Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

दुविधा में दोनों गए माया मिली ना राम…

By   /  December 20, 2013  /  4 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-हरेश कुमार||
बिहार के लोग और नेता आजादी के पहले से ही राजनीतिक तौर पर बहुत ज्यादा सक्रिय तौर पर भूमिका निभाते रहे हैं. यहां के लोग देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा में राजनीतिक रूप से बहुत ही ज्यादा सक्रिय माने जाते रहे हैं. इतिहास को पलट कर देखें तो दुनिया को लोकतंत्र का पहला पाठ बिहार की धरती पर वैशाली ने सिखाया. तो इसी पावन धरती पर सम्राट अशोक पैदा हुए थे. महात्मा बुद्ध ने बहार की धरती पर ही बौद्ध धर्म की स्थापना की और महावीर ने जैन धर्म की. पटना के बगल में ही मनेर का दरगाह है जो मुस्लिम धर्म के लोगों को लिए अत्यंत श्रद्धा का विषय है. सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म भी पटनासाहिब में ही हुआ था. बिहार के इसी पावन धरती पर महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ चंपारण जिले में पहली बार सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की.nitish kumar

इसी धरती पर खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी ने मजफ्फरपुर जिले में अंग्रेज मजिस्ट्रेट, किंग्सफोर्ड पर बम से हमला किया था, लेकिन सौभाग्य से वह बच गया औऱ दो अंग्रेज महिला उनके स्थान पर मारी गई. भारत की आजादी के लिए प्रयोग किये गए पहले बम बिस्फोट की आवाज मुजफ्फरपुर से तीन मील दूर तक सुनाई दी थी. इतना ही नहीं, इस बम कांड की गूंज सात समंदर पार ब्रिटेन और यूरोप में भी सुनाई दी. और इस घटना को अंजाम देने के बाद, पुलिस द्वारा चारों तरफ से घिर जाने पर प्रफुल्ल चाकी ने तो खुद को गोली मारकर उड़ा लिया लेकिन खुदीराम बोस पकड़े गए और वे हंसते-हंसते भारत मां की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए. इनके अलावा, अनेकों अनाम स्वाधीनता सेनानियों के साथ-साथ हजारों लोगों ने अग्रणी पंक्ति में नेतृत्व किया. देश के पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी बिहार के सपूत थे, तो संविधान सभा के निर्माण में भी बिहार की मुख्य भूमिका रही.
अब आते हैं मौजूदा समय के राजनीतिक परिदृश्य पर. 1989 में मंडल-कमंडल की लड़ाई के बाद बिहार में एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ और लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन 15 वर्षों तक अपनी पार्टी के निष्कंटक शासन काल में बिहार के कुशासन से गर्त में मिला दिया. हर स्तर में भारी गिरावट दर्ज होती चली गई. शिक्षा से लेकर सड़क, चिकित्सा सब जो थे वो भी नाममात्र के रह गए. इस समय अगर किसी का विकास हुआ तो वह था अपराधी छवि के नेताओं का. बिहार में हर तरह के उद्योग-धंधे बंद होते चले गए और एक मात्र अपहरण उद्योग विकसित होता गया जिसमें अपराधी नेताओँ ने जमकर भागीदारी की. दूसरे क्षेत्रों की क्या कहें, राजधानी पटना में दिन-दहाड़े अपहरण और मंत्रियों की इसमें मिलीभगत आमबात हो गई थी. पटना की सड़कों पर कब एके47 गरज जाये कहा नहीं जा सकता था. राज्य की जनता के लिए यह सब सामान्य घटना बन गई थी और वो इस सबसे छुटकारा पाना चाहती थी. फिर इस स्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए आगे आया नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन जिसे राज्य की जनता ने सर माथे पर लिया. इससे पहले नीतीश कुमार ने समता पार्टी का गठन किया था जिसके 7 विधायक जीतकर विधानसभा में पहुंचे थे. उनका मुख्य वोट बैंक था कुर्मी-कोयरी जिसकी राज्य में लगभग सात प्रतिशत की आबादी है और यह जाति मुख्य तौर पर खेती से जुड़ी हुई है. जब नीतीश कुमार ने देखा कि अकेले रहकर लालू प्रसाद यादव को सत्ता से हराना आसान नहीं है तो उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से गठनबंधन कर लिया और इसका उन्हें सुखद परिणाम मिला. वे राज्य की गद्दी पर बैठे. पहले पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने पुलिस-प्रशासन को थोड़ी छूट दी और प्रशासन के काम में ज्यादा दखलअंदाजी नहीं की. स्पीडी ट्रायल चलाकर अपराधियों को सजा दिलायी, जिससे राज्य की जनता ने राहत की सांस ली और इसके कारण उनके गठबंधन को दोबारा बहुमत से सत्ता मिली. लेकिन सत्ता का नशा और मीडिया में नीतीश कुमार के कार्यों की जमकर तारीफ होने से नीतीश कुमार के मन में प्रधानमंत्री बनने की महात्वाकांक्षा ने हिलोरें लेना शुरू किया और इसके परिणाम के तौर पर 17 साल पुराना गठबंधन टूट गया. गठबंधन का फायदा जेडीयू को हो रहा था लेकिन गठबंधन टूटने के बाद से भाजपा को इसका फायदा होता दिख रहा है.

