/सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, कितना सही…

सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, कितना सही…

साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक जो वर्तमान  में पूरी होने की प्रक्रिया  में है विधेयक को कल केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद आज लोकसभा में पेश  किया गया.

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इस अधिनियम का प्रारूप  संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा तैयार किया गया है. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने १४ जुलाई २०१० को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूपसमिति का गठन किया था और २८ अप्रैल २०११ की एनएसी बैठक के बाद नौ अध्यायों और १३८ धाराओं में तैयार हिंदी में अनूदित किया. इस अधिनियम की सबसे अधिक विवादस्पद बात ये है कि इस विधेयक में यह बात पहले से ही मान ली गयी है की हिंसक केवल बहुसंख्यक होते हैं अल्पसंख्यक नहीं.

विधेयक की जो सबसे महत्वपूर्ण बातें है ‘समूह की परिभाषा’ समूह का तात्पर्य भाषाई अल्पसंख्यकों से है जिसमे वर्तमान स्थितियो के अनुरूप अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो को भी शामिल किया गया है पूरे विधेयक में सबसे ज्यादा आपत्ति भी इसी बात पर है की इसमें बहुसंख्यक समुदाय को समूह की परिभाषा से अलग रखा गया है.

इस विधेयक के अंतर्गत आने वाले अपराध उन अपराधो के अलावा हैं जो अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम  १९८९ के अधीन आते है.1 (2)

विधेयक में निर्धारित  किया गया है किसी भी व्यक्ति को उन हालात में यौन सम्बन्धी अपराध के लिए वो दोषी माना जायेगा यदि वह किसी ‘समूह से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति के, जो उस समूह का सदस्य है, विरुद्ध कोई यौन अपराध करता है परन्तु यदि पीडिता उस समूह ही सदस्य नहीं है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा. इसका सीधा प्रभाव बहुसंख्यक महिला पर पड़ेगा यदि सांप्रदायिक दंगो की स्थिति में वे यौन अपराध का शिकार होती है तो यह अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा क्योंकि बहुसंख्यक समूह की परिभाषा में नहीं आते है.

विधेयक में घृणा सम्बन्धी प्रचार उन हालात  में अपराध माना जायेगा जब को व्यक्ति मौखिक या लिखित तौर पर स्पष्टतया अम्यावेदन करके किसी समूह या समूह से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति के विरुद्ध घृणा फैलता है. लेकिन समूह द्वारा घृणा फ़ैलाने की स्थिति में विधेयक मौन है.

विधेयक के अनुसार जो सशस्त्र सेनाओं अथवा सुरक्षा  बलों पर नियंत्रण रखते है और अपने कमान के लोगो पर कारगर  ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हतु नियंत्रण रखने में  असफल होते है उन्हें भी दण्डित किये जाने का प्रावधान है.

विधेयक में प्रत्यायोजित दायित्व का सिद्धांत दिया गया है, किसी संगठन का कोई  व्यक्ति या अधिकारी अपने अधीन अधीनस्थ कर्मचारियों  पर नियंत्रण रखने में नाकामयाब रहता है तो यह उसके द्वारा किया गया एक अपराध माना जायेगा और वह उस अपराध के लिए प्रत्यायोजित रूप से उत्तरदायी होगा जो कुछ अन्य लोगों द्वारा किया गया है इस तरह किसी संगठन का एक भी व्यक्ति  अल्पसंख्यक समुदाय के विरूद्ध  किसी अपराध में लिप्त  पाया जाता है तो पूरे संगठन को दण्डित किया जा सकता है.

विधेयक में सांप्रदायिक जिम्मेदारी भंग होने स्थिति में वरिष्ठ लोक सेवको  पर जिम्मेदारी तय करने करने सम्बन्धी प्रावधान में गंभीर खामियां है, अगर वरिष्ठ लोक  सेवको के अधीनस्थ ने भी गंभीर अपराध किया है तो इसके लिए सज़ा उन्हें ही मिलेगी.

इस विधेयक में ऐसे  लोकसेवको के खिलाफ एक नेशनल  अथारिटी बनाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस प्रावधान के दोनों ही प्रकार के नकारात्मक  और सकारात्मक पहलू होंगे जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

इस विधेयक का बीजेपी, शिव सेना, ऐ आई ऐ डी एम के, तृणमूल कांग्रेस और कई हिन्दू संगठन सहित कई सामाजिक संगठन भारी विरोध कर रहे है. उनका कहना है कि ये केवल अल्पसंख्यको को सुरक्षा प्रदान करती है परन्तु अल्पसंख्यको के आक्रमण से पीड़ित बहुसंख्यको को यह अधिनियम कोई सुरक्षा  प्रदान नहीं करता है.

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश टी थॉमस ने कहा  है कि यह बिल असंवैधानिक और विखंडनशील है, इसलिए इस बिल की कोई जरुरत नहीं है, वास्तव में किसी सरकार  का ऐसा कोई भी कदम जो दो अलग आधारों पर नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है तो निश्चय ही उसे विखंडन की मानसिकता से प्रेरित ही कहा  जा सकता है.

केंद्र और राज्य  सरकारे हिंदूवादी दलों और सिमी जैसे संगठन पर कोई  ध्यान नहीं देती है और जब दंगा होता है तो कथित तौर  पर दोषी लोगो की धर पकड़ होती है. सांप्रदायिक दुष्प्रचार किया जाता है तब राजनितिक दल, अधिकारी और पुलिस सोई  रहती है. विधेयक लोकसेवको को दोषी तो मानती है लेकिन राजनैतिक दलों के नेताओ को नहीं, सांप्रदायिक आधार पर काम करने वाली सरकार  को नहीं, कछुए की चाल से चलने वाली न्यायपालिका को नहीं.

इस अधिनियम के तहत  विशेष अदालत, जज और अभियोजक उपलब्ध कराने का प्रावधान है लेकिन अपराधियों को अल्पसंख्‍यकों और बहुसंख्यकों में बांट कर न्याय किया जा सकता है? क्या ऐसे कानून से हिंसा और दंगा रुक जाएंगे? पीडितो को अल्पसंख्‍यकों और बहुसंख्यकों में बांट कर कहाँ तक न्याय कर पाएंगे?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.