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अब समलैंगिक अमेरिकी राजनयिकों का क्या होगा…

By   /  December 19, 2013  /  3 Comments

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-हरेश कुमार||

अमेरिका में भारत के उप महावाणिज्य दूत, देवयानी खोबरागड़े के साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार किया गया वह किसी से अब छुपा नहीं है। एक महिला राजनयिक के साथ अमेरिका ने मानवता की सारी हदें पार कर दी, जो विश्व में अपने आप को मानवता का सबसे बड़ा संरक्षक कहता है। देवयानी को ना सिर्फ सार्वजनिक स्थान पर हथकड़ी लगाया गया और नंगा करके तलाशी ली गई बल्कि हार्डकोर अपराधियों के साथ उनके सेल में रखा गया। अदालत ने उन पर 2,50,000 डॉलर का जुर्मना लगाया। देवयानी अगर अपनी नौकरानी को कम पैसे दे रही थी तो उसे पैसे दिलाने के कई अन्य तरीके थे। इस तरह से सार्वजनिक स्थान पर हथकड़ी लगाना और नंगा करके तलाशी लेना तथा हार्डकोर क्रिमिनल के साथ सेल में रखना कहां तक न्यायोचित है। इसके पीछे कहीं ना कहीं साजिश की गहरी बू आती है। अमेरिका का रिकॉर्ड ऐसे भी इस मामले में बेहद खराब रहा है।114249

भारत के नेताओं ने एक सुर में घटना की कड़ी निंदा करते हुए वहां से दौरे पर आए एक शिष्टमंडल से मिलने से इनकार कर दिया। वैसे भी अमेरिका को कठोर भाषा ही समझ में आती है।

हम सभी देखते आये हैं कि कमजोरों को हर जगह सताया जाता रहा है लेकिन जब वही संगठन बनाकर खड़े हो जाते हैं, तो फिर इनकी ताकत के आगे कथित तौर पर बलवान या तो घुटने टेक देते हैं या किसी ना किसी बहाने समझौतावदी रुख अख्तियार कर लेते हैं। ऐसा ही अमेरिकी के साथ है। वह शीतयुद्ध के जमाने में सोवियत रूस से कभी आंखें नहीं मिला पाया तो आज की परिस्थिति में कम्युनिस्ट देश चीन उसे हर समय बंदरघुड़की देता रहता है और अमेरिका अपने आर्थिक हितों की खातिर सबकुछ सहन करता रहता है तो फिर क्या कारण है कि वह जब-तब भारत की बाहें मरोड़ता रहता है। कभी इस बहाने, तो कभी उस बहाने। देवयानी प्रकरण देखने में जितना सीधा लगता है उतना है नहीं।

अब एक नजर देवयानी प्रकरण पर डालते हैं। भारतीय विदेश सेवा में तैनात, देवयानी पर अपने नौकर के वीजा में गलत जानकारी देने का आरोप है। उन पर आरोप है कि वे अपनी नौकरानी को प्रति घंटे 9.75  अमेरिकी डॉलर (भारतीय मुद्रा में 536 रुपये) के स्थान पर मात्र 3 डॉलर (भारतीय मुद्रा में 165 रुपये) दे रही थीं। स्थानीय अदालत ने उन पर भारी जुर्माना लगाया और चूंकि वे भारतीय दूतावास में तैनात नहीं थी, इसलिए नौकरानी को जुर्माना ना भरने पर वहां के कानून के मुताबिक गिरफ्तार करना एकमात्र उपाय था। यह अमेरिका सरकार का पक्ष है। हकीकत तो दोनों पक्ष बेहतर ढ़ंग से जानते होंगे।

इधर आ रही खबरों के अनुसार, भारत सरकार ने इस मामले के बाद से देवयानी को बुधवार को संयुक्त राष्ट्र स्थित भारत के स्थायी मिशन में तबादला कर दिया है, जिससे अब वे राजनयिकों के लिए वियना समझौते 1961 के तहत मिलने वाले सभी छूट को पाने की हकदार हो गईं हैं। इससे पहले देवयानी उप महावाणिज्य दूत के तौर पर इन सभी छूटों से वंचित थीं।

