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अरविंद केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए…

आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के लिए अपने चुनाव घोषणा पत्र को लागू करने का यह ऐतिहासिक मौका है और उन्हें इस जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. आप ने विपक्ष में बैठने के लिए चुनाव नहीं लड़ा था और न ही उसे वोट देने वाले मतदाता अपने लिए विपक्ष चुन रहे थे. इसलिए अगर बारीक-सा भी मौका है, तो आप को समर्थन जुटाने, सरकार बनाने और चलाने की कोशिश करनी चाहिए.
अगर कोई उसे बाहर से समर्थन देता है, या विधानसभा में मतदान के दौरान अनुपस्थित रहकर सरकार चलाने देता है, तो आप को सरकार चलाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए. उसके पास यह रास्ता हमेशा होगा कि कोई पार्टी या एमएलए अगर उससे गलत काम कराने की कोशिश करेगा या बांह मरोड़ेगा, तो वह सरकार गिर जाने देगी, पर ‘अनैतिक’ समझौता नहीं करेगी. किसी भी ईमानदार पार्टी को ऐसा ही करना चाहिए.Arvind Kejriwal

सरकार बनाकर ही आप आधी दर पर बिजली देने, 700 लीटर मुफ्त पानी, सभी गैरकानूनी कॉलोनियों को रेगुलराइज करने, मुस्लिम युवाओं पर लगे फर्जी मुकदमे वापस लेने, सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी और ओबीसी का रिजर्वेशन सख्ती से लागू करने और बैकलॉग वैकेंसी भरने, करप्शन करने वाले लोकसेवक को नौकरी से निकालने, जेल भेजने और संपत्ति जब्त करने, दिल्ली के तमाम सफाई कर्मचारियों और ड्राइवरों को पर्मानेंट करने, उर्दू और पंजाबी भाषा की हैसियत बढ़ाने जैसे सैकड़ों कदम उठा पाएगी, जिसका उसने अपने घोषणा-पत्र में वादा किया है. अगर बीजेपी या कांग्रेस इन कामों में रोड़े अटकाती है, तो वे ऐसा अपनी जाखिम पर ही करेंगी.

इसमें कोई शक नहीं है कि दिल्ली का जनादेश स्पष्ट नहीं है. इस जनादेश में एकमात्र स्पष्टता यह है कि दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को रिजेक्ट कर दिया है. कांग्रेस को रिजेक्ट करते हुए लोगों ने दो विकल्पों को आजमाया. इनमें से बीजेपी को 32 और आप को 28 सीटें मिली हैं. जाहिर है 70 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के लिए सरकार बनाना आसान नहीं है. बीजेपी की सरकार बनने की एक ही सूरत है कि आप उसका समर्थन करे. मौजूदा राजनैतिक गणित के हिसाब से इसके आसार कम हैं.

लेकिन क्या यही बात आप के बारे में कही जा सकती है. शायद नहीं. अगर आप सरकार बनाने का दावा करती है, तो उसे बीजेपी का समर्थन मिल भी सकता है. आप को इसके लिए कोशिश करनी चाहिए. अगर समर्थन न भी मिले, तो अगर आप अपने घोषणा-पत्र को लागू करने के दावा के साथ सरकार बनाने का दावा करती है, तो क्या बीजेपी उसका विरोध करेगी.

चुनाव ने और उससे भी बढ़कर इतिहास ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां से उनका उठाया हुआ हर कदम बेहद महत्वपूर्ण होगा. क्या केजरीवाल इसके लिए तैयार हैं?

(आजतक)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.