Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

क्या है साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल 2011…

By   /  December 7, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-रीना सिंह||
कानून के जरिये सांप्रदायिक दंगों की रोकथाम करने की कोशिश जवाहरलाल नेहरू के समय से ही चल रही है. इस कड़ी में राज्यसभा में एक विधेयक यूपीए की पहली सरकार के दौरान आया था. लेकिन अल्पसंख्यक और मानवाधिकार प्रतिनिधियों ने उस बिल के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी. यूपीए-2 ने एक नये बिल का प्रारूप तैयार करवाया है. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने 14 जुलाई 2010 को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूप समिति का गठन किया था और 28 अप्रैल 2011 की एनएसी बैठक के बाद नौ अध्यायों और 138 धाराओं में तैयार हिंदी में अनूदित बिल लोगों की सलाह के लिए वेबसाइट पर डाला गया है.bajrang_dal_20121119.jpg
सांप्रदायिकता का अर्थ
सांप्रदायिक दंगों के बाद अपराधियों को सजा और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाने के जितने भी तकनीकी कारणों को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अनुभव किया है, उन्हें बिल में डालने की कोशिश की गई है. सांप्रदायिकता शब्द से दो धार्मिक समुदायों, खासकर हिंदू-मुस्लिम का चेहरा दिखाई देने लगता है. हालांकि तथ्य यह है कि 1991 में, जब मुस्लिम आबादी 12.4 प्रतिशत थी, सांप्रदायिक दंगों से पीड़ित लोगों में 80 प्रतिशत मुसलमान थे. बिल में कहा गया है कि ‘सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा से अभिप्रेत है और इसमें सम्मिलित है ऐसा कोई कार्य या कार्यों की श्रृंखला (जो चाहे सहज हो या योजनाबद्ध) जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति और / या संपत्ति को क्षति या हानि होती है और जो जानबूझकर किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी समूह की उसकी सदस्यता के आधार पर निर्देशित की गई है और जो राष्ट्र के धर्म निरपेक्ष ढांचे को नष्ट करती है.’
जातिगत उत्पीड़न
समूह का मतलब भारत संघ के किसी राज्य में कोई धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक या भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड 24 और खंड 25 के अर्थ के भीतर अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां है. दरअसल समाज में प्रभावशाली व्यक्तियों व समूहों द्वारा अपराध करने के बाद बच निकलने का रास्ता ज्यादातर तकनीकी बारीकियां होती है और इसमें तंत्र में जमे-जमाए लोग बेहद माहिर होते है. दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अपराधों में भी यह अनुभव सामने आए है. लिहाजा इस तंत्र में एक ऐसा ढांचा खड़ा करने पर जोर दिया जा रहा है जिसमें समाज के वैसे व्यक्ति प्रभावकारी हो सकें जिनका रुख सांप्रदायिकता विरोधी हो और चुनावी राजनीति से जिनका सीधा रिश्ता नहीं हो.
बिल में सांप्रदायिक हमलों के विभिन्न तरीकों के सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव दिखाई देते हैं. समूह की सदस्यता के आधार पर व्यक्ति के व्यापार या कारोबारों का बहिष्कार करने, जीविका अर्जन में उसके लिए कठिनाई पैदा करने, लोक सेवाओं (जिसके अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन भी आते हैं) से अपवर्जित करके या किसी अन्य तिरस्कार पूर्ण कार्य द्वारा सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने को अपराध माना गया है. सांप्रदायिक हिंसा में महिलाएं सबसे ज्यादा भुक्तभोगी होती हैं. दलित-आदिवासी महिलाओं को कपड़े उतारकर घुमाने की घटनाएं भी होती हैं. इन समुदायों के प्रति अपराध के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट है लेकिन इसके अलावा इस कानून के प्रावधान भी ऐसे मामलों में लागू होंगे.india_-_attivisti_bajrang_dal
इस विधेयक की राजनीतिक आलोचना यह कहकर की जा रही है कि इसमें बहुसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को अनदेखा किया गया है. इस आलोचना में बहुसंख्यक शब्द का अभिप्राय स्पष्ट नहीं है. एक धार्मिक समुदाय के रूप में हिंदू देश के सात राज्यों पंजाब, जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, मणिपुर, अंडमान-निकोबार, मेघालय और नागालैंड में अल्पसंख्यक हैं. महाराष्ट्र और असम में हिंदीभाषियों को भाषाई अल्पसंख्यक मानकर उनके खिलाफ भी हमले होते है. बिल के प्रावधानों में किसी भी स्तर पर हमले की गुंजाइश न छोड़ने की संवेदनशीलता दिखाई देती है .
कमजोर तबकों के विरुद्ध हिंसा में सरकारी अधिकारियों, पुलिस, सशस्त्र सुरक्षा बलों और कर्मचारियों की भूमिका देखी गई है. बिहार में लालू प्रसाद ने अपने शासनकाल में ऐलान किया था कि जहां दंगे होंगे वहां के एसपी और डीएम उसके लिए जिम्मेदार होंगे. उस दौरान दंगे नहीं हुए. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह संसद में दिए गए अपने एक भाषण में 2002 के गुजरात को भूलते हुए यह कह गए कि कोई भी मुख्यमंत्री चाहे तो घंटों में दंगे रोक सकता है. बिल में सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर इतना जोर दिया गया है कि इधर-उधर करने पर उसे कठघरे में खड़ा होना पड़ सकता है. उसके खिलाफ दो से पांच वर्ष की कैद और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है.
बिल के प्रारूप की धारा 36 में कहा गया है कि जहां किसी रिपोर्ट में किसी लोक सेवक द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन या सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा को रोकने में उपेक्षा प्रकट होती है, वहां संबंधित सरकार या प्राधिकरण उसके खिलाफ अभियोजन की कार्यवाही आरंभ करने की सिफारिश कर सकेगा. बिल में मीडिया की चर्चा नहीं है लेकिन दंगों में मीडिया की भूमिका जगजाहिर है. बिल में सूचना और प्रचार की भूमिका का उल्लेख है और उसके साबित होने पर तीन वर्ष की कैद की सजा तय की गई है. जो लोग हमलावरों को आर्थिक तौर पर मदद करते है, उन्हें भी सांप्रदायिक हिंसा के अपराध में शामिल किया गया है.
केंद्र-राज्य के रिश्ते
बिल के अनुसार ‘संगठित सांप्रदायिक और लक्षित  हिंसा का होना भारत के संविधान के अनुच्छेद 355 के अर्थ के अंतर्गत आंतरिक अशांति गठित करेगा और केंद सरकार इसके अधीन उल्लिखित कर्तव्यों के अनुसार ऐसे उपाय कर सकेगी जो मामले की प्रकृति और परिस्थितियों के संबंध में इस प्रकार अपेक्षित हो.’ अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को या गुजरात में 2002 के दंगों जैसे मौकों पर केंद्र सरकार ने संविधान की व्यवस्थाओं के मद्देनजर खुद को असहाय बताया था. सांप्रदायिक हिंसा विरोधी कानून बन जाने की स्थिति में केंद्र की तरफ से ऐसी सरकारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का रास्ता खुल जाएगा.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: