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संगठन बनाम सरकार(भाग-2)अंदर की बात

By   /  November 27, 2013  /  No Comments

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-अंकित मुत्त्रीजा।।
संगठन बनाम सरकार का खेल समझने के लिए हम दो स्तरों पर आकलन कर सकते हैं | एक वैचारिक भिन्नता जो मतभेद से मनभेद की शक्ल में तब्दील होते गए|दूसरा सोची समझी रणनीति के तहत एक दूसरे को पटखनी देना | पहले बात करते हैं, वैचारिक मतभेद की जो मनभेद में बदलते गए|आपको याद होगा मनमोहन सिंह का वह विवादास्पद बयान जिसमें उन्होंने देशवाशियों को समझाया था कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता|इसी क्रम में इस बार वह कह गए थे कि बेशक मरेंगे लेकिन कुछ करके | मनमोहन और वित्त मंत्री पी.चिदंबरम वकालत कर रहे थे प्रत्यक्ष बहुब्रांड खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश की | माना जाता है कि एक लाख तीस हज़ार करोड़ के खाद्य सुरक्षा बिल को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताने वाली यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी एफडीआई पर सख़्ती से आगे बढ़ने को लेकर असमंजस में थी | वह चाहती थी कि इस बड़े फैसले पर तमाम घटकों को विश्वास में लिया जाए | जहां,तृण्मूल कांग्रेस प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगातार दस जनपथ के जरिए मनाने की कोशिशें चल रहीं और पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी उन्हें अपना एक बहुमूल्य सहयोगी बता रहे थे वहीं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री करो या मरो जैसी सख्त बयानी कर रहे थे | 14 सितम्बर 2012 को जब ममता ने समर्थन खींच लेने की धमकी दी तो 21 तारीक तक का अल्टीमेटम इस शर्त पर दिया गया कि खुद प्रधानमंत्री इस फैसले पर उन्हें विश्वास में लेंगे| सूत्रों का कहना है कि यह आश्वासन उन्हें खुद कांग्रेस और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने दिया लेकिन प्रधानमंत्री ने ममता को मनाने की कोई कोशिश नहीं की |जिसके चलते यूपीए को अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी गंवाना पड़ा |यहां तक की,प्रधानमंत्री का ‘पैसा पेड़ पर नहीं उगता’ वाला बयान देशवाशियों को कम और सोनिया के जनहितकारी ड्रीम प्रोजेक्ट खाद्य सुरक्षा बिल पर व्यंग्य ज्यादा था |एफडीआई और खाद्य सुरक्षा बिल से इतर भूमि अधिग्रहण विधेयक पर भी कांग्रेस और सरकार के बीच कई मतभेद थे जिसमे राहुल गांधी ने अपनी सोच को ग्रामीण विकास मंत्री जयराम-रमेश के जरिए लागू करवाया |

 

manmohan-sonia-dec21

 
मनमोहन सरकार की साफ़ सफ़ेद छवि पर काला धब्बा बन चुके कोयला घोटाले और रेलवे बोर्ड नियुक्ति मामले में जब क्रमश पूर्व केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल पर सवाल उठने लगे तब यह बात मुख्यधारा के मीडिया में भी सूर्खियों का विषय बन चुकी थी कि इस्तीफे में देरी के चलते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम से कड़ी नाराज़गी जताई | दस जनपथ उस समय भ्रष्टाचार विरोधी माहौल की आँधी में इन दो मंत्रियों की वज़ह से अपनी साख पर बट्टा लगवाने के पक्ष में नहीं था | जबकि, पीएम दोनों मंत्रियों के बचाव में थे | इसलिए,तमाम किरकिरी के बावजूद उन्होंने इस विवाद के तीन महीने बाद अगस्त 2013 को अपनी जापान यात्रा के लिए विशेष दूत के रूप में अश्विनी को नियुक्त कर लिया | पिछले साल जहां केंद्र सरकार ने एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने सरकार का खुलकर विरोध किया|परिणामस्वरूप. रसोई गैस की संख्या बढ़ा दी गई | इससे पहले, अमेरिकी परमाणु करार के दौरान भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विश्व बैंक और अमेरिका का एजेंट तक बतला दिया गया | दरअसल,इस करार की वज़ह से सोनिया सरकार की किरकिरी करवाने के पक्ष में नहीं थी लेकिन मनमोहन आगे बढ़े और संसद में नोटो की गड्डी वाला वह दिन इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो गया |
इस तकरार का सिलसिला वैचारिक मतभेद तक ही नहीं बल्कि उससे भी आगे भीतरी श्रेय-मात तक जा पहुंचता हैं –

 

