/शादी हुई नहीं कि तलाक की कोशिशें जारी..

शादी हुई नहीं कि तलाक की कोशिशें जारी..

-हरेश कुमार||
दिल्ली में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को जहां 8 सीटें मिली तो आम आदमी पार्टी (आप) को 28 सीटें वहीं भारतीय जनता पार्टी को 32 सीटें मिली. एक सीट जनता दल यूनाइटेड को मिली है, शोएब इकबाल इसके विधायक बने हैं और एक सीट निर्दलीय विधायक ने जीती है.aap-bjp.congress
सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर भारतीय जनता पार्टी उभरी और आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही जबकि दिल्ली की सत्ता पर पिछले 15 सालों से काबिज कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है. एक तरफ कांग्रेस को केंद्र की सरकार के भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई के खिलाफ लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ा तो दूसरी तरफ, खुद शीला दीक्षित की सरकार पर भ्रष्टाचार के कम आरोप नहीं लगे थे. दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और इसकी जांच के लिए गठित शुंगलू समिति ने शीला दीक्षित सरकार पर कई सारे आरोप लगाये. लेकिन अपनी गलतियों को सुधारने और भ्रष्ट कर्मचारियों और नेताओं को सजा देने के स्थान पर शीला दीक्षित ने आरोपियों का जमकर बचाव किया. ना सिर्फ जांच रिपोर्ट मं हेरा-फेरी की गई बल्कि इसका दोष विपक्ष पर मढ़ा गया और राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि विपक्ष सरकार के द्वारा किए जा रहे कार्यों की जनता में सही तस्वीर पेश नहीं कर रही है बल्कि झूठे आरोप लगा रही है.
बिजली कंपनियों के द्वारा दिल्ली में की जा रही वसूली पर दिल्ली सरकार ने निजी कंपनियों का ना सिर्फ बचाव किया बल्कि जनता के हितों की अनदेखी करते हुए उसे सब्सिडी भी दी. बिजली-पानी और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता सत्ताधारी दल से बुरी तरह निराश थी और वो एक ऐसे पार्टी की ओर देख रही थी जो उसे इस सबसे निजात दिलाये.

भाजपा के नेता ऐसा मानकर चल रहे थे कि दिल्ली की सत्ता तो अब उनसे दो कदम दूर है और इसी सोच के कारण पिछले चुनाव में सत्ता उनके हाथ से चली गई थी और कांग्रेस पार्टी को थाली में सजाकर मिल गई थी. इसके पीछे मुख्य वजह पार्टी के नेताओँ का एक-दूसरे से अंदरखाने लड़ना और एक-दूसरे की काट करना मुख्य कारण रहा. लेकिन ना तो उन्हें इससे कोई सीख लेना था और ना लिया. इस चुनाव में राष्ट्रीय पटल पर पीएम के उम्मीदवार के तौर पर पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी का नाम उभरा और उनके आने के बाद से दिल्ली में डॉक्टर हर्षवर्धन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और पार्टी ने मोदी और हर्षवर्धन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और उसे 32 सीटों पर कामयाबी मिली. अगर, हर्षवर्धन को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया गया होता और मोदी ने चुनाव की कमान ना संभाली होती तो शायद इतनी भी सीटें ना मिलती.

