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बैंकों का कर्ज़ चुकाया नहीं, बेटी की शादी पर खर्चे 503 करोड़…

By   /  December 13, 2013  /  No Comments

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स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल के भाई प्रमोद मित्तल एक तरफ भारतीय बैंकों का कर्ज़ तो चूका नहीं पा रहे हैं मगर अपनी पुत्री सृष्टि मित्तल की हाईफाई शादी में 503 करोड़ रुपये खर्च कर उसे दुनिया की सबसे महंगी शादियों में दर्ज़ करवाने से नहीं चूके. इस महंगी शादी की भव्यता के चलते पिछले रविवार को स्‍पेन का शहर बार्सिलोना थम सा गया. mittal-niece-wedding

गौरतलब है कि प्रमोद मित्तल ने कई भारतीय बैंकों से करोड़ों रुपये का कर्ज लिया हुआ है. प्रमोद और इनके भाई विनोद मित्तल कॉर्पोरेट कर्ज रीस्ट्रक्चरिंग के सहारे खुद को बैंकों के लोन से बचाते रहे हैं. प्रमोद मित्तल ने डिफॉल्टर होने के बावजूद अपनी बेटी सृष्टि की शादी में 503 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए.

स्पेन के एक न्यूज पोर्टल vanitatis.com के मुताबिक यह दुनिया की पांच सबसे खर्चीली शादियों में से एक है. पोर्टल ने अपने लेख में लिखा है फोर्ब्‍स ने 1981 में अबुधाबी के राजकुमार मोहम्मद बिन जाएद अल नाहयान और राजकुमारी सलमा की शादी (604 करोड़ रुपये) के बाद मित्तल परिवार की शादी को सबसे ज्यादा महंगी शादी करार दिया है.

हालांकि मित्तल परिवार ने इस शादी का जमकर लुत्फ उठाया, लेकिन बार्सिलोना के लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ी. कई जगह कर्फ्यू जैसा माहौल था. सजे-धजे बाराती लोक धुनों पर नाच रहे थे.

सृष्टि के पिता प्रमोद ने अपनी बेटी की शादी को यादगार बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. एक हेलिकॉप्टर को शादी के खास पलों को कैद करने के लिए तैनात किया था. 60 किलो का केक, गुब्‍बारे, फूलों से बने दरवाजे, शानदार लाइट्स शादी के मुख्य आकर्षण थे.

शादी के कई कार्यक्रम स्पेन के ऐतिहासिक स्‍थलों पर हुए थे. स्पेन के टूरिज्म बोर्ड ने भी मित्तल परिवार को घर जैसा एहसास कराने की पूरी कोशिश की.

गौरतलब है कि साल 2002 में लक्ष्मीनिवास मित्तल ने अपने बेटे की शादी में कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल 9 लाख रुपये में किराए पर लिया था. वहीं, 2004 में उनकी बेटी वनीषा की शादी भारतीय अरबपति अमित भाटिया से हुई. इस शादी में लगभग 240 करोड़ रुपये का खर्च आया था.

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  • Published: 5 years ago on December 13, 2013
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  • Last Modified: December 14, 2013 @ 9:43 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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