/बटुकेश्वर दत्त को भूल गए हम…

बटुकेश्वर दत्त को भूल गए हम…

-अंकित मुत्त्रीजा।।

आपने भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरू पर फिल्माई फिल्मों में देखा होगा कि एक रोज़ बहुत बड़े मिशन के तहत भगत सिंह बहरी-गूँगी अंग्रेजी हुकूमत तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश संसद में बम फेंकते हैं और कुछ पर्चे बांटने के साथ ही तुरंत अपनी गिरफ्तारी देते हैं.इस मिशन को अंजाम देने में जो शख्स भगत के साथ साए की तरह साथ में मौजूद रहा और जिसने भगत सिंह के साथ ही ब्रिटिश संसद में गिरफ्तारी दी उनका नाम बटुकेश्वर दत्त था जिनकी अठारह नवंबर को एक सौ तीन वीं जयंती गुज़र भी चुकी और ऐसा लगा नहीं कि हमारे जागरूक साथियों को भी इस बारे में मालूमात थी. खैर, इस ऐतिहासिक और साहसिक मिशन के लिए बट्टुकेश्वर दत्त का चुनाव भगत सिंह ने यूं ही नहीं किया था बल्कि उसके पीछे उनका लंबा जूझारू क्रांतिकारी इतिहास रहा था. इससे पहले बट्टु ने आगरा में बम की फैक्टरी लगाई थी जिसके चलते अंग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें काला पानी की सजा दी.download (1)

ये वहीं दत्त हैं जिन्होंने भगत सिंह के साथ ब्रिटिश जेलों में भारतीय क्रांतिकारियों,राजनेताओं के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ़ लाहौर जेल में 144 दिन की भूख हड़ताल करके अंग्रेज़ी तंत्र की नींद उड़ा दी थी.उन्होंने अपनी नौजवानी के लगभग पंद्रह साल देश की आज़ादी के लिए नरक सरीखी जेल की सलाखों के पीछे गुज़ारे.आप सोच रहें होंगे कि अचानक मुझे इस गुमनाम क्रांतिकारी की याद क्यों आईं?दरअल,हाल में जश्न-ए-आज़ादी बनाई गई जिसमें मशगूल हम सब देशभक्त कम ही ऐसे वीरों को याद कर श्राद्धांजलि देते हैं जिनके लंबे संघर्ष और बलिदान की वज़ह से हमें आज़ादी हासिल हुई.फिर,नेता जी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित रहस्य से लेकर भगत सिंह को भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों में शहीद का दर्जा दिलवाने के हमारे तमाम दावें खोखले साबित होते हैं जब हम बट्टु जैसे स्वतंत्रता सेनानी के साथ पेश आए व्यवहार से वाकिफ़ होते हैं.तमाम साथियों को खो देने के बाद बट्टुकेश्वर एक मात्र इतने महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने आज़ादी की सुबह देखी.उन्होंने आज़ादी का जश्न देखा,बंटवारे के वक़्त साम्प्रदायिक आधार पर हो रहे कत्लेआम की टीस महसूस की.अपने सपनों के भारत को तो शायद बंटवारे के वक्त ही वो जलते देख रहे थे लेकिन इसी दौरान उन्होंने देखा कि कैसे वतन की खातिर खुशी-खुशी मौत का कफ़न ओढ़ने वालों को वतन वालें भुला देते हैं.आज़ादी की लड़ाई में शरीक बट्टुकेश्वर लगातार मुल्क को गुलामी की अंग्रेज़ी जंजीरों से निकालने के लिए उग्र संघर्ष करते रहे जिसके परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी दयनीय हो गई.इसी कड़ी में देश की आज़ादी के बाद भी उन्हें गुरबत की ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी.

जश्न-ए-आजादी के शोर-गुल के बीच मुफलिसी के बादलों से घिरे इस महान क्रांतिकारी को रोजगार की खातिर पटना की सड़कों को बतौर एक सिगरेट कंपनी एजेंट के रूप में छानना पड़ा.आगे जा कर जब यहां मामला जमा नहीं तब बट्टुकेश्वर ने बिस्कुट और डबल रोटी का कारखाना लगाया जिससे हालात सुधरने की जगह और बिगड़ते चले गए.. इस कारखाने को नुकसान के चलते बंद करने के बाद देश के शूरवीर सपूत को टूरिस्ट बनकर गुज़र-बसर करनी पड़ी.कितनी अजीब विडंबना थी कि जिस क्रांतिकारी ने अपनी पूरी ज़िंदगी देश की आजादी के लिए देशभर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ हल्ला बोला और ब्रिटिश राजतंत्र में अवैध मानी जाने वाली गतिविधियों की वजह से एक पल सुकून की साँस न ली उसे अपने आज़ाद मुल्क में मजबूरन एक टूरिस्ट बनकर ज़िंदगी काटने पर विवश होना पड़ा.जबकि,यह भारतीय सरकार और देश की आवाम का दायित्व बनता था कि वो देश के लिए अपने जीवन की आहुति देने वालें क्रांतिकारियों की देखबाल करें.

खैर,बताया जाता है कि निजी जीवन में एक के बाद एक मिली नाकामयाबी और राजनीति सामाजिक तौर पर उपेक्षा के शिकार दत्त 1964 में पटना के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए.जिसके बाद उनके मित्र चमनलाल ने संवेदनहीन समाज और सरकार के प्रति एक लेख के जरिए अपना क्रोध प्रकट किया था.आक्रोशित चमनलाल तब के केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से भी मिले जिसके बाद पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को बट्टुकेश्वर दत्त के इलाज के लिए एक हज़ार रुपय का चेक दिया.साथ ही उस समय बिहार के मुख्यमंत्री केबी सहाय को यह भी आग्रह किया कि अगर वह दत्त का इलाज कर पाने में असक्षम है तो हम उनका इलाज दिल्ली में करवाएंगे.देर से चेती सरकार और प्रशासन के दावों के बीच 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया जहां बीमार दत्त को सफदरजंग अस्पताल में एक कमरा मिलने तक में देरी हुई और वहीं ये ह्रद्य विदारक जानकारी मिली की वो कैंसर से पीड़ित हैं.इस दौरान भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार में लाया गया और ठीक, 17 जुलाई को कोमा में चले जाने के बाद 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर दत्त बाबू इस बेवफा दुनिया से विदा हो गए.अपनी ऐसी हालत से दत्त इतने आहत थे कि उन्होंने इसका मर्मांतक जिक्र करते हुए कहा भी था कि उन्होंने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली में मैंने बम डाला था उसी दिल्ली में एक अपाहिज की तरह स्ट्रैचर पर लाया जाऊंगा.अहसान फरामोश सरकार और समाज ने उनकी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह,राजगुरू,सुखदेव की समाधि के निकट किया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.