/सबकुछ गंवा के होश में आए तो क्या किया…

सबकुछ गंवा के होश में आए तो क्या किया…

-हरेश कुमार||

चार राज्यों में बुरी तरह से चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष और पीएम पद के उम्मीदवार राहुल गांधी को भ्रष्टाचार एक समस्या नजर आ रही है. यह बात उन्हें तब क्यों नहीं समझ में आयी जब अन्ना हजारे जनलोकपाल के लिए रामलीला मैंदान में अनशन पर बैठे थे क्या तब वह अपने चापलूसों से घिरे थे और वे स्थिति का आंकलन सही तरीके से नहीं कर रहे थे. यह वही कांग्रेस पार्टी है जिसने आधी रात को सदन के सत्र को खत्म/अवसान करने की घोषणा कर दी थी, उस समय जनलोकपाल को पारित करने पर बहस चल रही थी. तब तो इसे किसी ने मना नहीं किया था.. आजादी के बाद से ही अधिकांश समय तक सत्ता पर काबिज कांग्रेस को भ्रष्टाचार और काले धर पर काम करने से किसने रोक रखा था.

यही कांग्रेस पार्टी है जिसने पहले तो रामदेव को रीसिव करने के लिए हवाई अड्डे पर अपने चार-चार केंद्रीय मंत्रियों को भेजा और फिर रात के अंधेरे में सत्ता का दुरुपयोग करते हुए रामदेव के बुलावे पर आए कार्यकर्ताओं पर लाठियां भी बरसाईं और रामदेव को अपनी जान बचाने के लिए सलवार कमीज में भागना पड़ा. क्या तब उसे यह सब दिख नहीं रहा था. आजादी के आंदोलन में भाग लेने वाली कांग्रेस की आज ऐसी दुर्गति होगी किसी ने सोचा तक नहीं था और इस पर ज्यादा मंथन की जरूरत भी नहीं है. यहां तक कि रामलीला मैंदान में लाठी चार्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने जमकर लताड़ लगाई थी, लेकिन परवाह किसे है परवाह होती तो स्थिति बहुत हद तक सुधर चुकी होती. ऐसा नहीं है कि बाबा रामदेव दूध के धुले हुए हैं लेकिन जब तक कांग्रेस को लगा कि वह इनका उपयोग कर सकती है तब तक तो वह उसके हर गलत कार्यों में पूरी तरह से सहभागिता निभा रही थी.RAHUL_GANDHI

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण रामदेव के योग शिविर से लेकर विभिन्न कार्यक्रमों में कांग्रेस के नेताओं की बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी को आप देख सकते हैं. रामदेव की योजनाओं को जिस तरह से कांग्रेस शासित केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने त्वरित गति से पूरा किया, क्या उसे आप नजरअंदाज कर सकते हैं. वो तो रामदेव का भारतीय जनता पार्टी की ओर झुकाव और फिर काला धन पर देश भर में किए जा रहे आंदोलन ने सारा खेल बिगाड़ दिया. हालांकि, खुद रामदेव पर काले धन की हेरापेरी का आरोप है.

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रामदेव की कई कंपनियों के हिसाब-किताब सही नहीं है और उन पर अपने गुरु के लापता होने सहित साथी बालकृष्ण पर फर्जी तरीके से डिग्री और नेपाली नागरिक होने के बावजूद भारतीय पासपोर्ट हासिल करने का केस चल रहा है. यह सब केस तब दर्ज किया गया जब रामदेव ने कांग्रेस और उसकी नीतियों का विरोध किया. कांग्रेस अचानक से कुंभकर्णी मुद्रा से जगी और उसे लगा कि रामदेव की आयुर्वेदिक कंपनियों के द्वारा ना सिर्फ टैक्स की चोरी की जा रही है बल्कि वह गलत तरीके से सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किए हुए है. इतना ही नहीं दवायें निर्धारित मापदंड पर खड़ी नहीं उतर रही थी, इससे पहले सबकुछ सही थी. यहां एक हाथ से ले तो दूसरे हाथ से दे का किस्सा समझ में आता है. अचानक से केंद्रीय और विभिन्न कांग्रेस शासित राज्य सरकारों की जांच एजेंसियां सक्रिय हुई और उसने रामदेव पर शिकंजा कसना शुरू किया. मीडिया में जमकर रामदेव के खिलाफ खबरें प्लॉट की जाने लगी, दूसरी तरफ रामदेव ने भी पलटकर वार करना शुरू किया और अब उसका साथ भारतीय जनता पार्टी दे रही थी. उसने मीडिया में अपने उत्पादों का विज्ञापन देकर पहले उसका मुंह बंद किया. इससे आप भारतीय मीडिया की निष्पक्षता को समझ सकते हैं.

