है कि, इसने शायद ही कभी पत्रकारिता की हो। 23 साल ( सन् 1990 से लेकर अब तक ) के तो अपने ही पत्रकारिये करियर में कम-से-कम मैंने तो अपनी आंख से इस तथाकथित पत्रकार की कभी न तो कोई खबर पढ़ी है और न ही कोई खबर कभी किसी चैनल पर ऐसी देखी, जो इस नामुराद को पत्रकार समझूं । हां, इसके बारे में यह जरुर सुना है, कि इसने जिस थाली में खाया, उसी में छेद कर दिया। मसलन खुद के काले कारनामे छिपाने के लिए बाजार में हिंदी न्यूज चैनल लेकर आने वाले एक बिल्डर माफिया ने इसे नौकरी दी। सुना जाता है कि, इसने उसी का “स्टिंग” ऑपरेशन करके उसे अपनी और उसकी दोनो की औकात बता दी।
उस स्टिंग सीडी को लेकर सांप-बिच्छू और नाग-नागिन का डांस दिखाकर और हर तीसरे दिन “दुनिया खत्म होने” की घटिया, फर्जी, फरेबी और झूठी खबरें गढ़कर “टीआरपी” हासिल करने वाले एक हिंदी न्यूज चैनल के सर्वे-सर्वा ने इसे नौकरी दी। फितरती दिमाग और खिचड़ी दाढ़ी वाला यहां भी बाज़ (नहीं चूका) नहीं आया। इसने वहां भी अपनी “औकात” दिखा दी। सो सांप-बिच्छू के दम-खम पर पत्रकारिता की मां-बहन कर रहे उस चैनल के सर्वे-सर्वा ने भी इसे अपने यहां से निपटा दिया।

कुछ दिन दिल्ली से लेकर बिहार, छत्तीगढ़, झारखंड की सड़कों पर मारा-मारा फिरता रहा। इस मंशा से कि,कहीं बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाये। कोई फाइनेंसर जाल में आ फंसे, और यह चैनल खुलवाने के नाम पर खा-कमाकर “रफूचक्कर” हो जाये। जब फाइनेंसर नहीं फंसा, तो बिचारे ने दक्षिणी दिल्ली में स्थित हरियाणा के एक नेता के नये चैनल में “मजूदरी” (पत्रकारिता में अब भारत में नौकरी नहीं मजदूरी ही कर रहे हैं सब…यह बात मैं मानता हूं…सब नहीं) कर ली। इस चैनल के मालिक का लड़ैता और बिगड़ैल सुपुत्र दिल्ली की एक मॉडल की हत्या के आरोप में आज भी तिहाड़ जेल में चक्की पीस रहा है। वहां से भी इस दाढ़ी वाले को निकाल दिया गया। जिन्होंने निकाला या इसे निकलवाया, उन्हीं की कृपा से उसी चैनल में इसे फिर थूक के चटवाने के लिए बुला लिया गया। बाद में यहां से भी इसे निकाल फेंका गया।
इसके बाद यह खिचड़ी दाढ़ी वाला उस चैनल में जाकर बैठ गया, जिसकी बागडोर कभी दिल्ली पुलिस के एक पूर्व डीसीपी (अब नहीं) के हाथों में होती थी। वहां भी इसने खुद को मजबूत करने के लालच में उन तमाम निरीह कर्मचारियों को निकाल दिया, चैनल की मजदूरी से जिनके परिवार चल रहे थे। हांलांकि बाद में उन सबसे बुरा हश्र इसका भी हुआ। इसने चैनल के मालिक को ब्लैकमेल करने का तानाबाना तो वहां भी बुना था, लेकिन वो चैनल मालिक इसका “गुरु” निकला, सो इसने वहां से खिसकने में ही खैर समझी। इसके बाद यह फिर शिकार की खोज में निकला। कुछ दिन इधर-उधर भूखे-प्यासे भटकने के बाद इसे “शिकार” मिल गया। यह शिकार था एक पेशेवर पत्रकार। इस पत्रकार को घेरकर दाढ़ी वाले ने उसका भी काम कर दिया। शिकार हुए पत्रकार से दाढ़ी वाले ने एक वेबसाइट खुलवा डाली, और खुद उसका सर्वे-सर्वा बन बैठा। यह अलग बात है कि आज बदले हालातों में उसी वेबसाइट के लिए किया गया एक स्टिंग-ऑपरेशन अब इसके गले की फांस बनता जा रहा है।
इतना लिखने के बाद और 23 साल से पत्रकारिता की मूल धारा में शामिल रहने के बाद भी मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि, जिस शख्स (खिचड़ी दाढ़ी वाला) ने कभी कोई धमाकेदार/ चर्चित खबर की ही नहीं, भारतीय मीडिया उसे पत्रकार बनाने पर उतारु क्यों है? उसे किसी का स्टिंग करने का ह़क दिया ही किसने, क्यों और कैसे? एक बात तो यह…दूसरी बात यह कि इन दिनों देश में मीडिया के अंदर भूचाल तीन दाढ़ी वाले ही क्यों लाये हुए हैं? क्या हमारे पास (मीडिया) इस वक्त इन तीन “वाहियात” और “ओछे” दाढ़ी वालों पर इतनी “चिल्लपों” मचाने के अलावा कोई और मुद्दा नहीं बचा है।

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