/क्या कर्नल सोनाराम को फिर से अपनाएगी राजस्थान की जनता ..

क्या कर्नल सोनाराम को फिर से अपनाएगी राजस्थान की जनता ..

-चंदन भाटी।।

बाड़मेर जिले की विधानसभा ‘बायतु’ में दूसरी बार विधानसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं।जाट बहुल इस विधानसभा क्षेत्र को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विरोधी कर्नल सोनाराम चौधरी का गढ़ माना जाता है।कर्नल की लोकप्रियता बायतु के लोगों के सर चढ़ कर बोलती थी मगर रिफाइनरी के मुद्दे पर उनकी पकड़ कमज़ोर हुई है।ख़ासकर रिफाइनरी का लीलाला से पचपदरा जाना उनके लिए सबसे बड़ा झटका है।वहां के लोग आज भी कर्नल से जानना चाहते हैं कि पचपदरा में रिफाइनरी का शिलान्यास करने आई श्रीमती सोनिया गांधी का उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया।अलबत्ता कर्नल के सामने इस बार कई हज़ार मतों से हारे कैलाश चौधरी भाजपा से प्रत्याशी है।चुनावी मौसम की शुरूआत में कर्नल सोनाराम कैलाश चौधरी से मजबूत लग रहे थे लेकिन चुनावों की तारीख़ नज़दीक आते-आते वो कड़े मुक़ाबले में फंसते नज़र आ रहे हैं।
karnal ki yehi photo
कर्नल सोनाराम चौधरी बाड़मेर जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे सोनाराम चौधरी ने पिछली बार बायतु से पहला चुनाव विधानसभा के लिए लड़ा जिसमें उन्होंने कैलाश चौधरी को करीब चौंतीस हज़ार से अधिक मतों से हरा कर बायतु से विधानसभा की सदस्यता हासिल की ।इस क्षेत्र के जातिगत समीकरणों पर गौर किया जाए तो मालूम होता है कि परिसीमन के बाद पहली बार अस्तित्व में आए बायतु में पचहतर हज़ार जाट,पचीस हज़ार अनुसूचित जाति,पांच हज़ार जनजाति,रावण राजपूत बीस हज़ार,आठ हज़ार प्रजापत,मुस्लिम सत्रह हज़ार मुख्य मतदाता हैं।
कर्नल सोनाराम की दबंग नेता की छवि सिर्फ़ राजस्थान तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि उनका कद राष्ट्रीय स्तर का हैं।बाड़मेर जिले के युवा अपने बयानों की वज़ह से अक्सर चर्चा में रहने वाले सोनाराम के इसी दबंग अंदाज़ के काय़ल हैं।कर्नल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से लेकर सांसद हरीश चौधरी के धूर विरोधी है।मोटे तौर पर देखा जाए तो उन्होंने   अपने पांच साल के कार्यकाल में कोई ख़ास काम नहीं किया उसके बावजूद भी जनता के सुख और दुख में हमेशा साथ खड़े रहे।वो चाहें रिफाइनरी का मुद्दा हो या रॉयल्टी का उन्होंने राज्य में अपनी सरकार पर दबाव बनाया जिस वज़ह से उनकी दावेदारी मजबूत ही बनी हुई है। शायद सोनाराम की इसी काबिलियत को देखते हुए उन्हें पार्टी की ओर से  चुनाव समिति का सदस्य बनाकर मुख्यमंत्री ने दांव खेला था।
बहरहाल,रिफाइनरी के जिस मुद्दे पर वो नायक के रूप में भले छा गए हो लेकिन बायतु में रिफाइनरी के पचपदरा शिलान्यास होते ही कर्नल के खिलाफ़ सुगबुगाहट होना शुरू हो गई।उन्होंने जिस रिफाइनरी के लिए पैरवी ना करने पर हेमाराम चौधरी,सांसद हरीश चौधरी को निशाना बनाया उसी से आहत हो कर हेमाराम ने इस्तीफ़ा दे दिया।हेमाराम ने बाद में चुनाव लड़ने से मना भी किया।कर्नल का विरोध गांवों में बढ़ता जा रहा हैं वहीं उनके विरोधी उनके खिलाफ़ लामबंद हो कर उन्हें हराने में जुटे हैं।कुल मिलाकर कहने को कर्नल बायतु में भारी हैं मगर उनके विरोधी कितना रूख बदल पाते हैं इसका पता तो चुनाव परिणाम के बाद ही लगेगा।
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