खैर, हम बात कर रहे थे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के द्वारा फिक्की को संबोधित करते हुए भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या बताने की. इस बात से कोई भी व्यक्ति असहमत नहीं हो सकता है. सभी इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार इस देश की प्रगति में घुन की तरह बाधक बन रहा है. कोई भी परियोजना बने सबसे पहले उसमें नौकरशाह और राजनेता अपना कमीशन तय करते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने तो एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा भी था कि जो भी योजनायें बनती है उसमें से 1 रुपये में सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंचता है, तो सवाल है कि 85 पैसा जाता कहां है. क्या किसी भी दल के नेता ने इश पर ईमानदार चिंतन किया है.

क्यों नहीं राजनीतिक दल अपने खातों और चुनाव प्रबंधन सहित विभिन्न खर्चों को सूचना के अधिकार के तहत लाना चाहते हैं. इस खेल में सारी पार्टियां और उसके कथित साफ-सुथरी छवि के ईमानदार नेता शामिल है. बड़ी-बड़ी जनसभाओं में भ्रष्टाचार पर अंकुश की बात कहने वाले नेता इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह तैयार हैं, यह किसी से छुपी हुई बात नहीं है. क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या सपा, क्या बसपा, क्या कम्युनिस्ट या अन्य क्षेत्रीय दल. सबके एक ही विचार हैं, वो इसस बाहर हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता, मुख्तार अब्बास नकवी तो यहां तक चुटकी लेने से बाज नहीं आये कि लोग फिर नाश्ते में क्या खाया, उस पर भी सवाल करेंगे. आपको इतना डर क्यों लगता है जनाब? देश की जनता को खाने के लाले पड़ रहे हैं और आप हैं कि महंगाई, भ्रष्ट व्यवस्था से बेफिक्र अफनी ही बनाई दुनिया में मग्न हैं.

लोगों के जेहन में यह बात उभरकर सामने आ रही है कि जिस तेजी से कांग्रेस उपाध्यक्ष, राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया है. अगर उसी तेजी से कम से कम ज्यादा पीछे नहीं जायें तो यूपीए2 के शासनकाल में जिस तरह से घोटाले सामने आये उसी पर कुछ बोलते कि जांच कार्य को किस तरह से प्रभावित किया जा रहा है तो उनकी ईमानदार छवि लोगों के जेहन में बनती. 2जी स्पेक्ट्रम, कोल आवंटन सहित ना जाने कितने घोटाले हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट को देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी, सीबीआई को केंद्र सरकार का तोता तक कहना पड़ा जो पिंजड़े में बद रहना चाहती है और सरकार के इशारों पर नाचती है. ऐसा अगर सुप्रीम कोर्ट ना भी कहती तब भी देश के लोग समझते रहे हैं, क्योंकि विभिन्न जांच में वह केंद्रीय सत्ताधारी दल के निर्देशों पर जांच कार्य को प्रभावित करती है. जब कोई दल या नेता केंद्रीय सत्त को समर्थन दे रहा है तो उसके खिलाफ आरोप बंद या दलील कमजोर, जांच अभी जारी है, तथ्यों की पुष्टि नहीं हो पाई है, कहा जाता है लेकिन जैसे ही दल या नेता ने अलग होने की सोची बस फिर से सीबीआई की सक्रियता बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए कोल आवंटन का अगर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच नहीं होता तो अभी तक राजनेताओं को क्लीन चिट मिल गया होता.

मुंबई के कोलाबा इलाके में सेना की जमीन पर कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं के लिए बन रहे फ्लैट 6 मंजिल से 31 मंजिल हो गए और वो विधवाओं को मिलने के बजाये सैन्यअधिकारियों और नेताओं के लिए कैसे आवंटित हो गया. इस केस की जांच रिपोर्ट में तीन मुख्यमंत्रियों और एक दर्जन से अधिक सैन्यअधिकारियों का जिक्र है लेकिन देखियेगा सबको धीरे-धीरे क्लीन चिट मिल जायेगी.

