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क्या आरुषि और हेमराज को इन्साफ मिला..

-दिनेशराय द्विवेदी||

चौदह वर्षीय तरुणी आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या के दोषी मानते हुए तरुणी के माता-पिता राजेश और नूपुर तलवार को आजीवन कारावास का दंड सुना दिया गया। कहा जा रहा है कि पाँच वर्ष बाद ही सही आरुषि और हेमराज के साथ न्याय हुआ। लेकिन सचमुच, क्या आरुषि और हेमराज के साथ न्याय हुआ?Aarushi-Talwar-Hemraj

निर्णय पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। निर्णय में हत्याओं के उद्देश्य के बारे में पूरा जोर इस बात पर दिया गया है कि आरुषि तथा नौकर हेमराज को आपत्तिजनक स्थिति में माता-पिता द्वारा देख लिए जाने के कारण क्रोध में आ कर तथा अपने सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने हेमराज और आरुषि की हत्या कर दी। हत्या करने के बाद माता-पिता ने सोच समझ कर अपने अपराध के सबूत छिपाए और गलत प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस को दी।

हो सकता है जिन न्यायाधीशों ने यह निर्णय दिया है वे अपने निर्णय से संतुष्ट हों, सीबीआई और पुलिस के वे अधिकारी जिन्होंने इस निर्णय के मूल आधार पर काम किया अपने काम की संतुष्टि से तृप्त हो गए हों। लाखों करोड़ों वे लोग जो इस मामले में रुचि ले रहे थे और निर्णय जानने को उत्सुक थे, संतुष्ट हो जाएँ। लेकिन मेरी तरह बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो इस निर्णय से से संतुष्ट नहीं हैं। बहुत सारे प्रश्न उन के मस्तिष्क में लगातार कुलबुला रहे होंगे।

हमारी न्याय की जो अवस्था है उस में दांडिक न्याय प्रणाली अनेक असाध्य रोगों से पीड़ित है। देश में जितने अपराध होते हैं, उनका आधा हिस्सा भी रिपोर्ट नहीं होता। पुलिस के पास किसी अपराध का अन्वेषण करने, सबूत तलाश करने, अपराधी को गिरफ्तार करने और आरोप पत्र तैयार करने के महत्वपूर्ण कार्यों के साथ-साथ ढेर सारे अन्य काम भी होते हैं। राजनैतिक दबाव भी कम नहीं होता। पुलिस को जितने मामले रिपोर्ट होते हैं, उन सभी मामलों में वह आरोप पत्र दाखिल नहीं कर पाती। जिन में आरोप पत्र दाखिल करती है और न्यायालय के समक्ष अभियोजन चलाया जाता है, उन में बहुत कम मामलों में अभियुक्तों को दंडित किया जाता है।

भारत में हत्या के जितने मामलों में अभियोजन चलाया जाता है उन में से केवल 38.5% मामलों में अभियुक्त दंडित हो पाते हैं। हत्या के प्रयास के मामलों में 30%, गैर इरादतन हत्या के मामलों में 39.1% तथा बलात्कार के मामलों में 26.4% में ही अभियुक्त दंडित हो पाते हैं। अन्य मामलों में भी अभियुक्तों को दंडित किये जाने वाले मामलों की संख्या बहुत कम है। इस का मुख्य कारण अपराधिक मामलों का अन्वेषण का स्तर बहुत खराब होना, अन्वेषण के लिए पर्याप्त अन्वेषक और साधन न होना, न्यायालयों की संख्या जरूरत की 20 प्रतिशत होने के कारण विचारण में अत्यधिक देरी होना है। केन्द्र सरकार अपराधिक मामलों में सफलता की न्यून दर पर अक्सर चिंता प्रकट करती है और उसे सुधारने के लिए कुछ करती हुई दिखाई भी देती है। लेकिन कानून और व्यवस्था का मामला राज्य का विषय होने के कारण केन्द्र का इस पर नियंत्रण नहीं के बराबर है। देश की लगभग सभी राज्य सरकारें इस ओर से उदासीन दिखाई पड़ती हैं। केन्द्र व राज्यों द्वारा अनेक कथित प्रयासों के बाद भी अपराधिक मामलों में दंडित किए जाने वाले अभियुक्तों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हो पा रही है।

0351_untitled-11न्यायालय में विचारण किए गए अपराधिक मामलों में दंडित किए जाने की दर न्यून होती है तो समाज में अपराध बढ़ने लगते हैं। यदि अभियुक्तों के दंडित होने की दर बढ़ती है तो समाज में अपराध की दर भी घटती है। भारत में अपराध दर बहुत अधिक होने तथा दंड की दर कम होने का दबाव सरकारों, पुलिस और अभियोजकों पर तो है ही। लेकिन सरकारों द्वारा कोई त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाने के कारण न्यायपालिका को भी लगातार आलोचना का शिकार बनना पड़ रहा है। जिस का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि न्यायपालिका पर यह दबाव स्थानान्तरित हुआ है।

इस दवाब के कारण अधीनस्थ न्यायालय पर्याप्त सबूतों के अभाव में बड़ी मात्रा में अभियुक्तों को दंडित करने लगे हैं। दांडिक न्याय के सुस्थापित सिद्धान्तों की बलि दी जा रही है। उन में भी जो मामले मीडिया में चर्चित हो जाते हैं उन में न्यायालयों पर अभियुक्त को दंडित करने का अत्यधिक अतिरिक्त दबाव होता है और न्यायालय यह चाहने लगे हैं कि ऐसे मामलों में अभियुक्तों को विचारण न्यायालय से अवश्य दंडित किया जाना चाहिए चाहे उन्हें अपील न्यायालय से बरी ही क्यों न कर दिया जाए। बिहार का लक्ष्मणपुर बाथे नरमेध कांड इस बात का बहुत बड़ा सबूत है, जिसमें 58 लोगों की हत्या की गई, विचारण न्यायालय ने जिन 26 अभियुक्तों को दंडित किया वे सभी पटना उच्च न्यायालय द्वारा बरी कर दिए गए। आरुषि हेमराज की दोहरी हत्या के मामले में भी मुझे यह प्रतीत होता है कि तलवार दंपती कहीं इसी तरह तो दंडित नहीं किए गए हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि मीडिया हाइप के कारण उत्पन्न दबाव से इस मामले के हाई प्रोफाइल हो जाने के लिए ही तलवार दम्पती दंडित कर दिए गए हों।

इस मामले में सीबीआई ने ऑनर किलिंग की थ्योरी पर जोर दिया है। सारा मामला इस तथ्य पर आधारित है कि आरुषि के गुप्तांग को साफ किया गया था। यह तथ्य इस मामले से हटा लिया जाए तो इस मामले का पिरामिड तुरन्त जमीन पर गिर पड़ेगा। जबकि इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत न्यायालय के समक्ष नहीं लाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि आरुषि के गुप्तांग को उस की हत्या के उपरान्त साफ किया गया था। हेमराज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कहीं भी यह उजागर नहीं होता कि उसने मृत्यु के पूर्व यौन संबंध स्थापित किए थे या करने का प्रयत्न किया था। इस तरह यह तथ्य पूरी तरह काल्पनिक प्रमाणित होता है। इस के बावजूद भी इस मामले में अभियुक्तों को दंडित किया गया है, जब कि पुडुचेरी कोर्ट ने जयेन्द्र सरस्वती और 23 अन्य अभियुक्तों को हत्या का उद्देश्य साबित न होने के कारण बरी कर दिया है।

एक चौदह वर्ष की तरुणी और एक चालीस वर्ष का नौकर उन की हत्या के बाद इस काल्पनिक थ्योरी की प्रस्तुति से लांछित किए जाते हैं कि वे एक दुष्कर्म में लिप्त थे। इस मुकदमे का निर्णय ऐसे दो व्यक्तियों के चरित्र को कलंकित करता है जो अब इस का प्रतिवाद के लिए इस दुनिया में जीवित नहीं हैं। ऐसे में भले ही चीख-चीख कर कहा जाए कि आरुषि हत्याकांड में न्याय हुआ है। लेकिन हत्या जैसे जघन्य अपराध के शिकार जिन दोनों मृतकों के साथ न्याय होना चाहिए था उन के साथ तो अन्याय हुआ है। इस निर्णय ने उन्हें बिना किसी सबूत के कलंकित कर दिया है।

न्यायालय में विचारण किए गए अपराधिक मामलों में दंडित किए जाने की दर न्यून होती है तो समाज में अपराध बढ़ने लगते हैं। यदि अभियुक्तों के दंडित होने की दर बढ़ती है तो समाज में अपराध की दर भी घटती है। भारत में अपराध दर बहुत अधिक होने तथा दंड की दर कम होने का दबाव सरकारों, पुलिस और अभियोजकों पर तो है ही। लेकिन सरकारों द्वारा कोई त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाने के कारण न्यायपालिका को भी लगातार आलोचना का शिकार बनना पड़ रहा है। जिस का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि न्यायपालिका पर यह दबाव स्थानान्तरित हुआ है।

दिनेशराय द्विवेदी वरिष्ठ कानूनविद हैं तथा तीसरा खम्बा के मॉडरेटर हैं..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.