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लोकपाल, जोकपाल या झुनझुना क्या है ये….

By   /  December 20, 2013  /  4 Comments

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-हरेश कुमार||

और अंतत: 45 सालों की प्रतीक्षा के बाद लोकपाल बिल दोनों सदनों से पारित हो गया. मई 1968 से चला यह सफर 2013 के दिसंबर में जाकर अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच सका. इस बीच गंगा-यमुना में कितना पानी बह गया और नेताओं ने अपने भ्रष्टाचार के द्वारा देश की अरबों-खरबों की संचित निधि को अपने बाप-दादा के द्वारा अर्जित संपत्ति में बदल लिया. नेताओं के कई पुरखे निश्चिंत.lokpal-bill आज भ्रष्टाचार का आलम यह है कि एक ग्राम प्रधान, मेयर तक के चुनाव में 40-50 लाख रुपये से लेकर करोड़ों रुपये खर्च हो जा रहे हैं फिर विधायक और सांसद का चुनाव हकीकत में कितना महंगा होता होगा यह किसी से छुपा नहीं है, जो भी राजनीतिक प्रबंधन से जुड़े हुए हैं. आये दिन यह और महंगा होता जा रहा है. कमजोर आर्थिक स्थिति के लोगों के लिए चुनाव में खड़े होना तो दिन में तारे देखने के समान है बशर्ते कि कोई पीछे से आर्थिक तौर पर समर्थन ना कर रहा हो.इन्हीं सब कारणों से 45 वर्षों से किसी ना किसी बहाने लोकपाल बिल लटक जाता था, क्योंकि नेताओं की कथनी और करनी में सदैव अंतर रहा है. एक तरफ तो वे जनता से भ्रष्टाचार को मिटाने का वादा करते रहे हैं तो दूसरी तरफ इस जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किस तरह से वे अधिक से अधिक उगाही कर सकें.

एक-आध अपवादों को छोड़ दें तो आज की राजनीति में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से किसी ना किसी तरह जुड़े हों. कुछ के पुत्र तो कई के निकट संबंधी बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों में उच्च पदों पर हैं और इसमें उनकी योग्यता कम कानून को प्रभावित करने और टैक्स चोरी करने से बचने का जुगाड़ ज्यादा काम आता है. औद्योगिक घराने भी इस तरह के संबंधों को जारी रखने में अपनी भलाई समझते हैं, क्योंकि उन्हें इसमें लाभ नजर आता है. ऐसी मान्यता स्थापित हो चुकी है कि इस देश में बगैर नेताओं के संपर्क के आप कुछ नहीं कर सकते हैं. खैर, अब आते हैं पास हुए लोकपाल बिल पर. इसके पीछे अन्ना हजारे के द्वारा पहले जंतर-मंतर और फिर रामलीला मैंदान में किया गया आमरण अनशन का हाथ है और इसका पूरा श्रेय अन्ना को जाता है. सरकार इस आंदोलन से घबरा गई थी, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष ने देश भर में मिले जनसमर्थन से जल्द से जल्द लोकपाल बिल पास करने की हामी तो भर दी थी, लेकिन उनकी नियत में खोट था. वरना इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल नहीं दिया जाता. अगर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से नहीं बदलता. अन्ना आंदोलन से अलग होकर अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक गंदगी को साफ करने के लिए अपने चुनाव चिन्ह, झाड़ू के साथ दिल्ली की जनता को आगे आने और पार्टी के पक्ष में मतदान करने की अपील की. सालों से नेताओं के भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी को 28 सीटों पर जीत दिला दी और यह राजनीतिक पंडितों के लिए अप्रत्याशित था, क्योंकि हर कोई अपने-अपने विश्लेषण के हिसाब से और अतीत को देखते हुए पार्टी को ज्यादा भाव नहीं दे रहे थे.

लेकिन केजरीवाल की पार्टी को मिली जीत और कांग्रेस की हार के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी ने सभी पार्टियों से अपील करके वर्षों से दबे-पड़े लोकपाल बिल को झाड़-पोंछकर साफ किया और आनन-फानन में उसे राज्यसभा और फिर लोकसभा में पारित करवा दिया. इसमें भारतीय जनता पार्टी भी लोकसभा चुनावों को देखते हुए आगे आई क्योंकि उसे डर लगने लगा कि अगर वह इस समय अपना समर्थन ना देगी तो जनता में इसका गलत संदेश जा सकता है और यही कारण था कि वह बिना चर्चा के इसे पारित करवाने पर तैयार हो गई. सारा कुछ चुनाव को देखते हुए किया गया है.