तो दूसरी तरफ, हाल ही में चार राज्यों के चुनावों में हार को देखते हुए लोकसभा की तैयारी के लिए सोची-समझी साजिश के तहत सीबीआई के द्वारा चारा घोटाला में अभियुक्त लालू प्रसाद की जमानत की सुनवाई में कमजोर दलील देना इस बात की पुष्टि करता है. लालू ही क्यों? मुलायम.. मायावती, जयललिता, करुणानिधि के साथ भी ऐसा ही हुआ है. करोड़ों-अरबों का घोटाला और कोई दोषी नहीं. आय से अधिक संपत्ति और कोई दोषी नहीं.

एक-आध अपवादों को छोड़ दें तो ऐसा एक भी राजनेता बतायें जिसकी संपत्ति आय से अधिक नहीं हो चाहे वह ग्राम स्तर का बिचौलिया यानि दलाल सीधे शब्दों में कहें तो नेताओं और आम आदमी के बीच का संपर्क सूत्र. जिसके बगैर आप नेता जी से मिल भी नहीं सकते हैं, काम तो दूर की बात है, ही क्यों ना हो? यह आदमी नेताजी को मिलने वाली राशि का बड़ा हिस्सा लेता है. भाई नेता जी इसी के भरोसे तो काम करते हैं, विकास का.

देश के लोग यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि नेतागिरी का काम सबके बस की बात नहीं. क्यों कि उसमें भारी मात्रा में पैसे लगते हैं और यह काफी कुछ काले धन से संचालित होता रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भी किसी दल ने काले धन पर रोक लगाने की बात नहीं की. दूसरी तरफ, देश में भ्रष्ट व्यवस्था से तंग आ चुके लोगों ने इसे बदलने के आप पार्टी को ना सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि विदेशों से भी जमकर पैसे दिए हैं. और इसके विधायक ऐसे लोग हुए हैं जो कल तक राजनीति में आने की सोच भी नहीं सकते थे. इन लोगों का स्थापित दन के नेता औऱ उनके समर्थक किस तरह से विरोध कर रहे थे और मजाक उड़ा रहे थे, क्या यह बात किसी से छिपी हुई है.

राहुल गांधी ने फिक्की समारोह में लोकपाल को पारित होने की बात कही औऱ यह भी कहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए कुछ और विधेयक को पारित करना जरूरी है. हम इस बात को जानना चाहते हैं कि जब सारे दल भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अपने-अपने स्तर पर कृत संकल्पित हैं तो फिर सदन का सत्र दो दिन पहले ही क्यों अवसान कर दिया. क्यों नहीं इन विधेयकों को कानून का रूप दिया गया, जिससे आपकी बात का वजन और बढ़ जाता. इससे तो सारे देश के लोगों में एक ही संदेश जा रहा है कि भ्रष्टाचार और काला धन को खत्म करने में किसी दल की कोई रूचि नहीं है और वे बस जनता को अपने-अपने स्तर पर बेवकूफ बनाने में लगे हुए हैं. इसलिए जनता अभी तक राजनीति से कटी हुई थी और उसका स्पष्ट मानना था कि सारे एक ही हैं, हमें क्या मिलने वाला है और वह इन पंक्तियों को दोहराती थी, कोऊ नृप होए हमें का हानि. लेकिन जब पानी सर से गुजरने लगा तो एक बार सभी घर से निकले और स्थापित पार्टियों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर तुम नहीं बदले तो हम तुम्हें बदल देंगे. हमारे पास अब विकल्प है.

अभी तो कम से कम स्थापित पार्टियों के कार्यों को देखकर यही लगता है कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के अलग-अलग हैं, लेकिन यह सब ज्यादा दिन चलने वला है नहीं. अगर कोई राजनीतिक दल और इसके नेता यह सोच रहे हैं कि थोड़े दिन के बाद सब शांत हो जायेगा और राजनीति में तो यह सब होता आया है. हार-जीत लगी रहती है तो यह उनकी अब तक की सबसे बड़ी भूल होगी और वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.