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‘पति-पत्नी’ के साथ अब ‘वो’ भी घर में रह सकेगी…

By   /  December 2, 2013  /  4 Comments

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खंडवा, मप्र: लोक अदालत से आए एक अनोखे फैसले में ‘पति और पत्नी’ के साथ अब ‘वो’ भी घर में रह सकेगी. अदालत ने एक शख्स को आदेश दिया है कि वह बारी-बारी से 15-15 दिन अपनी पत्नी और महिला ‘पार्टनर’ के साथ बिताए.???????????

इस शख्स की पत्नी और उसकी पार्टनर एक ही छत के नीचे रहती हैं. लोक अदालत में गत शनिवार आए इस फैसले के तहत धार्मिक नगरी ओंकारेश्वर के मांधाता निवासी पति बसंत माहूलाल और पत्नी शांति के साथ बसंत के साथ पिछले दस साल से ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रह रही रामकुमारी भी एक ही घर में रहेगी.

लोक अदालत ने उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्यता देने के मद्देनजर यह फैसला दिया है. उसको अपने ‘पार्टनर’ के मकान, खेत एवं जमीन में आधा हिस्सा भी मिलेगा. इस फैसले में सबसे अनोखी बात तो यह है कि एक कमरे में पति रहेगा, जो घर के बीच में है. वहीं, उसके दूसरी ओर के एक कमरे में पत्नी और दूसरे कमरे में ‘वो’ रहेगी. पति के कमरे का दरवाजा दोनों कमरों में खुलेगा तथा पति का कमरा दोनों की ओर पन्द्रह-पन्द्रह दिन के लिए खुलेगा.

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  • Published: 4 years ago on December 2, 2013
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  • Last Modified: December 2, 2013 @ 7:11 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Ashok Gupta says:

    ghar ko vashyala bana lo

  2. mahendra gupta says:

    परिवार संस्था को तोड़ने का यह भी एक अच्छा साधन बन जायेगा.पति कि गलत हरकतों से परेशां एक पत्नी के सर पर एक और स्त्री को ला बैठने की अनुमति देना पत्नी के अधिकारों को तो समाप्त करना ही है,परिवार नाम कि संस्था को भी धीरे धीरे समाप्त करना होगा. आज पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव ही है जिस कारण लिव इन रिलेशनशिप का प्रचलन भारत में भी हुआ और इसे कानूनी सम्मति दे कर सुप्रीम कोर्ट ने चाहे एक स्त्री के अधिकारों को सुरक्षित किया हो.पर सामाजिक नियमों के अनुसार विवाह हो कर आई स्त्री के अधिकारों को ख़तम कर दिया है. कुल मिलकर नुक्सान तो स्त्री का ही हुआ है.पुरुष तो पहले भी मन मर्जी कर रहा था और अब भी दो स्त्रीयां का भोग करना उसे प्राप्त होगा,आर्थिक साधनों के अनुरूप ही तो वह उनकी मदद करेगा, और जब वह पर्याप्य नहीं तो विवाह हो आई पत्नी का ही नुकसान होगा. उचित तो यह होगा कि लिव इन रिलेशनशिप जैसी प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए जो भारतीय सामाजिक व्यस्था के सांचे में कहीं फिट नहीं बैठती.

  3. इस फैसले से जो प्रशन सामने आता है कि जुज शाहब आप ये भी लिख देते कि यदि इसी घर में यदि पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में रहने के लिए भी आ सकता तो जज साहब कि कमल पूरी हो जाती जब पति कि प्रेमिका आकर इसी घर में रह सकती है तो पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में कइयो नहीं रहा सकता है फिर सायद ये सवाल जरुर सामने आत कि ये घर किस का कहलायेगा फिर घर कि नयी
    परिभाषा भी जज साहब को लिखने पडती सायदआगे लिखते तो जज साहब ये भी भोल जाते कि बो लिखने कैय जा रहे है ये सबल ईतने कठिन हो जाते कि जज साहब भी उल्झन में फस जाते हमारी ३४ लाख वर्ष से अधिक समय कि मरिययादो को कइयो छेड़ कहानी करने कि कोशिश बहुत महगी पड़ेगी ये भारयति प्रमपर्यो कि व्यगनिक्ता ईएस के प्रोयोहजो को नहीं जानते है अफ़सोस है के भारतीय प्रमाण परयो कि सीमा ईएस के मूलीय िेक कुर्शी पर बैठ कर पता नहीं ये पालतू मस्तिक्ष के लोग किया करना चाहते है

    इस फैसले से जो प्रशन सामने आता है कि जुज शाहब आप ये भी लिख देते कि यदि इसी घर में यदि पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में रहने के लिए भी आ सकता तो जज साहब कि कमल पूरी हो जाती जब पति कि प्रेमिका आकर इसी घर में रह सकती है तो पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में कइयो नहीं रहा सकता है फिर सायद ये सवाल जरुर सामने आत कि ये घर किस का कहलायेगा फिर घर कि नयी
    परिभाषा भी जज साहब को लिखने पडती सायदआगे लिखते तो जज साहब ये भी भोल जाते कि बो लिखने कैय जा रहे है ये सबल ईतने कठिन हो जाते कि जज साहब भी उल्झन में फस जाते हमारी ३४ लाख वर्ष से अधिक समय कि मरिययादो को कइयो छेड़ कहानी करने कि कोशिश बहुत महगी पड़ेगी ये भारयति प्रमपर्यो कि व्यगनिक्ता ईएस के प्रोयोहजो को नहीं जानते है अफ़सोस है के भारतीय प्रमाण परयो कि सीमा ईएस के मूलीय िेक कुर्शी पर बैठ कर पता नहीं ये पालतू मस्तिक्ष के लोग किया करना चाहते है

  4. इस फैसले से जो प्रशन सामने आता है कि जुज शाहब आप ये भी लिख देते कि यदि इसी घर में यदि पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में रहने के लिए भी आ सकता तो जज साहब कि कमल पूरी हो जाती जब पति कि प्रेमिका आकर इसी घर में रह सकती है तो पत्नी के प्रेमी भी इसी घर में कइयो नहीं रहा सकता है फिर सायद ये सवाल जरुर सामने आत कि ये घर किस का कहलायेगा फिर घर कि नयी
    परिभाषा भी जज साहब को लिखने पडती सायदआगे लिखते तो जज साहब ये भी भोल जाते कि बो लिखने कैय जा रहे है ये सबल ईतने कठिन हो जाते कि जज साहब भी उल्झन में फस जाते हमारी ३४ लाख वर्ष से अधिक समय कि मरिययादो को कइयो छेड़ कहानी करने कि कोशिश बहुत महगी पड़ेगी ये भारयति प्रमपर्यो कि व्यगनिक्ता ईएस के प्रोयोहजो को नहीं जानते है अफ़सोस है के भारतीय प्रमाण परयो कि सीमा ईएस के मूलीय िेक कुर्शी पर बैठ कर पता नहीं ये पालतू मस्तिक्ष के लोग किया करना चाहते है

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