/सत्येंद्र दुबे याद हैं ना?

सत्येंद्र दुबे याद हैं ना?

 

हमारे लिए क्यों तख्तियों-पोस्टरों तक सीमित हैं सत्येंद्र जैसे लोग
हमारे लिए क्यों तख्तियों-पोस्टरों तक सीमित हैं सत्येंद्र जैसे लोग

मुझे नहीं मालूम सत्येंद्र सर कि आज आप हमारे बीच होते तो कुछ समय पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाम का आक्रोश सड़को पर देखकर क्या कहते।मुझे नहीं मालूम कि उस जनसैलाब में कितने लोग खुद पाकसाफ़ थे और कितने भ्रष्टाचारी।इंसान की फितरत ही कुछ ऐसी है कि वो बाहर जो उपदेश देता हैं खुद उन्हें अपने पर लागू नहीं करता।कहीं न कही हमारा समाज जबर्दस्त सुविधाभोग की चपेट में हैं।लेकिन,आप तो ऐसे नहीं थे ना सर।यक़ीनन होते तो अपनी जान का ज़ोखिम उठाकर इतनी बड़ी सड़क परियोजना( स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ) में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा नहीं करते।आपने कदम कदम पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम छेड़ी और अंतत:राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में इंजीनियर के पद पर रहते हुए वो सब देखकर अपना विरोध दर्ज किया जिसें हम लोग आम बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।

 

भारत आधुनिकता की ओर अग्रसर था और भ्रष्टाचार के दीमक इसे खा रहे थे जो आपसे बर्दाश्त नहीं हुआ जिसके मद्देनज़र आपने प्रधानमंत्री तक को पत्र लिख डाला।ईमानदारी,देश के प्रति कर्तव्य निष्ठा का आपको ये सिला मिला कि बिहार के सिवान जिले से शुरू हुआ आपकी कामयाबी,बुंलदी,का सफ़र बिहार के ही गया रेलवे स्टेशन पर थम गया।आपकी ईमानदारी के बदले में आपको गोलियां मिली और आज ही के दिन यानी 27 नवंबर 2003 को आप दुनिया से चले बसे।  लेकिन,मुर्दों के इस शहर में आपके ज़िंदा रह कर जीने से ये हुआ कि आप मर कर भी सदा के लिए जीवित हो गए।

बाकि,हमारी कमज़ोर याददाश्त को लेकर जानता हूं आपको कोई शिकायत नहीं ही होगी क्योंकि याद किए जाने के लिए आप जैसे लोग कभी कुछ नहीं करते।फिर भी बिना किसी किताब में ख़ास जगह बनाए,बिना किसी महानगर में मूर्ति बने,बिना किसी विशेष राज्य-धर्म-संप्रदाय का महापुरूष बने हमेशा के लिए हमारी स्मृतियों में अमर हो जाते हैं।जब कभी भी निराशा का दौर हावी होता हैं और समाज हर तरफ़ से खुदको हारा हुआ महसूस करता हैं तो आप ही जैसे लोग उसकी राह बनते हैं।काश कि हमारे देश की राजनीतिक जमात में इतना साहस होता कि वो आप पर भी राजनीति कर पाती।कम से कम इसी बहाने आज के इस संचार माध्यमों के दौर में थोड़ा सा ही सही सचमुच का सत्येंद्र बन पाते।लेकिन,यहां सूरत-ए-हाल ऐसा है कि जिस भ्रष्टाचार रूपी दीमक के खिलाफ़ आपने अपनी जान गंवाई वहीं उनके लिए सबसे क़ीमती बना हुआ हैं तो आप पर बात कैसे होगी।मालूम नहीं उस परियोजना के बाद ऐसी कितनी सड़के बनी होंगी जहां किसी सत्येंद्र की जरूरत महसूस की गई होगी या उसके होने पर भी उसका वहीं सलूक हुआ होगा जो आपके साथ हुआ। आज इतना दावे के साथ कहा जा सकता है कि शायद आज देश उस रास्ते पर तो कतई नहीं चल रहा जिस पर आप इसके चलने का सपना देखते थे।

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