/क्या अन्ना हजारे ने देश के युवाओं का चरित्र बदल डाला है?

क्या अन्ना हजारे ने देश के युवाओं का चरित्र बदल डाला है?

-सुभाष नाहर।।


अन्ना हजारे के आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये बताई जा रही है कि  देश का युवा जागरूक हो कर भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर शांतिपूर्ण आन्दोलन की दिशा में अग्रसर हुआ है. ऐसा नहीं है कि देश में यह पहली बार हुआ हो. 1971 के बांग्ला मुक्ति युद्ध के समय इंदिरा गाँधी के पीछे यही शक्ति काम कर रही थी. इसी तरह जयप्रकाश नारायण के व्यवस्था परिवर्तन के आव्हान पर देश के युवा एक जुट हो गए थे. समय की बहती हवा के साथ हमारे देश का युवा हर किसी के आन्दोलन में सक्रिय हो जाता है. यही युवा है जो एक तरफ आरक्षण के विरोध में आत्मदाह तक करने को तैयार होता है और सड़कों पर देश की सम्पति को नुकसान पहुँचाने में भी पीछे नहीं रहता।
ये वही युवा है जो कल्याण सिंह कालवी जैसे राजपूत नेता के पीछे दिबराला सती के मुद्दे को लेकर सड़कों पर तलवारें लहराता है या राजपूत आरक्षण को लेकर तोड़ फोड़ करता है। कभी किरोड़ी लाल मीना या बैंसला के पीछे मीणा बनाम गुर्जर मुद्दे को लेकर रेल की पटरियों पर बैठ जाता है और पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा कर देता है। ये वही युवा है जो दिन में इंजीनियरिंग कॉलेज में पढता है और रात में सूने घरों में नकबजनी भी करता है। ये वही युवा है जो सड़क चलती युवतियों को छेड़ता है और मौका पाने पर बलात्कार तक कर लेता है। ये वही युवावर्ग है जो याहू और फेसबुक पर नकली लड़की बन कर दूसरों को बेवकूफ बनाने का प्रयत्न करता है और खुश होता है। ये वही युवा है जो राजनैतिक रैलियों कि भीड़ बढाता है और लौटते में ठेले – खोमचे लूट लेता है.

दरअसल बीबीसी की महिला पत्रकार के बयान के आधार पर इस अभियान में शामिल युवाओं की छवि काफी हद तक असामाजिक तत्वों जैसी बनी है। रही सही कसर अभियान के अंतिम दिनों असामाजिक तत्वों के साथ हुई पुलिस की मारपीट ने पूरी कर दी। ऐसे में ये सवाल जोरदार तरीके से उठ रहा है कि अन्ना हजारे के अभियान में किस प्रजाति के युवा थे। किरण बेदी का पर्स चोरी होना, महिलाओं के साथ बदतमीजी होना, बाइकर्स का निडर होकर स्टंट करना और पुलिस द्वारा मना करने पर अन्ना हजारे के समर्थन में आक्रामक तरीके से नारेबाजी करना, इंडिया गेट पर फिल्म अभिनेता जावेद जाफरी को दौड़ा -दौड़ा कर भगाना , राहुल गांधी के घर पर विरोध करने गए युवाओं द्वारा समोसा और पेय पदार्थ पर टूट पड़ना आदि ने इस अभियान में युवाओं की भूमिका पर संदेह पैदा कर दिया है।

सूत्रों की मानें तो रामलीला मैदान के आसपास का इलाका असामाजिक तत्वों का गढ़ है ध्यान रहे कि जीबी रोड रामलीला मैदान से कुछ दूरी पर ही है जहां ऐसे लोगों का जमावड़ा लगा होता है जो औरतों को सौदेबाजी का सामान मानते हैं। अन्ना के अनशन के दौरान ज्यादातर युवाओं ने अन्ना अभियान को तमाशे की तरह लिया। गुटों में बंट कर उन्होंने नारेवाजी की और खा पीकर खूब तमाशा भी किया। खाने का इंतजाम तो अन्ना हजारे के अभियान में निशुल्क था जो ऐसे युवाओं को वहां खींचता था। अन्ना टीम के प्रबंधन ने इन युवाओं का दोहरा उपयोग किया। जब तक ये अपने वास्तविक चरित्र में नहीं रहते मंच से कहा जाता रहा कि इस अभियान की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी युवा हैं वहीं जब ये युवा अपने वास्तविक चरित्र पे आए तो खुद अरविंद केजरीवाल ने मंच से कहा कि ये साजिश अभियान को बदनाम करने की है।

क्या हम यह समझें कि अन्ना के आन्दोलन ने देश के युवावर्ग का चरित्र बदल दिया है या अलग-अलग वर्गों, अलग-अलग जातियों में बंटा ये युवावर्ग अपनी सहूलियतों के हिसाब से अपनी दिशाएं तय करता है या ये युवा दिशाहीन है?

(सुभाष नाहर पिछले ४० वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के जाने माने हस्ताक्षर हैं।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.