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देवयानी प्रकरण .. अमेरिका ..खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे…

By   /  December 18, 2013  /  No Comments

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-हरेश कुमार||

अमेरिका में भारत के उप वाणिज्य दूत, देवयानी खोबरागड़े के साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार किया गया, उससे साफ-साफ संकेत मिलता है कि यह सब पूर्व-नियोजित था। तभी अमेरिका, भारतीय कर्मचारियों के साथ अपनी भड़ास निकाल रहा है। क्या आईटी कंपनियों में कार्यरत लोगों को इतना ही पैसा दिया जा रहा है जितना कि उनसे वादा किया गया य़ा, जबकि उन्हें तो अब वीजा नियमों के नाम पर सताया जाने लगा है। यब सबको पता है कि अमेरिका का आईटी उद्योग भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की बदौलत ही चल रहा है।Haresh3

अपने हथियारों की बिक्री कम होने और ईरान के परमाणु मसले पर भारत का आंख मूंदकर समर्थन हासिल ना करने के कारण अमेरिका खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे पर उतर आया है। वैसे भी यह कोई पहला मौका नहीं है, जब अमेरिका ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल से ऐसा किया हो। हां, इस बार मामला महिला कर्मचारी का है और यह हद से गुजर चुका है। इसी अमेरिकियों ने भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री, जॉर्ज फर्नांडीस की तलाशी ली थी, उस समय भी काफी हंगामा हुआ था, लेकिन इसे दबा दिया गया था। फिर पूर्व राष्ट्रपति, एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी ऐसा ही हुआ, जब उनके कपड़े उतारकर तलाशी ली गई थी। उसके बाद, बॉलीवुड फिल्मों के शहंशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान के साथ भी ऐसा ही बर्ताब हुआ था। अभी साल भर भी नहीं हुआ होगा जब उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री, अखिलेश यादव के नेतृत्व में वहां गया था तो आजम खां के साथ भी ऐसा हुआ था, जिसके कारण सारा प्रतिनिधिमंडल अपने कार्यक्रम को रद्द करके बीच में ही वापस आ गया था।

यह सही है कि 9/11 के हमले के बाद से अमेरिका ने अपने यहां सुरक्षा नियम कड़े कर दिए हैं और ऐसा होना लाजिमी था, लेकिन किसी देश के राजनयिक और जाने-माने लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार क्या दर्शाता है। यह अमेरिका अच्छी तरह जानता है! आज अमेरिकियों को लगता है कि वह जिस तरह चाहेगा विश्व को अपने इशारों पर नचा लेगा तो यह उसकी अब तक की सबसे भयंकर भूलों में से एक हो सकती है। 1990 के दशक में ऐसा पल आया था जब सोवियत संघ के विघटन/टूटने से विश्व एक ध्रुवीय हो गया था, लेकिन अब रूस भी मजबूत स्थिति में आ चुका है, हालांकि सोवियत रूस वाली स्थिति शायद ही कभी हो। चीन भी अमेरिका को आंखें दिखाता रहता है और वह उससे कभी टकराव नहीं मोलता है तो आखिर क्या कारण है कि भारत के साथ सदा इस तरह का व्यवहार अमेरिका प्रशासन करता है। पाकिस्तान के साथ वही अमेरिकी प्रशासन दोगला रवैया अपनाता है। जबकि उसे पूरी सच्चाई मालूम है कि विश्व में कहीं भी आतंकी हमला हो, उसमें पाकिस्तानी तत्व निश्चित तौर पर पाये जाते हैं। भारत, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है, लेकिन अमेरिका को यह सब दिखता नहीं है क्योंकि पाकिस्तान और सउदी अरब जैसे देश उसके लिए मुस्लिम मुल्कों में पहुंचने का आधार है। परमाणु बम के नाम पर पहले इराक फिर अफगानिस्तान जैसे देश को अमेरिकियों के दखलअंदाजी कारण ही तबाही का सामना करना पड़ा है।