लोकपाल बिल को पारित कराने के लिए एक बार फिर से अपने गांव रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठना पड़ा. इससे पहले की एक और मुद्दा जनता को मिलता, सत्ताधारी पार्टी ने अपनी गिरती साख को बचाने के लिए आगे आना ही उचित समझा. राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का गिरता ग्राफ पार्टी नेतृत्व औऱ सोनिया गांधी के लिए चिंता का विषय रहा है. राहुल गांधी को पीएम बनाने के लिए ही अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को धृतराष्ट्र या यूं कहिए कि नाइट वाचमैन की तरह गद्दी पर बिठाया गया है, जिनकी अपनी कोई राजनीतिक जमीन नहीं है और वे कभी भी गांधी परिवार के लिए कोई संकट नहीं पैदा करेंगे. नहीं तो अगर कोई दूसरा व्यक्ति इस स्थान पर होता तो कांग्रेस पार्टी में सत्ता केंद्र को चुनौती दे सकता था. जैसा कि प्रणव मुखर्जी ने स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति बनना ही उचित समझा. क्योंकि अपनी सीमायें उन्हें मालूम हो चुकी थी.

हालांकि, पास हुए लोकपाल बिल से अरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी यानि आप के संस्थापक) असंतुष्ट हैं और उनका कहना है कि इस बिल से अगले दस सालों तक भ्रष्टाचारी तो क्या कोई चूहा तक नहीं मरेगा. अब इनकी चिंता लोकपाल बिल को लेकर मिलने वाले क्रेडिट को है या कुछ और ये तो वही बेहतर जाने. वैसे अन्ना और अरविंद केजरीवाल की टीम में काफी कड़वाहट आ चुकी है. दिल्ली में चुनाव जीतने पर अन्ना ने केजरीवाल को बधाई दी लेकिन अपने गांव रालेगण सिद्धि में गोपाल राय को गांव तक छोड़कर चले जाने को कह दिया. आप के सदस्य, गोपाल राय ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के उस बयान पर आपत्ति जताई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि अन्ना के आंदोलन का कुछ लोगों ने राजनीतिक फायदा लिया. बस फिर क्या था इतना सुनते ही गोपाल राय आपा खो बैठे और इसका जोर-जोर से प्रतिवाद करना शुरू कर दिया जिसके जवाब में अन्ना ने उन्हें कहा कि आपको यहां हमने नहीं बुलाया है और अगर हल्ला ही करना है तो गांव से बाहर जाकर हल्ला करें.

आजकल अन्ना के साथ किरण बेदी, पूर्व सेनाध्यक्ष, वीके सिंह और संतोष भारतीय हैं और इन सभी पर कुछ ना कुछ आरोप समय-समय पर लगे हुए हैं. जैसा कि सभी को पता है. अन्ना के आंदोलन से घबराकर सत्ताधारी दल ने अन्ना की टीम के एक-एक सदस्यों की पोल खोलनी शुरू कर दी थी जिससे कि आंदोलन की साख पर सवाल शुरू हो जाये. इसमें सरकार का साथ अन्ना की टीम में शामिल स्वामी अग्निवेश जैसे छद्म लोगों ने दिया, जिसकी अपनी साख सबको पता है. सबसे पहले किरण बेदी पर अपने ट्रस्ट में धोखाधड़ी का आरोप लगा तो फिर सेवानिवृत जनरल वीके सिंह पर अपनी जन्मतिथि में हेरा-फेरी करने का आरोप था. जिसे लेकर वे सुप्रीम कोर्ट भी गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उनकी हार हुई. इससे वे सरकार की साजिश मानते हैं लेकिन सबको पता है कि उन्होंने अपनी जन्मतिथि में हेरा-फेरी करके सेनाध्यक्ष की नौकरी पायी थी और वे इसे एक साल और बढ़ाना चाहते थे. मौजूदा सेनाध्यक्ष, विक्रम सिंह को अध्यक्ष नहीं बनने देने के लिए उन्होंने हर तरह की तिकड़म की है. अब आते हैं संतोष भारतीय पर. वे सदन के सदस्य रह चुके हैं और सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई लोगों से उनकी नजदीकी है और चौथी दुनिया समाचारपत्र के एडिटर-इन-चीफ हैं. इन्हें करीब से जानने वाले इनकी आदतों और कर्मों से अच्छी तरह परिचित हैं.