पुलक चटर्जी

पुलक चटर्जी

इन सब पैंतरेबाज़ियों के बाद पीएमओ में एक ऐसे आईएएस अफसर को नियुक्ती हुई जो गांधी परिवार के बेहद करीबी और अज़िज हैं |उत्तर प्रदेश काडर के आईएएस पुलक चटर्जी को प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव नियुक्त किया गया | पुलक चटर्जी उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भी तैनात रह चुके हैं| चटर्जी सोनिया गांधी के स्पेशल ड्यूटी अधिकारी के रूप में भी काम कर चुके हैं | इतना ही नहीं,वे राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए भी काम कर चुके हैं | इनसे पहले या कहे सीधा मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही (2004)टीके नायर प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव कार्यरत रहे हैं |अब वह बतौर पीएम के सलाहकार कार्यरत हैं | बहराल,माना जाता है कि माना जाता है कि इस वक्त पुलक पीएमओ के जरिए राहुल के लिए रोडमैप बनाने में जुटे हैं | हालिया प्रकरण तो इसी बात की तस्दीक करते है कि कांग्रेस गांधी परिवार के लाडले को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती हैं लेकिन पार्टी के भीतर कई तरह के सवाल ऐसा करने से उसे रोके हुए हैं|हाल में गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कहीं न कहीं कांग्रेसी खेमे में सीधा खुलकर राहुल को प्रोजेक्ट करने से हिचक रहा हैं | इस खेमे की राय में राहुल को आगे करके भी पार्टी ने मुंह की खाई तो उनके राजनीतिक भविष्य पर विराम लग जाएगा और कांग्रेसी इस बात को भलि-भांति जानते है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का भविष्य क्या हैं | हालांकि,कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट में जिस तरह से प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के साथ में उनकी तसवीर आती हैं उससे तो यहीं लगता है कि राहुल को लेकर पार्टी के भीतर माहौल पूरी तरह से बनने के कगार पर हैं|अब सारा खेल बस इस बात पर आ कर अटक जाता है कि किस तरह से मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुई लानतमलामत से बचा जाए और बाहर यह संदेश दिया जाए कि राहुल के नेतृत्व में सरकार यूपीए-1 और यूपीए-2 से बेहतर काम करेगी |उसी कवायद के तहत राहुल सरकार की शिक्षा,भूमि,अकाश,अध्यादेश सरीखी नीतियों और फैसलों पर विरोधी स्वर अख्तियार करने नज़र आते हैं |

 

 

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जयपुर चिंतर शिविर को हुए ज्यादा समय नहीं गुज़रा जहां कांग्रेसियों की भाषा का मजमून राहुल को सिंहासन पर बैठाया जाने तक सीमित था | इसी चिंतन शिविर में प्रधानमंत्री के आगमन पर इतना उत्साह नहीं दिखा जितना राहुल के आने पर दिखा |हालांकि,प्रधानमंत्री अक्सर अपने तीसरे कार्यकाल को लेकर पूछे गए सवाल से बचते रहे थे लेकिन पिछले कुछ समय से वो राहुल को आगे बढ़ाने की वकालत करते नज़र आ रहे हैं | जैसे, 7 सितम्बर को सैंट पीटर्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन से वापस स्वदेश लौटकर उन्होंने कहा था कि राहुल पीएम पद के आदर्श व्यक्तित्व. हैं|उनके नेतृत्व में काम करके उन्हें अच्छा लगेगा | दरअसल यह बयान मनमोहन सिंह की ओर से गांधी परिवार के प्रति भक्ति –भाव को महज़ ऊपरी तौर पर दिखाता हैं लेकिन राजनीति में कालीन से ज्यादा कालीन के नीचे छुपी धूल का महत्व होता हैं|गौर करने पर मालूम चलेगा कि मनमोहन सिंह ये भक्ति भाव ऐसे समय दिखा रहे थे जब खुद राहुल पार्टी और सरकार में कई मर्तबा पीएम पद की दावेदारी को लेकर बात न करने की नसीहत दे चुके थे|राहुल के रणनीतिकार उन्हें धीरे-धीरे पर्दे पर लाने के पक्ष में हैं | इसके पीछे उनका मत एकदम से राहुल को प्रोजेक्ट करके आम चुनावों से पहले गुब्बारे में सुई चुबाकर उसे फुस करने से बचाना हैं | मसलन,वह जानते है कि आज जनता के मिजाज़ की लहर कांग्रेस और सरकार विरोधी ही चल रहीं हैं और राहुल फिलहाल वो करिश्माई ताक़त नहीं रखते जिससे वो इसका रूख दूसरी तरफ़ मोड़ सकें |इसलिए कांग्रेस,मनमोहन के बाद खाली होने वाली जगह और विपक्ष द्वारा साम्प्रदायिकता से बचाने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में उनको धीरे-धीरे पर्दे पर पेश करेगी|जिससें राहुल गांधी की जनता के बीच बनी पप्पू छवि को बदला जा सकें|

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