खैर, अब आते हैं। अमेरिकी सरकार के दोहरे आचरण पर। एक तरफ तो अमेरिका सरकार अपने राजनयिकों के लिए विश्व भर में हर तरह की छूट चाहता है तो दूसरी तरफ वह कमजोर देशों पर दादागिरी दिखाने से भी नहीं बचता है। इसकी झलक समय-समय पर विश्व के देशों को मिलती रही है।

भारतीय वाणिज्यदूत के साथ की गई बदसलूकी के बाद से अब भारत में भी ऐसे अमेरिकी राजनयिकों के खिलाफ कठोर कदम उठाये जाने की मांग की जाने लगी है, जो यहां के कानून के अनुसार अपराध में संलिप्त हैं। जैसा कि सबको मालूम है भारत में समलैंगिकता धारा 377 अपराध है। और अमेरिका के कई राजनयिक ऐसे हैं जो घोषित तौर पर समलैंगिक हैं और उन्होंने भारत सरकार से अपने समलैंगिक जोड़ों के लिए छूट मांग रखी है?

गौरतलब है कि भारत सरकार ने अमेरिका से देवयानी प्रकरण में बिना शर्त माफी मांगने की बात कही है अन्यथा वह कड़ी कार्यवायी कर सकती है। राजनीतिक क्षेत्रों में ऐसी चर्चा जोरों पर है कि अगर अमेरिका बिना शर्त माफी नहीं मांगता है तो उसके समलैंगिक राजनयिकों और उनके साथियों पर धारा 377 के अनुसार कार्यवायी की जायेगी।

वियना समझौते के अनुसार राजनयिकों को कुछ छूट हासिल है। उन्हें ना तो गिरफ्तार किया जा सकता है और ना ही कैद में रखा जा सकता है। वियना कन्वेंशन फॉर डिप्लोमेटिक रिलेशंस और वियना कन्वेंशन फॉर काउंसिलर रिलेशंस के अनुसार, विभिन्न देशों के साथ संबंध परस्पर हितों को देखते हुए संचालित होते हैं। अगर कोई एक देश इसका उल्लंघन करता है तो दूसरे देश को इसकी जवाबी कार्यवायी करने की पूरी छूट है।

भारत में समलैंगिक संबंध अपराध होने के कारण ऐसे राजनयिकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवायी की जा सकती है, क्योंकि इसके लिए उन्हें किसी तरह की छूट हासिल नहीं है।

खासकर अमेरिका केवल ऐसे ही भाषा समझता है जो उसे सख्त लहजे में जवाब दे। ऐसा पहले भी हो चुका है। 10 वर्ष पहले भी अमेरिका ने भारतीय राजनयिकों की सुविधा खत्म कर दी थी। जवाब में जब भारत ने ऐसे ही कदम उठाये तो अमेरिका ने झुकते हुए भारतीय राजनयिकों के लिए सारी सुविधायें बहाल की तब जाकर फिर भारत ने अमेरिकी राजनयिकों की सुविधायें बहाल की।

इस समय जरूरत है ऐसे ही सख्त कदम उठाने की जिससे अमेरिका को लगे कि भारत उसका पिछलग्गू देश नहीं है बल्कि वह अपनी संप्रभुता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सचेत है और इसके बचाव के लिए हर तरह के कठोर कदम उठाने को तैयार।

क्या है धारा 377 जानिए: –

377. Unnatural offences: Whoever voluntarily has carnal intercourse against the order of nature with any man, woman or animal shall be punished with imprisonment for life, or with imprisonment of either description for term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

Explanation: Penetration is sufficient to constitute the carnal intercourse necessary to the offense described in this section.

The section was declared unconstitutional with respect to sex between consenting adults by the High Court of Delhi on 2 July 2009. That judgment was overturned by the Supreme Court of India on 11 December 2013, with the Court holding that amending or repealing Section 377 should be a matter left to Parliament, not the judiciary.

धारा 377 अप्राकृतिक यौन संबंध- कोई भी व्यक्ति जबरदस्ती प्रकृति के विरुद्ध में किसी भी व्यक्ति, महिला और जानवर के साथ यौन संबंध स्थापित करता है। तो उसे अपराध सिद्ध होने की स्थिति में आजीवन कारावास या दस वर्षों की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लग सकता है।

इसके लिए पेनिट्रेशन को पर्याप्त माना गया है।

इस धारा को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2009 को असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन हाल ही में 11 दिसंबर 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को पलट दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह संसद का विशेषाधिकार है ना कि न्यायपालिका का। संसद चाहे तो इसे रद्द कर सकती है

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. bharat kiwadrta hia bharat ka pas sab kuachha hia pramatma ko mat bhualua amirka pramatma sa droa nhia to kisia dian tumara pta nhia chalyaga yad rkhana jya hiand jya bharat

  2. mahendra gupta says:

    समलैंगिकों का क्या होगा ?इस विषय पर चर्चा न करें व सरकार से ज्यादा उमीद न करें तो ही अच्छा है.जो सरकार इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए कोर्ट में अर्जी लगा रही ही, स्वीकार न होने पर कानून लाने की सोच रही हो उस से यह सब आशा उचित नहीं.वैसे भी इतना कदम बढ़ाया यह क्या कम है?अमेरिका ने शर्त के साथ अपनी गलती न होने का कहकर खेद जताया है जिसे हम हमारी सरकार, हमारा मिडीया माफ़ी प्रचारित कर रहा है और हम अपनी कामयाबी मानते हुए खुश हो रहें हैं, बड़ा अजीब सा लग रहा है.बिन मांगे वहाँ के राजनयिकों को सुविधा प्रदान कर हम तो उनके आगे बिछे पड़ें हैं , यह हमारी मजबूरियों को दर्शाता है या चापलूसी को.यह तो सिन्हा ने यू ही बयानबाजी कर हवा में पत्थर उछाल दिया है , यदि वे आज विदेश मंत्री होते तो भी ज्यादा से जयादा यह ही कर पाते. सलमान ने भी सन्मान न मिलने तक संसद में न आने की घोषणा कर केवल वाह वाह लूटने का प्रयास किया,क्योंकि यहाँ तक होना तो प्रत्याशित था ही.देश के गौरव की चिंता इन्हें न तो कभी थी न होगी इसीलिए छोटे छोटे पडोसी देश भी भारत को आँख दिखा लेते हैं, कान भी मरोड़ लेते हैं.

  3. समलैंगिकों का क्या होगा ?इस विषय पर चर्चा न करें व सरकार से ज्यादा उमीद न करें तो ही अच्छा है.जो सरकार इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए कोर्ट में अर्जी लगा रही ही, स्वीकार न होने पर कानून लाने की सोच रही हो उस से यह सब आशा उचित नहीं.वैसे भी इतना कदम बढ़ाया यह क्या कम है?अमेरिका ने शर्त के साथ अपनी गलती न होने का कहकर खेद जताया है जिसे हम हमारी सरकार, हमारा मिडीया माफ़ी प्रचारित कर रहा है और हम अपनी कामयाबी मानते हुए खुश हो रहें हैं, बड़ा अजीब सा लग रहा है.बिन मांगे वहाँ के राजनयिकों को सुविधा प्रदान कर हम तो उनके आगे बिछे पड़ें हैं , यह हमारी मजबूरियों को दर्शाता है या चापलूसी को.यह तो सिन्हा ने यू ही बयानबाजी कर हवा में पत्थर उछाल दिया है , यदि वे आज विदेश मंत्री होते तो भी ज्यादा से जयादा यह ही कर पाते. सलमान ने भी सन्मान न मिलने तक संसद में न आने की घोषणा कर केवल वाह वाह लूटने का प्रयास किया,क्योंकि यहाँ तक होना तो प्रत्याशित था ही.देश के गौरव की चिंता इन्हें न तो कभी थी न होगी इसीलिए छोटे छोटे पडोसी देश भी भारत को आँख दिखा लेते हैं, कान भी मरोड़ लेते हैं.

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