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कौन बनेगा दिल्ली का मुख्यमंत्री…

-हरेश कुमार||
दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिला है. यहां 70 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 36 सदस्यों की आवश्यकता है. विधानसभा में अभी की स्थिति के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है और इसके 32 विधायक जीते हैं जो बहुमत से 4 दूर है तो रामलीला मैंदान में अन्ना हजारे के द्वारा जनलोकपाल लागू करने के लिए किए जा रहे आमरण अनशन से अलग होकर अरविंद केजरीवाल के द्वारा बनाई गई पार्टी आम आदमी पार्टी को 28 सीटों पर विजय मिली. एक सीट निर्दलीय तो एक सीट पर जनता दल यूनाइटेड को जीत मिली.harshvardhan-arvind-kejriwal
वैसे अगर अगले साल लोकसभा का चुनाव नहीं होता तो कई पार्टियां तोड़-फोड़ कर लेती और सरकार का गठन हो जाता. सभी पार्टियां इस बात को लेकर अतिरिक्त तौर पर सचेत है कि जनता में उसके खिलाफ कोई गलत संदेश ना जाये और फौरी तौर पर लाभ के उसे भविष्य में ज्यादा नुकसान हो जाये. सरकार के गठन में देरी का यह सबसे बड़ा कारण है. नहीं तो भाजपा के लिए चार विधायकों का इंतजाम कोई बड़ी बात नहीं थी.
आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिली और उपर से कोढ़ में खाज की कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देकर उसकी मुश्किलें और बढ़ा दी. अगर उसे पूर्ण बहुमत मिल जाता तो कोई बात ना थी या उसे 10-15 सीटें मिलती तो भी कोई बात ना थी, लेकिन अरे ये क्या नाव किनारे लगते-लगते अटक गई. जनता को भी आप से बहुत सारी उम्मीदें हैं. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी को 4 सीट कम मिली तो दूसरी तरफ अम आदमी पार्टी को 28 सीटों पर सफलता ने कई राजनीतिक पंडियों को फिर से सोचने और नए सिरे से विश्लेषण को मजबूर कर दिया. काहे कि किसी ने इस पार्टी को महत्व नहीं दिया था. हर पार्टी इसका मजाक उड़ाने में लगी थी, यहां तक कह कांग्रेस की सीएम रही शीला दीक्षित और इश पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता तो यहां तक कह रही थीं कि चुनाव परिणाम के बाद केजरीवाल दिल्ली में दिखेंगे भी नहीं. लेकिन केजरीवाल तो दिख गए, शीला दीक्षित की 15 साल पुरानी सरकार चली गई. कहां वे अपने चौथी पारी का सपना देख रही थी और कहां खुद विधानसभा चुनाव हार गई. कई राजनीतिक पंडितों के अनुसार, शीला दीक्षित की नजर प्रधानमंत्री के पद पर लग गई थी और वे इसके लिए सोनिया गांधी से निकटता बढ़ाने लगी थीं. और इसका नतीजा प्रशासन पर कम और अकड़ ज्यादा बढ़ने लगा था. कहीं ना कहीं शीला दीक्षित को लग रहा था कि अगर कांग्रेस अगली बार केंद्र में आई औऱ किसी कारण से राहुल गांधी पीएम ना बने तो वे दौर में बनी रहेंगी. अपनी कमजोरियों पर ध्यान देने के बजाये वे फ्लाइ ओवर ब्रिज और मेट्रो के विकास को लेकर निश्चिंत थी लेकिन जनता भी देख रही थी कि किस तरह से दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस तक में साफ-सफाई के नाम पर कई सालों से नौटंकी किया जा रहा है और काम है कि कभी समय पर पूरा ही नहीं हुआ. वैसे तो कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के हाथ में है लेकिन पिछले साल 16 दिसंबर को हुए गैंग रेप और उसके बाद देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद दिल्ली सरकार के बारे में लोगों की राय अच्छी नहीं रही.
बिजली-पानी से लेकर भ्रष्टाचार के नित नए कारनामों से जनता त्रस्त होने लगी थी. और उसे एक मौका का इंतजार था, जिसे भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आगे आई. इसको रास्ता दिखाने के लिए योगेन्द्र यादव से लेकर प्रशांत भूषण की टीम थी तो देश-विदेश के लोग पहली बार किसी पार्टी के समर्थन में आगे आये और उन्होंने खुलकर इसके पक्ष में मतदान किया. आम आदमी पार्टी ने वोट के लिए हर तरह के हथकंडों का प्रयोग किया जो उसके कार्यों को लेकर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है. आप ने दिल्ली के जामिया इलाके में बाटला इनकाउंटर पर प्रश्न उठा दिया दिसका एकमात्र मकसद कट्टर मुस्लिमों का वोट पाना था. इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की शहादत राजनेताओं के लिए कोई मायने नहीं रखता. इन सबके लिए तो सिर्फ वोट बैंक ही सबकुछ है.
इधर, अगर अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए तो फिर आप का क्या होगा. वो जिस तरह से कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों पर प्रहार करते हैं, मुख्यमंत्री बन जाने के बाद नहीं कर पायेंगे. लोकसभा चुनाव नजदीक है और उसमें केजरीवाल के कंधे पर पार्टी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है. ऐसी स्थिति में लाख टके का सवाल है फिर कौन बनेगा मुख्यमंत्री…?
आप के द्वारा सरकार बनाये जाने की संभावनाओं को देखते हुए अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा इसे लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. पार्टी में मनीष सिसौदिया को मुख्यमंत्री बनाये जाने की संभावनायें ज्यादा प्रबल होती दिख रही है क्योंकि अरविंद केजरीवाल के बाद वे ही सबसे वरिष्ठ नेता हैं. वैसे कुमार विश्वास भी इस दौर में शामिल हैं. गोपाल राय, शाजिया इल्मी चुनाव हार गए तो संजय सिंह, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण ने चुनाव लड़ा ही नहीं. ऐसे में देखना बाकि है कि मुख्यमंत्री की गद्दी पर अभी कौन बैठता है. जो भी गद्दी पर बैठेगा उसके लिए यह कांटों भरा ताज होगा और जनता को उसे अपने कार्यों से साबित करना होगा कि हम कर सकते हैं, ये सिर्फ कोरे वादे नहीं थे.
आप ने मौजूदा राजनीतिक गंदगी को साफ करने के लिए जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया में हिस्सा लिया है और नई परिभाषा गढ़ी है वह आने वाले समय में बहुत कुछ कहने वाला है.
और अंत में – दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी औऱ उसके उपाध्यक्ष ने फिक्की को संबोधित करते हुए सूचना के अधिकार कानून और लोकपाल बिल पास होने पर कांग्रेस पार्टी की पीठ थपथपाई और कहा कि हम भले ही छक्का नहीं मार सके लेकिन हम आगे मजबूती से फिर उभरेंगे.राजनीति में जीत-हार लगी रहती है. हमने जनता के संदेश को समझ लिया है और पार्टी इसे पूरी विनम्रता से स्वीकार करती है. शिक्षा और बिजली के क्षेत्र में अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है. इस बीच वे मीडिया पर कटाक्ष करने से नहीं चूके कि मीडिया सरकार के अच्छे कार्यों को जनता के सामने नहीं लाती.
इसे ही कहते हैं रस्सी जल गई पर ऐंठन ना गई. देखते हैं कि कांग्रेस अपनी गलतियों से कुछ सीखती है या फिर वो भविष्य के गर्त में चली जाती है क्योंकि अब जनता जाग चुकी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.