इधर आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास का कहना है कि वे अंत तक कठोर जनलोकपाल बिल के लिए लड़ते रहेंगे. यह कैसा लोकपाल बिल है जिसका समर्थन मायावती, लालू यादव से लेकर सारे राजनीतिज्ञ कर रहे हैं जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप है. बस मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और शिवसेना ने लोकपाल बिल का विरोध किया. समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने जहां इसे विकास विरोधी बताते हुए सदन का बहिष्कार किया वहीं उनके पीछे-पीछे अन्य पार्टी के सदस्यों के साथ-साथ शिवसेना के सदस्य भी सदन से बाहर चले गए. इन दोनों दलों के अलावा सभी पार्टियों ने लोकपाल का समर्थन किया. जनता दल यूनाइटेड का स्टैंड तो इस मामले में और भी रोचक रहा. एक तरफ तो शरद यादव ने लोकपाल बिल का समर्थन किया तो दूसरी तरफ इसे विकास विरोधी भी बताया.

शरद यादव ने लोकपाल को विकास विरोधी बताते हुए कहा कि इससे भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा. लो कर लो बात चिट भी मेरी, पट भी मेरी और कन्टा मेरे बाप का शायद इसे ही कहते हैं अब ये चुनावों में हार का डर है या सच में भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प. ये तो नेता ही जान. लेकिन जब तक देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो को स्वतंत्र नहीं किया जाता, तब तक इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है. सबसे बड़ा सवाल जो यहां उभरकर सामने आता है वह यह है कि जब यही लोकपाल बिल पास होना था तो अन्ना इस तरह उपवास क्यों कर रहे थे या उन्हें कोई पर्दे के पीछे से गलत स्थिति का बयान कर रहा है या अन्ना के कान भरे जा रहे हैं कि लोकपाल आंदोलन से उपजे जनसमर्थन से अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में पार्टी का गठन कर लिया और उनकी पार्टी को अप्रत्याशित तौर पर सफलता भी मिली.

अपने कार्यों से अन्ना कई बार उलझन की स्थिति पैदा कर देते हैं. दिल्ली चुनावों में भी देखने को मिला एक तरफ अन्ना अपने नाम का इस्तेमाल ना करने की कह रहे थे तो दूसरे तरफ जीतने पर बधाईयों देते हुए कह रहे थे कि अरविंद कभी अलग हुए ही नहीं. इधर अरविंद केजरीवाल की सफलता से कई स्थापित दलों के होश फाख्ता हो चुके हैं तो कई अन्ना को भड़का रहे हैं. जाहिर है सबको मालूम है कि अगर अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा में चुनाव ना लड़ते तो स्थिति दूसरी होती और आगे का भी डर सता रहा है.

दूसरी तरफ, अरविंद केजरीवाल पर अन्ना के आंदोलन के दौरान जमा किए गए पैसों को अपने राजनीतिक दल के लिए खर्च करने का आरोप लग रहा है. लोकतंत्र में सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने की छूट हासिल है और यही लोकतंत्र की मजबूती भी है. चलिए कम से कम कुछ तो हाथ लगा जनता के. वैसे भी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की कलई खुल चुकी है और जनता इनके असली चेहरे को देख चुकी है सो कितना भी क्रीम-पाउडर लगाओ ये दाग नहीं धुलने वाला जबतक कि असल में लोकतंत्र की स्थापना ना हो और भ्रष्ट लोगों को सजा ना मिले.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. mahendra gupta says:

    न कुछ होने से तो बेहतर है बाकि यह तो निश्चित ही है कि इससे कुछ होने वाला नहीं.जिस देश में भ्रस्टाचार राग राग में समाया हुआ हो,जहाँ इंसान भ्रस्टाचार की कोख में पल कर बड़ा होता हो,उसकी गोद में ही बड़ा हुआ हो वहाँ से समूल रूप से नष्ट करना या पच्चास से साथ प्रतिशत कम होना संदिग्ध ही है. अन्ना का प्रयास बेमिसाल सराहनीय है,पर राजनीतिज्ञ इसे पार नहीं पाने देंगे.यदि कांग्रेस की चार राज्यों में दुर्गति न हुई होती,भा ज पा को भी अगले चुनाव में कुछ हासिल करने की लालसा न होती तो यह पास नहीं होता.यह सब तो दो साल पहले भी हो सकता था.आज हमारे राष्ट्रीय सपूत को हाई लाइट कर कांग्रेस घिसे सिक्के को बाज़ार में चलाने की कोशिश कर रही है पर यह दावं कितना चलेगा वक्त बतायेगा. अभी इस सिक्के को चलाने के कई और प्रयास किये जायेंगे, देश के राजनितिक बाज़ार में वे कहाँ तक चलेंगे,मोदी का सिक्का भी भा ज पा व आर आर एस कई बार फेंक कर अडवाणी का भी सिक्का चलाने की कोशिश करेंगे पर यह बिल किसी के द्वारा नहीं आगे बढ़ाया जायेगा इसके चलाने में तो सब अड़ंगे ही लगाएंगे. बेचारे केजरीवाल का भी भय कोई कम नहीं.

  2. न कुछ होने से तो बेहतर है बाकि यह तो निश्चित ही है कि इससे कुछ होने वाला नहीं.जिस देश में भ्रस्टाचार राग राग में समाया हुआ हो,जहाँ इंसान भ्रस्टाचार की कोख में पल कर बड़ा होता हो,उसकी गोद में ही बड़ा हुआ हो वहाँ से समूल रूप से नष्ट करना या पच्चास से साथ प्रतिशत कम होना संदिग्ध ही है. अन्ना का प्रयास बेमिसाल सराहनीय है,पर राजनीतिज्ञ इसे पार नहीं पाने देंगे.यदि कांग्रेस की चार राज्यों में दुर्गति न हुई होती,भा ज पा को भी अगले चुनाव में कुछ हासिल करने की लालसा न होती तो यह पास नहीं होता.यह सब तो दो साल पहले भी हो सकता था.आज हमारे राष्ट्रीय सपूत को हाई लाइट कर कांग्रेस घिसे सिक्के को बाज़ार में चलाने की कोशिश कर रही है पर यह दावं कितना चलेगा वक्त बतायेगा. अभी इस सिक्के को चलाने के कई और प्रयास किये जायेंगे, देश के राजनितिक बाज़ार में वे कहाँ तक चलेंगे,मोदी का सिक्का भी भा ज पा व आर आर एस कई बार फेंक कर अडवाणी का भी सिक्का चलाने की कोशिश करेंगे पर यह बिल किसी के द्वारा नहीं आगे बढ़ाया जायेगा इसके चलाने में तो सब अड़ंगे ही लगाएंगे. बेचारे केजरीवाल का भी भय कोई कम नहीं.

  3. SUDHIR says:

    बिलकुल सटीक लेख है , लोकपाल के बारेमे , जो कि आजके परिपेक्षमे सही लगता है .

  4. राजनैतिक लोंगो का चरित्तय इस कद्र नीचे चला गाय है कि जो काम कभी मिशन के लिए देश के लिए किया जजत था अब वह केवल अपने परिवार अपने ही स्वार्थ के लिय किया जाने लगा है व्यक्ति कि शख्य विस्वश्नियता ख़त हो चुकी है चारयितक पतन आचरण में शिक्छ में पारिवारिक संस्कारो के समाप्प्त हो चूका है इसी करना जनता का भी व्यवहार तेजी से बदल रहा है डेल्ही इस का प्रमाण है कोई थोड़ी सी पहल कर तो जनता तुरंन्त बदल करना चाहती है बड़ी ही खतरनाक इस्थिति सामने आचुकी है बैचारिक मत भेद दुस्मनी के परवेश में दिखने लगे है जनता अपने हाथ में सीधी व्यवस्था लेले लोंगो को राजनीति के लोगो को सावधान होना ही चाहिए बगावत कोई अवांछित इस्थिति कभी भी सामने आसक्ति है विदेशी ताकते इस का भरी फायदाउठा सकती है देश अपने रास्ते से भटक सकता है ये चेतावनी का अलार्म बजने गला है समज कितनी श्रेणी में बता जा रहै है ये भी बहुत खरतनाक परिस्थिति बन रही है देश के धन को सम्प्प्ति को आर्थिक विभाजन को भी सावधानी से योगगयता पूर्वक सम्भालना होंगे

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