/केजरीवाल पर खुशियों के साथ संकट, चुनाव आयोग ने भेजा नोटिस…

केजरीवाल पर खुशियों के साथ संकट, चुनाव आयोग ने भेजा नोटिस…

विधानसभा चुनाव में बेहतरीन परिणाम पाने वाले अरविंद केजरीवाल के सामने एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है. मामला इसलिए भी ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इसकी वजह से केजरीवाल की उम्मीदवारी रद्द भी हो सकती है. पार्टी के सूत्रों का दावा है कि नई दिल्ली सीट के रिटर्निंग ऑफिसर ने चुनाव प्रचार के दौरान जंतर मंतर पर पार्टी द्वारा आयोजित किए गए कंसर्ट के खर्च का गलत तरीके से आंकलन करते हुए उस खर्च को केजरीवाल समेत पार्टी के दो अन्य उम्मीदवारों के खाते में जोड़ दिया है.arvind-kejriwal-033

पार्टी के नेता इसे विपक्षी पार्टियों की साजिश करार देते हुए और चुनाव अधिकारियों पर उनके साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया और कोर्ट की शरण में जाने की बात कह रहे हैं.

पार्टी के सूत्रों ने बताया कि जंतर मंतर पर आयोजित कंसर्ट के इंतजामों पर 12 लाख रुपये खर्च हुए थे. सभी सितारों ने बिना कोई पैसा लिए इस कंसर्ट में हिस्सा लिया था. लेकिन इसके बावजूद नई दिल्ली के आरओ ने कलाकारों का खर्च मार्केट रेट के हिसाब से जोड़कर अरविंद के अलावा मालवीय नगर और दिल्ली कैंट से पार्टी के उन दो उम्मीदवारों के चुनाव खर्च में भी जोड़ दिया, जो उस दिन स्टेज पर आए थे. सूत्रों के मुताबिक आरओ ने कलाकारों को कुल 39 लाख रुपये के पेमेंट का अनुमान लगाते हुए 13-13 लाख रुपये तीनों उम्मीदवारों के चुनावी खर्च में जोड़ दिए. अरविंद ने चुनाव प्रचार पर करीब 2 लाख रुपये ही खर्च किए थे, लेकिन अब उनका चुनाव खर्च 15 लाख के आसपास हो गया.

सूत्रों ने बताया कि आरओ ने एक नोटिस तो वोटिंग से ऐन पहले 3 दिसंबर की रात को भेजा, जिसमें कंसर्ट के खर्च को तीनों उम्मीदवारों के खाते में जोड़ने की बात कही गई थी, लेकिन शुक्रवार को एक और नोटिस भेजकर अरविंद से इस बात पर सफाई मांगी गई है कि उनका चुनाव खर्च 14 लाख की तय सीमा से बाहर कैसे चला गया. नई दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के डीईओे ने भी केजरीवाल को इस संबंध में नोटिस भेजे जाने की पुष्टि की है.

उधर आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि जब कंसर्ट का आयोजन पार्टी के बैनर तले किया गया था, तो फिर उसका खर्च कैंडिडेट के खाते में कैसे जोड़ा जा सकता है. अगर ऐसा है तो फिर चुनाव आयोग ने सोनिया, राहुल और मोदी की रैलियों पर हुआ खर्च भी पार्टी के बजाय उनके उम्मीदवारों के खाते में क्यों नहीं जोड़ा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.