नीतीश कुमार मुस्लिम वोटों के चक्कर में पाकिस्तान की यात्रा पर गए और यहां तक कि यासीन भटकल जैसे आतंकियों की धड़पकड़ होने पर पुलिस ने पूछताछ नहीं किया. देश में कहीं भी कोई आतंकवादी घटनायें हो तो बिहार से उसके तार जुड़ने लगे. वैसे तो यह सिलसिला काफी पहले से शुरु हो गया था. इसके कई कारण है. एक तो राज्य की घनी आबादी और दूसरा भौगोलिक कारण – नेपाल से नजदीकी होना रहा है. लालू यादव के शासनकाल में सीतामढ़ी से 13 अफगानियों को एके47 के साथ पकड़ा गया था. फिर धीरे-धीरे आतंकियों का मधुबनी और दरभंगा मॉड्यूल प्रसिद्ध हो गया. इसमें एक तो गरीबी और दूसरे अशिक्षा ने आग में घी डालने का काम किया. बाबरी मस्जिद के विघटन के बाद से इसमें काफी तेजी देखी गई. पाकिस्तानी आकाओं के निर्देश पर कई आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया गया. हाल ही में पटना के गांधी मैंदान में भारतीय जनता पार्टी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैली में कई लोगों की मौत हो गई तो कई लोग जख्मी हो गए. इसमें बिहार के जेडीयू के समस्तीपुर के एक नेता के भतीजे की भूमिका तो पाई ही गई साथ में रांची मॉडल का नाम भी खुलकर सामने आया. वहीं से इसके लिए सारी तैयारियां की गई थीं.

जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां बिहार से किसी आंतकी को पकड़कर ले जाती नीतीश कुमार विधवा विलाप करने लग जाते और इन सबका परिणाम यह हुआ कि राज्य में ना सिर्फ इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा मिला बल्कि कुछ पर तो संरक्षण तक के आरोप लगने लगे.

हाल की राजनीतिक घटनाओं को अगर गौर से देखें तो पायेंगे कि नीतीश कुमार जब भाजपा से अलग हुए तो कांग्रेस पार्टी ने उनकी तारीफ करते हुए सेक्युलर से लेकर तमाम विश्लेषणों से ना सिर्फ नवाजा बल्कि राज्य की कई मांगों को आनन-फानन में स्वीकार कर लिया, जो वर्षों से लंबित पड़ी थी. यहां तक कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए नियमों में बदलाव भी तुंरत कर दिए. नीतीश कुमार ने भी जमकर लाभ लिया और लोगों को लगने लगा था कि कांग्रेस और जेडीयू में इस बार गठबंधन होगा और इसकी झलक भी दिखने लगी थी.
चारा घोटाले में जिस तरह लालू यादव को जेल हुई और फिर वे जमानत पर बाहर हुए तो जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनसे फोन पर गर्मजोशी से हालचाल पूछा और बधाई दी और फिर लालू ने अपने पुराने तेवर दिखाये उसने कई राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है. सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि जिस तरह से सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कमजोर दलीलें दी उससे काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है. कमजोर दलील के कारण ही लालू प्रसाद यादव को बेल मिला है.

इधर सत्ता का लाभ लेते हुए नीतीश कुमार ने कई कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही अन्य पिछड़े जो अतीत में यादव जाति की दबंगई से परेशान रहे हैं और दलित जातियों में सेंध लगानी शुरू कर दी थी. इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने दलितों में महादलित को अलग करके अपना वोंट बैंक बनाने की पहले की.