मौजूदा दौर में लीबिया, सीरिया, मिस्र जैसे देशों में आई अरब क्रांति के पीछे अमेरिका का खुले आम समर्थन है। हां, यह सच है कि इन देशों तानाशाही शासन थे या हैं लेकिन अमेरिका यहां के निवासियों को उनके कुशासन से मुक्ति नहीं चाहता, अगर चाहता तो सउदी अरब जैसे देश में पहले क्रांति आती। सउदी अरब के शासक उसके अनुसार चलते हैं, सो वहां उसे कुछ दिखता नहीं है। उसकी नजर तो तेल और खनिज संपदा से भरपूर इन क्षेत्रों का अपने लाभ के लिए दोहन करना है और वह ऐसा करता भी रहा है। पहले तानाशाही के शासन के दौरान भी और अब उनके खात्मे के बाद भी। भारत को अमेरिका के इस तरह के रवैये का डटकर विरोध करना चाहिए और उसके राजनयिकों के साथ भी अगर यहां इसी तरह का व्यवहार हो तो शायद अक्ल ठिकाने आ जाये, जो सातवें आसमान पर है। अब वो भारत ना रहा जिसे आप सदा आंखें तरेरते रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवी मजबूत अर्थव्यवस्था में से है और आज की स्थिति में भारत की अनदेखी शायद ही कोई देश ज्यादा दिनों तक कर पायेगा। आज ना तो अमेरिका में इतनी कूबत है कि वह भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और ना ही हथियारों का प्रतिबंध। एक से एक देश हैं जो भारत से साथ तकनीक से लेकर आर्थिक सहयोग के लिए मुंह बाये खड़े हैं। आज की स्थिति तो ऐसी है कि खुद अमेरिका में बरोजगारी, महंगाई अपने चरम पर है और वहां की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है जिसका एक प्रमुख कारण अमेरिकी हथियारों की बिक्री कम होना भी है। अमेरिका और पश्चिम जगत में आये दिन भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें आती रहती हैं। यहां तक कि पश्चिमी मुल्कों में दाढ़ी रखने या पगड़ी बांधने के कारण कई भारतीयों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और वहां की सरकार इन मामलों को गंभीरता से नहीं लेती है, जिसके कारण आए दिन ऐसे हादसों में किसी ना किसी भारतीय को अपनी जान गंवानी पड़ती है। भारत के सत्ताधारी दल और विपक्षी पार्टियों ने अमेरिका के द्वारा भारतीय उप वाणिज्य दूत, देवयानी खोबरागड़े के साथ इस तरह के व्यवहार पर ना सिर्फ चिंता जताई है बल्कि वहां से आये प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर उसे कड़ा संदेश भी दिया है। यहां तक कि नईदिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित अमेरिकी दूतावास से पुलिस सुरक्षा हटा ली गई है और अमेरिका दूतावास में कार्यरत कर्मचारियों का वीजा रद्द करते हुए उन्हें अपना पासपोर्ट जमा कराने को कहा गया है। उनकी सारी सुविधायें रद्द कर दी गई हैं, उनके कर्मचारियों को कितना वेतन दिया जाता है, इसकी भी जानकारी देने को कहा गया है। सभी दलों के नेताओं ने एकसुर से इस घटना की घोर निंदा की है।

देवयानी के साथ इस तरह का व्यवहार अमेरिका के दुस्साहस को ही दिखाता है और उपर से हेंकड़ी तो देखिए कि वहां का प्रशासन इसे अपनी गलती मानने तक को तैयार नहीं। देवयानी को उस समय हथकड़ी लगाई गई जब वो अपनी लड़की को लाने उसके स्कूल गई थी और उन्हें ना सिर्फ नंगा करके तलाशी ली गई बल्कि हार्डकोर अपराधियों के साथ उनके सेल में रखा गया। हमारे देश को चाहिए कि अगर अमेरिका का प्रशासन बिना शर्त इस पर माफी नहीं मांगता है तो हमें उससे अपने संबंधों पर पुनर्विचार करना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि हम हर बार नंगे होने के लिए वहां क्यों जाते हैं। जब हमारे पास दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा मौजूद है तो उसे दूसरे देशों में क्यों काम करने जाना होता है। यहां क्यों नहीं उन्हें उचित अवसर प्रदान किए जाते हैं। हमें अपनी कमियों को जल्द से जल्द दुरुस्त करना होगा और जितना हो सके, नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के दखल को कम करना होगा। प्रतिभा को उनका सम्मान देना ही होगा, वरना ये दूसरे देशों में ही जाते रहेंगे। आजादी के बाद से हम अपने देश में अच्छे शिक्षा संस्थान विकसित नहीं कर सके हैं। जो शिक्षा संस्थान थे भी उनका कबारा कर दिया है, हमारे राजनेताओं और उनकी मिलीभगत से शिक्षा के ठेकेदारों ने। यहां शिक्षा एक व्यवसाय हो चुका है, जहां गरीबों के बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ कागजों में उपलब्ध है। जिसे जिंदगी के लिए मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है, उसे शिक्षा कहां से मिल पायेगी, यह लाख टके का सवाल है। देश का काला धन, राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों के सहयोग से प्रतिवर्ष विदेशों में जमा होता है और अगर उसी का सही उपयोग हो जाये तो भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है। सोशल मीडिया के इस युग में अब कोई भी सूचना छुपाना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल है या यूं कहिए कि नामुमकिन है।

साधारण सी बात है सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले करोड़ों लोगों को आप नहीं खरीद सकते, चाहे आपके पास कितनी भी पूंजी क्यों ना हो? सभी भारतीय एक सुर से इस घटना की तीव्र निंदा करते हैं और इस घटना के प्रति जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग करते हैं तथा इसके साथ ही हम चाहते हैं कि अमेरिकी प्रशासन बिना शर्त माफी मांगे। यह सब पूर्वनियोजित कार्यक्रम है, किसी भी राजनयिक को सार्वजनिक तौर पर इस तरह से हथकड़ी लगाना और दुर्व्यवहार करना। जबकि सबको पता है कि उसी अमेरिकी में भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हमले के मुख्य आरोपियों में से एक डेविड हेडली उसकी हिरासत में मौजूद है, लेकिन उसने भारत को सौंपने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसके साथी पाकिस्तान की कलई खुल जाती। 1984 में भोपाल गैस रिसाव कांड के दोषी अमेरिका का ही है और क्या अभी तक उसे कोई सजा हुई है। भारत का ही एक और आरोपी अमेरिका में है जो नेपाल के रास्ते अमेरिका बाग गया था और वह दोहरे जासूसी मे संलग्न था। इस तरह के कई मामले हैं। जिस पर अमेरिका को जवाब देना है। या तो भारत सरकार की नींद अचानक से खुली है या फिर नजदीक में चुनाव है औऱ सभी दलों को लगता है कि यह एक अच्छा और संवेदनशील मुद्दा हो सकता है, तो भगवान मालिक। क्योंकि राजनीतिज्ञों की नजर में भारतीयों की यही औकाद है, सिर्फ वोटर औऱ कुछ खास नहीं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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