इधर जनलोकपल, भ्रष्टाचार, बिजली, पानी के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी का गठन हुए अभी एक साल भी नहीं बीता था और किसी को भी अंदाजा नहीं था कि इस पार्टी को इतनी अधिक सीटें मिलेंगी. इसका मुख्य कारण इससे पहले बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में गठित दलों को जनता के द्वारा नकारा जाना रहा है. राजनीतिक पंडितों को इस चुनाव परिणाम ने चौंका दिया. एक तरफ जहां इस चुनाव ने कांग्रेस पार्टी की चूलें हिला दी वहीं भारतीय जनता पार्टी को सोचने पर मजबूर कर दिया. अगर आप पार्टी ना होती तो भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ ही जाती. और इसी डर के कारण 45 वर्षों से संसद में पारित होने की बाट जोह रहा लोकपाल को सभी पार्टियों ने अचानक से पारित कर दिया.
विधासभा के परिणाम आते ही कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को रोकने के लिए तुरंत आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन की घोषणा कर दी. कांग्रेस का इतिहास जानने वाले जानते हैं कि कांग्रेस का समर्थन कितने दिनों तक रहता है और वे इसकी कीमत किस तरह से वसूलते हैं. केंद्र में चंद्रशेखर, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल की सरकार इसके उदाहरण है.
आम आदमी पार्टी के नेता कांग्रेस के इस पुराने चाल को अच्छी तरह से समझते हैं कि समर्थन लेने के क्या नुकसान हैं और अगर सरकार ना बनाये तो क्या नुकसान है. क्योंकि लोगों में विपक्षी पार्टियों ने अब यह बात फैलानी शुरू कर दी है कि आप इसलिए सरकार नहीं बना रही है क्योंकि उसने ऐसा वादा कर दिया है जिसे पूरा करना नामुमकिन है. कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता तो ऐसा कह रहे हैं कि आप के वादे दिन में तारे दिखाने के समान है और यह कभी पूरा ना होने वाला है.
अगले साल लोकसभा का चुनाव है औऱ इसे देखते हुए सभी पार्टियों के नेता बगुला भगत बन रहे हैं. अगर, चुनाव की तिथि नजदीक ना होती और आप का प्रदर्शन इतना शानदार ना होता तो कई नेता अब तक दलबदल चुके होते या बिक चुके होते. जो आज संभव नहीं दिख रहा है. अचानक से राजनीति में शुचिता का प्रवेश हो गया है. सब कुछ सही-सही लगने लगा है. कभी-कभी तो खुद की आंखों पर विश्वास नहीं होता है कि क्या पॉलिटिक्स में इतनी जल्दी परिवर्तन संभव था, लेकिन ऐसा होता दिख रहा है. अब यो यह भविष्य में ही पता चलेगा कि यह सब पानी का बुलबुला था या सचमुच जनता के आगे नेता और दल झुकना शुरू हो गए थे.
कांग्रेस पार्टी के समर्थन देने की वजह से आप अजीब दुविधा में फंस गई है जिससे वो एक बार फिर से जनता के पास एसएमएस के द्वारा पूछने गई है कि हमें सरकार गठन करना चाहिए कि नहीं. और सुबह तक आ रही रिपोर्ट के अनुसार, आप सरकार गठन के पक्ष में दिख रहा है. वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष, अरविंदर सिंह लवली ने आप की आलोचना करते हुए कहा है कि आप ने जनता से झूठे वादे किए हैं और यही कारण है कि वह सरकार के गठन में देरी कर रही है.
इससे क्या लगता है! कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन किस कदर हैरान-परेशान करने वाला है. वह आप के दबाव में ऐसा सब कर रही है क्योंकि एक तरफ कांग्रेस पार्टी को मोदी को रोकना है तो दूसरी तरफ आप को समर्थन देकर वह दिल्ली की सत्ता में जमी रहना चाहती है. इसे राजनीतिक भाषा में कहा जाये तो मलाई खाने की आदत से कांग्रेस पार्टी के विधायक और मंत्र बुरी तरह से ग्रस्त हैं और यह सब इतनी आसानी से जाने वाला है नहीं. तभी तो हाल के चुनावों में बुरे प्रदर्शन के बाद भी कांग्रेस के नेता कुछ सबक सीखने को तैयार नहीं हैं. और इसे वे विपक्षी दलों का दुष्प्रचार कह रहे हैं. मां-बेटे के इस पार्टी में जहां पीएम एक मोहरे से ज्यादा कुछ नहीं हैं किसी में इसका प्रतिवाद करने की हिम्मत नहीं.
अब अगर सोमवार (25 दिसंबर) तक सरकार बन भी जाये, जैसा कि उम्मीद दिख रही है तो तो यह सरकार कितने दिन चलेगी यह देखना दिलचस्प होगा. क्योंकि जिस दिन कांग्रेस का कोई विधायक या मंत्री किसी भ्रष्टाचार के केस में फंसा. कांग्रेस सरकार को किसी ना किसी बहाने से गिरा देगी. लेकिन उसे भी पता है कि जनता इन सब पर निगाहें रखे हुए है. इसलिए कोई भी ऐसा कदम कांग्रेस उठाने से हिचकिचायेगी जो उसके लिए भविष्य में आत्मघाती होगा.
कांग्रेस की आप को मुट्ठी में रखने की हसरत कहीं महंगी ना पड़ जाये. कहीं ऐसा ना हो कि उसकी अपनी जमीन भी आप हसोत ले जो अभी तक उसके पास है. राजनीति में वैसे भी कब क्या हो जाये कह नहीं सकते. सो देखते हैं इस नए गठबंधन को. जिसमें शादी से पहले ही तलाक की संभावनायें प्रबल होती दिख रही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.