/बाड़मेर में कौन कहाँ और क्यूँ जीतेगा…

बाड़मेर में कौन कहाँ और क्यूँ जीतेगा…

-चन्दन सिंह भाटी|| 

बाड़मेर, रविवार को एक दिसंबर को सम्पन हुए विधानसभा चुनावो के परिणाम आने हैं. सभी प्रत्याशी अपनी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. सट्टा बाज़ार और विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से बातचीत के आधार पर लगा कि इस बार बाड़मेर की मतदाताओं ने दिल खोल कर भाजपा के पक्ष में मतदान किया है. हर सीट पर हार जीत के चौंकाने वाले कारण सामने आये हैंबाड़मेर विधानसभा क्षेत्र. इस क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी मेवाराम जैन भीतरघात के शिकार हुए लग रहे हैं साथ ही उनका गढ़ माने जाने वाली प्रमुख तेरह पंचायतों चुली, भद्रेश, विशाला, मारूड़ी, लंगेरा, आती, जैसे, जूना, बालेरा, सुरा, डूडा बेरी, कपूरड़ी, जालिपा, हरसाणी फांटा, आदि में अपनी पिछली बढ़त कायम नहीं रख पाये वाही शहरी क्षेत्र में भी उनकी पकड़ बहुत कमज़ोर साबित हुई, डॉ प्रियंका चौधरी के पक्ष में राजपूत, मेघवाल, रावण राजपूत, मुस्लिम और जाट वोटों के ध्रुवीकरण के कारण वो मजबूत नज़र आती है, प्रियंका ने वर्त्तमान विधायक के गढ़ में उनकी बढ़त ख़त्म करने तथा शहरी क्षेत्र में बढ़त कि सम्भावना से भारी हैं. वहीँ, जाट वोट उनकी जीत का अंतर बढ़ा रहे हैं. भाजपा कि बागी श्रीमती मृदुरेखा के कारण कांग्रेस प्रत्यासी को ज्यादा नुक्सान हुआ हैNew Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)olo

चौहटन: सॆमवर्ति चौहटन विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के तरुण कागा और कांग्रेस के पदमाराम मेघवाल आमने सामने थे. इस बार इस सीट पर निर्णायक मत जाट मतदाताओं का भाजपा के जुड़ाव और कुछ मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के कारण भाजपा मजबूत है.

शिव विधानसभा क्षेत्र: ज़िले कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठा का सवाल बनी शिव विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अमिन खान और भाजपा के मानवेन्द्र सिंह के बीच कडा मुकाबला था, मानवेन्द्र सिंह ने अमिन खान के परंपरागत वोट बेंक मुस्लिम, अनुसूचित जाती, जनजाति, और जाट मतदाताओ में जोरदार सेंध लगाई, कांग्रेस के परंपरागत मतों के ध्रुवीकरण और भाजपा समर्थक राजपूत और अन्य जातियो के लामबंद होने से मानवेन्द्र सिंह मजबूत हैं.

बायतु: बायतु वधान सभा क्षेत्र से कर्नल सोनाराम चौधरी और भाजपा के कैलाश चौधरी आमने सामने थे., कर्नल पिछली बार चौंतीस हज़ार मतों से जीते थे. मगर इस बार वो कांग्रेस के जाट नेताओ के कोप भजन का शिकार हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं, कर्नल अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं मगर बायतु से आई पोलिंग पार्टियो कि माने तो कर्नल इस सीट को खोते नज़र आ रहे हैं,  कर्नल को रिफायनरी आंदोलन में सक्रीय रहने के बावजूद बायतु से पचपदरा शिफ्ट होना उनके विपक्ष में जा रहा हैं, कर्नल कि कांग्रेस नेता कार सेवा में जूट थे, भीतरघात के कारण वो कमज़ोर नज़र आयते हैं, भाजपा के कैलाश चौधात्री के पक्ष में जाट मतदाताओ के साथ अन्य जातियो के खुल कर आने से भी वो मजबूत हैं, इस दशा में बायतु सीट से कोई भी निकल सकता हैं.

पचपदरा: इस सीट पर कांग्रेस का असंतोष वर्म्मन विधायक मदन प्रजापत को टिकट देने के साथ शुरू हुआ था, मूल कांग्रेस इनकी उम्मीदवारी के विरोध में अलग हो गयी उन्होंने अब्दुल रहमान को बागी उतर मदन प्रजापत के सरे समीकरण बिगाड़ दिए, भाजपा के अमराराम चौधरी के प्रति सहानुभूति थी, उसका बड़ा असर रहा साथ ही नरेंद्र मोदी कि लोकप्रियता बड़ा कारण हैं, पचपदरा सीट पर अमराराम मजबूत नज़र आते हैं.

सिवाना: सिवाना विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस ने महंत निर्मलदास को उतरा, उनकी टिकट के साथ सिवाना कांग्रेस में विरोध शुरू हुआ, कांग्रेस के परम्परागत वोटर कुलबी और मुस्लिम निर्मलदास के खिलाफ लामबंद हुए, उनके समाज कि कांग्रेस कि महिला जिला अध्यक्ष विजय लक्ष्मी ने विरोधस्वरूप पार्टी ही छोड़ भाजपा के साथ हो ली, निर्मलदास को कांग्रेस का पूरा सहयोग नहीं मिला जिससे वो शुरू में ही मुकाबले में पिछड़ गए.  भाजपा से हमीर सिंह भायल के पक्ष में सभी समाजों सहित राजपूतो का लामबंद होना उन्हें मजबूत बनता हैं.

गुडा मालानी: गुडा मालानी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हेमाराम चौधरी ने पहले चुनाव लड़ने से मना कर दिया. जिससे उनके क्षेत्र में गलत सन्देश गया कि वो हार के डर से चुनाव नहीं लड़ना चाहते. हेमाराम ने राहुल गांधी के दबाव में चुनाव लड़ने की हामी तो भर दी मगर अपने परंपरागत मतदाताओं के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण को रोकने में सफल नहीं हुए. भाजपा के लादूराम विश्नोई को जाट मत मिलाने साथ उन्हें कुलबी जाती का भी समर्थन मिला, सिवाना में कुलबी को टिकट नहीं मिलाना हेमाराम चौधरी के लिए घटक सिद्ध हो सकता हैं. लादूराम को नरेंद्र मोदी और वसुंधरा का फायदा मिला.

वोट मांगने नहीं आये: यह पहली बार हुआ जब कांग्रेस के एक भी स्टार प्रचारक आम सभा के लिए नहीं आया. यहाँ तक कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अपने प्रत्याशियों के लिए वोट मांगने नहीं आए. जबकि हर चुनाव में राहुल गांधी या सोनिया गांधी वोट मांगने आती रही मगर इस बार कांग्रेस के लिए कोई वोट मांगने नहीं आया जिसका विपरीत प्रभाव पड़ा.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.