/हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल थे जनरल शाह नवाज खान..

हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल थे जनरल शाह नवाज खान..

-आषीश वशिष्ठ||

आज जब देश में वोट बैंक की राजनीति सिर चढ़कर बोल रही है. सांप्रदायिक दंगों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसे में अगर ये कहा जाए कि किसी मुसलमान ने हिंदुओं का गांव बसाया तो सुनने वाले को हैरानी होगी. मेरठ जैसे संवेदनशील क्षेत्र को दो दशक तक प्रतिनिधित्व किया और कभी कोई तनाव व सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ जो एक मिसाल है.gen shahnawaz khan

जब हिंदुस्तान से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे तब वो पाकिस्तान में अपने पूरे परिवार को छोड़कर हिंदुस्तान आ गए थे. उनके परिवार से जुड़े लोग आज पाकिस्तान सेना में ऊंचे पदों पर हैं. वो आजाद हिंद फौज में सुभाष चंद्र बोस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े. जब ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़कर लाल किले में डाल दिया और प्रसिद्ध लाल किला कोर्ट मार्शल ट्रॉयल हुआ तब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनके लिए वकालत की. आजाद हिंदुस्तान में 4 बार सांसद चुने गए और कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे. प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान की मां को उन्होंने ही गोद लिया था. हम बात कर रहे हैं मेजर जनरल शाहनवाज खान (आईएनए) की.

आजाद हिंद फौज के मेजर जनलर षाह नवाज खान ने उत्तराखण्ड में नेताजी सुभाश चंद्र बोस की याद में हिन्दुओं का गांव बसाया था. गांव के सारे परिवार हिंदू हैं और आजाद हिंद फौज व भारतीय सेना से जुड़े रहे हैं. जनरल खान मेरठ से दो दशक तक सांसद रहे और भारत सरकार में मंत्री रहे. लेकिन उनके कार्यकाल में मेरठ में एक बार भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ. हिंदू मुस्लिम एकता की बेहतरीन मिसाल थे जनरल शाह नवाज खान.

देश को आजाद कराने के लिए लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी. इन महान देश-भक्तों में मेजर जनरल शाहनवाज खान का नाम आदर से लिया जाता है, जो आजाद हिन्द फौज के मेजर जेनरल थे और नेताजी सुभाश चंद्र बोस के बेहद करीबियों में शुमार थे. उनका जन्म 24 जनवरी 1914 को गांव मटौर, जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में झंझुआ राजपूत कैप्टन सरदार टीका खान के घर हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पाकिस्तान में हुई. आगे की शिक्षा उन्होंने प्रिंस ऑफ वेल्स रावल इंडियन मिलिट्री कॉलेज देहरादून में पूरी की और 1940 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक अधिकारी के तौर पर ज्वाइन कर लिया.

जनरल शाह नवाज खान ने में जो गांव बसाया उसका नाम है सुभाषगढ़. उत्तर रेलवे के लक्सर जंक्शन से रेल जब हरिद्वार के लिए बढ़ती है तो पहला स्टेशन ऐथल पड़ता है. ऐथल से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम दिशा में बसा है सुभाषगढ़. सड़क मार्ग से लक्सर और हरिद्वार से यह गांव सीधे जुड़ा है.जिला मुख्यालय से तकरीबन 23 किलोमीटर और राजधानी देहरादून से लगभग 63 की दूरी पर स्थित है सुभाषगढ़. जनरल शाहनवाज खान की प्रेरणा और योगदान से ये गांव बसा. 1943 में नेताजी से प्रभावित होकर जनरल खान आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गये. उनकी गिनती नेताजी के करीबियों में होती थी. जनरल शाहनवाज खान के साथ उनके पुश्तैनी गांव और आसपास के क्षेत्र के सैंकड़ों सैनिक आजाद हिंद फौज के झण्डे तले देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे. वर्ष 1947 में आजादी के बाद हुए बंटवारे में आजाद हिंद फौज के सैंकड़ों सैनिक परिवार समेत पाकिस्तान छोड़कर हिन्दुस्तान चले आये थे. जनरल खान ने इन बहादुर सैनिकों को हरिद्वार के निकट बसाने का काम किया और गांव का नामकरण महान स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त नेताजी सुभाश चंद्र बोस के नाम पर किया. गाँव के बुजुर्ग बताते हैं बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान आने पर सब लोगों ने सरकार द्वारा चलाये जा रहे रिफ्यूजी कैम्पों में शरण ली थी. हालात सामान्य होने पर एक-दूसरे की खोज-खबर ली. जनरल खान अपने साथ कंधे से कंधे मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ने वाले हिंदू वीर सैनिकों और भारत माता के सच्चे सपूतों को भूले नहीं थे. जनरल खान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को आजाद हिंद फौज के इन बहादुर सैनिकों की आजादी की लड़ाई में योगदान और शहादत की दास्तां सुनाई और उनकों सम्मानपर्वूक जीने के लिए रहने और खेती के लिए जमीन देने का आग्रह किया. नेहरु ने उनके आग्रह को स्वीकारते हुए इन बहादुर सैनिकों को तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य (अब उत्तराखंड) के हरिद्वार जिले में घर और खेती की जगह दी. इस तरह सुभाषगढ़ गांव की स्थापना 1952 में हुई थी. पूरे जिले में सारस्वत ब्राहम्णों का यह सबसे बड़ा और इकलौता गांव है. गांव के हर घर में सैनिक हैं. मूलतः पाकिस्तान के जिला रावलपिण्डी (तत्कालीन भारत) के विभिन्न गावों के ये बाशिंदे और उनके पूर्वज सैनिक और किसान थे.ब्रिटिश आर्मी में काम करते हुए इन सैनिकों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लिया. युद्ध के दौरान सैनिकों को जापानी फौज ने रंगून की जेलों में बंदी बना दिया था. उस समय नेताजी ने जेलें तोड़कर इन सैनिकों को आजाद करवाया और आजाद हिंद फौज में शामिल होने का आहवान किया. नेताजी के प्रेरणा से इन बहादुर सैनिकों ने पूरे जोश और हिम्मत के साथ आजादी की लड़ाई में बढ़-चढकर हिस्सा लिया और देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई. जनरल खान का घर ऐथल रेलवे स्टेशन के नजदीक है. जनरल साहब के परिवार के गांव वालों से आत्मीय रिशते कायम हैं. गांववासी जनरल खान के परिवार को अपने संरक्षक की तरह मानते हैं. गांव में जनरल साहब ने मन्दिर का निर्माण कराया था.

1946 में आजाद हिंद फौज की समाप्ति के बाद जनरल शाहनवाज खान ने महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रेरणा से इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गये. 1947 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जनरल शाहनवाज खान को कांग्रेस सेवा दल के सदस्यों को सैनिकों की भांति प्रशिक्षण और अनुशासन सिखाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी. जनलर खान को कांग्रेस सेवा दल के सेवापति का पद नवाजा गया, जिसका निर्वाहन उन्होंने वर्ष 1947 से 1951 तक किया था, और अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी वह 1977 से 1983 तक कांग्रेस सेवा दल के प्रभारी बने रहे.

मेरठ लोकसभा सीट से प्रतिनिधित्व करने वाले जनरल शाह नवाज खान 23 साल केन्द्र सरकार में मंत्री रहे. मेरठ जैसे संवेदनशील शहर का दो दशकों से अधिक प्रतिनिधित्व जनरल खान ने किया और उनके कुशल नेतृत्व और सबको साथ लेकर चलने की नीति के कारण शहर में कभी कोई दंगा फसाद नहीं हुआ, जो एक मिसाल है. वास्तव में जनरल शाह नवाज खान न सिर्फ एक महान जंग-ए-मुजाहिद थे बल्कि वह बेलौस देशप्रेमी भी थे. जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था. जनरल शाहनवाज खान, नेताजी सुभाश चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के न जाने कितने नुमाइंदों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर हिंदुस्तान को आजादी दिलवाई लेकिन आज उनके नाम से भी देश के लोग वाकिफ नहीं हैं. महान स्वतंत्रता सेनानी, देशभक्त और कुशल राजनेता जनरल शाहनवाज खान को काल के क्रूर हाथों ने हम सबसे से 9 दिसंबर 1983 को हमसे छीन लिया था. आज उनकी 30वीं पुण्यतिथी थी. वक्त की जरूरत है कि हम शाहनवाज खान जैसी शख्सियतों के बारे में जाने और उनकी विरासत को संभाले.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.