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संगठन बनाम सरकार ?

By   /  November 27, 2013  /  No Comments

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-अंकित मुत्त्रीजा।।
पिछले दिनों देश की राजनीति में भूचाल सा आ गया | दागी जनप्रतिनिधियों के लिए लाए गए अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुछ ऐसे पेश आए जैसे वह विपक्ष की भूमिका निभा रहे हो | उनके इस तरह अचानक अवतरित होने से  कांग्रेस को क्या नफ़ा हुआ और सरकार को क्या नुकसान इसकी तह में जाने के लिए कुछ सवालों के जवाब ढूंढना ज़रूरी हो जाता हैं | सवाल ये  हैं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जिस भाव-भंगिमा और भाषा शैली के साथ सरकार के अध्यादेश की आलोचना की क्या यह घटनाक्रम सरकार बनाम संगठन के बीच दरारों को ज़ाहिर करता हैं ? या फिर,मिस्टर क्लिन की छवि खोते मनमोहन और विश्वनीयता के संकट से जूझती उनकी सरकार से संगठन को अलग दिखाने की सोची-समझी कवायद भर हैं ? दोनों सवालों में यहां सरकार बनाम संगठन के बीच दीवार खड़ी होने की एक लंबी पृष्ठभूमि हैं जिसके बारे में बात करना मनमोहन सिंह की जी हुजूरी वाली छवि के भ्रम को तोड़ता हैं |
बगावती तेवर में राहुल

बगावती तेवर में राहुल

दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर लाया गया अध्यादेश कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट के पास पहुंचा था | कांग्रेस कोर ग्रुप की अध्यक्षता खुद सोनिया गांधी करती हैं | फिर सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष को इस अध्यादेश की जानकारी नहीं थी जिसे उन्होंने बकवास करार दिया |इससे पहले विधेयक पर भी अगर वह चाहते तो जनता के समक्ष अपने विचार ज़ाहिर कर सकते थे| माना जा रहा है कि विधेयक से अध्यादेश लाने के दौरान चुप्पी साधे रखने वाले राहुल और उनकी युवा बिग्रेड तब सक्रिय हो गई जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश पर अपनी सांकेतिक आपत्ति जताई | ऐसे में युवा नेताओं ने राहुल को ज़मीनी धरातल पर इस अध्यादेश के खिलाफ़ बन रहे माहौल से परिचित करवाया और उन्हें चेताया कि इस ग़लत फैसले का फायदा भाजपा को मिल सकता हैं | तब उनके ऑफिस 11 तुगलक रोड पर अध्यादेश का विरोध करने की स्क्रिप्ट लिखी गई |  और साथ ही साथ उन्होंने पीएम को पत्र लिख दिया | पत्र पहले पीएमओ को सौंपा गया फिर फैक्स के माध्यम से वॉशिंगटन गए प्रधानमंत्री को|
यहां सवाल उठता है कि क्या राहुल कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर अध्यादेश के खिलाफ़ प्रस्ताव नहीं ला सकते थे ?(ज़ाहिर तौर पर जिसके बाद कांग्रेस के प्रवक्ताओं को यह समझा दिया जाता कि इस अध्यादेश वापसी का श्रेय कैसे राहुल को देना हैं)ऐसा करने से सरकार की लाज भी रह जाती और राहुल की पप्पू छवि जनता के मसीहा के रूप में भी पेश की जा सकती थी|सवाल यहां यह भी है कि   क्या वो प्रधानमंत्री के अमेरिकी यात्रा से आने का इंतज़ार नहीं कर सकते थे ? पहली नज़र में देखें तो उनका  ये कदम डैमेज कंट्रोल की रणनीति नज़र आएगा लेकिन उनकी भाषा शैली और राजनीति में सबसे अहम स्थान रखने वाले ‘वक्त’ पर गौर किया जाए तो इससें यह भी समझ आ जाता है कि ऐसा करके पार्टी ने मनमोहन सिंह को साफ़ संदेश दे दिया है कि अब आगे की कमान राहुल संभालेंगे |
(कहते हैं तसवीर बिना कुछ बोले बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन कभी-कभी तसवीरें वही कहती हैं जो हम उससें कहलवाना चाहते हैं)

(कहते हैं तसवीर बिना कुछ बोले बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन कभी-कभी तसवीरें वही कहती हैं जो हम उससें कहलवाना चाहते हैं)

 दरअसल,प्रधानमंत्री ने जब वॉशिंगटन से लौटते वक्त राहुल के बयान पर प्रतिक्रिया दी तो उनके बयान के कई निहितार्थ निकाले जा सकते हैं | उन्होंने कहा – हम देखेंगे कि हवा का रूख किस तरफ़ हैं और इस बात की तह तक जाने की कोशिश करेंगे की राहुल ने ऐसा क्यों और किस लिए कहा? हवा का रूख किस तरफ़ हैं से प्रधानमंत्री का क्या मतलब था | क्या वह यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि वह अध्यादेश को लेकर सरकार में  विचार-विमर्श करके ही आगे की रणनीति तय करेंगे बजाय गांधी परिवार के हुकूम पर हामी भरने के?  राहुल ने ऐसा क्यों कहा से क्या वह यह बताना चाह रहे थे कि राहुल ने जिस तरीके से विरोध जताया उसकी जानकारी पहले उन्हें क्यों नहीं दी गई ? जानकारों की माने तो पार्टी के भीतर यह विचार मजबूती से पकड़ बना रहा था कि प्रधानमंत्री की छवि अब धूमिल हो चुकी हैं जबकि राहुल ही पार्टी के लिए एकमात्र ऐसे हथियार हैं जिनके दम पर पार्टी आगे का कारवां तय कर सकती हैं | शहरी मध्यवर्ग में युवाओं के भीतर भ्रष्ट और आपराधिक नेताओं के खिलाफ़ ख़ासा रोष हैं जिसकों इस बगावती रणनीति के तहत राहुल ने भुनाने का प्रयास किया |अब सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह गर्दन झुकाए हर वो काम करने को तैयार हैं जो दस जनपथ चाहें ?  क्या मनमोहन सिंह आज भी वहीं मनमोहन सिंह हैं जो यूपीए -1 का कार्यकाल संभालते वक्त थे और जिस वज़ह से सोनिया ने उनपर भरोसा जताया था |  याद रहें कि इतना सब बवाल होने के बावजूद इस्तीफा नहीं दूंगा कहने वाले ये वहीं मनमोहन हैं जो इस्तीफा देने पर तब अड़ गए थे जब राजीव गांधी ने योजना आयोग के सदस्यों को बंच ऑफ जोकर कह दिया था ( जी सी सोमाया की किताब‘दी आनेस्ट स्टैंड अलोन में देखें) | राजनीतिक पंडितों की माने तो यूपीए-1 से यूपीए-2 के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह में ख़ासा परिवर्तन आए |(पत्रकार ‘अभय कुमार दुबे’ के अनुसार पिछले एक दशक में राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी मनमोहन सिंह ही हैं)सरकार की कामयाबी के लिए गुलदस्तें दस जनपथ और नाकामयाबी के लिए आलोचनाओं का ठिकरा उनके सर फोड़े जाने से वो खीझ खाने लगे|
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