सूत्रों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के पीएम पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से समझौता कर सकती है. जिससे कि कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष वोटों का बंटवारा कम से कम हो. इस सबमें घाटे में अगर कोई होगा तो जनता दल यूनाइटेड और इसके नेता नीतीश कुमार ही. चारा घोटाला में जेल जाने के बाद भी लालू का यादव और मुस्लिम वोट कमजोर नहीं हुआ है और वह लगभग 18 प्रतिशत बना हुआ है. इसे ही देखते हुए कांग्रेस पार्टी लालू के साथ एक बार फिर से पींगे बढ़ा रही है. जिससे राज्य में ना सिर्फ अपना अस्तित्व बचाया जा सके बल्कि कुछ हद तक मोदी पर लगाम भी कसी जा सके.
उल्लेखनीय है कि 2004 में कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय जनता दल(आरजेडी) और लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के साथ तालमेल किया था, तब इस गठबंधन को राज्य में 29 सीटें मिली थीं. इसमें से आरजेडी को 22, कांग्रेस को 3 और एलजेपी को 4 सीटें मिली थीं. लेकिन 2007 में जब कांग्रेस अलग लड़ी तो उसे सिर्फ 2 सीटें मिलीं, आरजेडी को 4 सीटें और एलजेपी का खाता तक नहीं खुला.
वैसे तो आने वाला वक्त बतायेगा कि कौन कितने पानी में है और राज्य की जनता क्या चाहती है लेकिन अगर वोट जातिगत आधार पर हुए तो फिर असली टक्कर कांग्रेस और लालू के गठबंधन तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच ही होगा. हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी नालंदा और उसके आस-पास या कुछ जगहों पर अच्छी टक्कर देगी और यह पार्टी के उम्मीदवार सहित कई फैक्टर पर निर्भर करता है.
राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति कोई बेहतर नहीं है. हां, सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अगर हम शिक्षा या चिकित्सा व्यवस्था की बात करें तो इसमें कहीं कोई सुधार नहीं हुआ है. बल्कि शिक्षा का स्तर गिरा ही है. नीतीश कुमार ने राज्य की जनता से वादा किया था कि अगर हम राज्य की जनता को बिजली मुहैया नहीं करा सके तो हम वोट मांगने नहीं आयेंगे. अब देखते हैं कि वे अपने वादों पर कितना खड़ा उतरते हैं. वैसे राजनीति कब किस करवट ले, कहा नहीं जा सकता है.

इस बीच, अगर निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाये तो सबसे ज्यादा घाटे में अभी नीतीश कुमार दिख रहे हैं जिन्हें ना तो कांग्रेस का साथ मिलता दिख रहा है और भाजपा का साथ तो छूट ही गया है. ऐसे में सही ही कहा गया है. ना खुदा मिला, ना विशाले सनम. ना इधर के रहे, ना उधर के हम. और नीतीश कुमार की यही स्थिति दिख रही है अभी.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 4 years ago on December 20, 2013
  • By:
  • Last Modified: December 20, 2013 @ 4:15 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. ASHOK SHARMA says:

    राम के नाम का तो कुछ राज नैतिक दलों ने धंदा बना लिया है उस महान शक्ति को परेसान न करे तो शायद कुदरती के लिए ज्यादा ठीक होगा

  2. नीतिस जी क्या सभी राजनैतिक सत्ता के लोभी लोग अपमना गुना भाग अपने हिसाब से लगाते ही है किसी का पता खुल जाता है कोई छिपका कोशिश करते रहते है आने वाले समय में अप वो सिस नहीं चलेगी जो कांग्रेस पुराने समय में मुसलमानों को लेकर चलती रही है मुसल्मन अब सब समझने लगा है मुसल्मन अब सावधान हो चूका है वो सिक्का अब पिट चूका है पूरे देश में इन विधान सभयो मेंमुसल्मन ने बी जे पी को खुल कर वोट किया है १९००० वोट भोपाल में मुसल्मन ने कांग्रेस के विरोध में दिया १४५०० वोट खंडवा में कांग्रेस के खिल्फ्र दिया वो धरा अब बदल चुकी है नीतिस जैसे लोंगो को अब कुछ आवर ही सोचन होंगा मोदी की रैलोय में खले तोर पर तो हिन्दू का आकिरोश कांग्रेस के खिलाफ ही जा रहा है हिंदी इक जुट भी हो रहा है सब की चिंता केवल यही है की इस बार हिन्दू विभाजित नहीं होंगा निश्चित इक साइड ही जाएगा ये भारत के लिए भी उचित ही दीखाई दे रहा है विदेश निति पात्र भी यही प्रभयो देखने को मिलेगा

  3. mahendra gupta says:

    पहले तो सब कुछ अच्छा ही था पर आज़ादी के बाद बिहार का हर पार्टी ने बेडा गर्क ही किया.कोई चारा खा गया कोई रेल फैक्ट्री को ही चूना लगा गया.किसी ने गरीब के नाम पर किसी ने आम आदमी के नाम पर जो भी मिला खा गया.सुशासन बाबू भी कुछ पीछे नहीं.चारा खोर भी राष्ट्रीय दल के साथ ताल ठोक एक बार फिर मैदान में डट रहें हैं.पर बिहार का भला किसी से भी होने वाला नहीं.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: