/मीडिया में एक नहीं कई तेजपाल हैं…

मीडिया में एक नहीं कई तेजपाल हैं…

-हरेश कुमार||

तहलका पत्रिका के एडिटर-इन-चीफ का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक और संपादक अपनी महिला सहयोगी के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

कैप्टन टीवी के संपादक पर उन्हीं के यहां कार्यरत महिला सब-एडिटर के द्वारा यौन उत्पीड़न का केस दर्ज कराने और पुलिस के द्वारा संपादक को गिरफ्तार करने का मामला प्रकाश में आया है। महिला कर्मचारी की शिकायत पर संपादक को चेन्नई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

उल्लेखनीय है कि कैप्टन टीवी का मालिकाना हक विजयकांत के नेतृत्व वाली डीएमडीके पार्टी के पास है।Captain-TV-Logo-01

एक तरफ, पुलिस के सूत्रों का कहना है कि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिला को कुछ दिनों पहले ही चैनल से निकाला गया है। तो दूसरी तरफ, कैप्टन टीवी चैनल की तरफ से कहा जा रहा है कि उसके संपादक पर लगाए गए आरोप सरासर बेबुनियाद और झूठे हैं। चैनल के अधिकारियों के अनुसार, संपादक ने कुछ समय पहले एक रिपोर्टर पर हुए हमले के खिलाफ कोई कार्यवायी ना किए जाने का विरोध किया था और पुलिस उसी घटना का बदला ले रही है। सच्चाई तो दोनों पक्ष ही बेहतर जानते हैं। निष्पक्ष जांच से सारी तस्वीर लोगों के सामने आयेगी। सभी पक्षों को पुलिस की जांच में सहयोग करना चाहिए जिससे कि किसी को ऐसा ना लगे कि सच्चाई से आंख चुराई जा रही है।

मीडिया की चकाचौंध ने हर वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफलता पाई है और इस क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाने के लिए महिलायें भारी संख्या में घरों से बाहर निकल रही है, लेकिन इस तरह के कदमों से ना सिर्फ महिलाओं के रोजगार पर गलत असर होगा बल्कि समाज में आधी आबादी को कुछ लोगों की गलत हरकतों के चलते बेवजह खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

इस तरह के मामले को गौर से देखें तो तस्वीर का दूसरा पहलू और भी खतरनाक है। कई मामलों में ऐसा देखने को मिला है और यह कुछ हद तक सच भी है। लड़कियों की हर कीमत पर आगे बढ़ते जाने की भूख भी इस के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। और ये लोग इसका जमकर लाभ उठाते हैं। ऐसा नहीं है कि यह ना कोई पहला मामला है, और ना ही अंतिम। लेकिन दूसरों पर आरोप लगाने वालों को अपने पर जब आये तो राजनीति छोड़कर सच्चाई का सामना करना चाहिए। नहीं तो मीडिया संस्थानों की बची-खुची विश्वसनीयता जाती रहेगी।

लगभग हर आम-खास मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखने वाले भारतीय प्रेस परिषद अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू का तहलका के एडिटर-इन-चीफ, तरुण तेजपाल या इस तरह के अन्य केस में अभी तक कुछ ना कहना हलक में उतर नहीं रहा। वैसे भी जबसे उन्होंने 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख कहा, तब से उनकी राय जानने की उत्सुकता बढ़ गई है, आम भारतीयों को उनकी राय का बेसब्री से इंतजार रहता है।

मेरी व्यक्तिगत राय है कि एक जज के तौर पर मार्कंडेय काटजू की जो प्रतिष्ठा थी, भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने कुछ ही दिनों में गंवा दी। और इसका कारण काटजू अच्छा तरह जानते हैं।

एक बार जब लोगों के मन में किसी के प्रति गलत धारणा बन जाती है तो उसे दूर करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए जिस किसी के दामन पर दाग लगा हो उसे सुनिश्चित करना चाहिए कि वह सबसे पहले अपने दामन पर लगे दाग को साफ करे। फिर. कुछ बोले। क्योंकि शीशे के घरों में रहने वाले लोगों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।

गौरलतब है कि इस घटना से कुछ ही दिन अपने स्टिंग ऑपरेशनों और महिला अधिकारों के लिए लड़ने के लिए मशहूर रहे तहलका मैगजीन के एडिटर-इन-चीफ पर गोवा में पत्रिका के चिंतन शिविर में भाग लेने के दौरान एक प्रशिक्षु महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का केस दर्ज किया था। पहले तो संस्थान के द्वारा इसे हर संभव तरीके से दबाने का प्रयास किया गया लेकिन जब पीड़ित महिला कर्मचारी ने अपने साथ घटित दुर्व्यवहार को अपने तीन अन्य साथियों को बताया और फिर तहलका की प्रबंध संपादक, शोमा चौधरी के द्वारा जांच समिति का गठन किया गया, कुल मिलाकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया जा रहा था।

जबकि विशाखा बनाम अन्य बनाम राजस्थान सरकार व अन्य 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह के केस में जांच के लिए गठित समिति में आधे सदस्य महिला होने चाहिए और महिला ही अध्यक्ष होने चाहिए लेकिन तहलका प्रकरण में ऐसा कुछ नहीं था। पहले तो तहलका के एडिटर-इन-चीफ, तरुण तेजपाल ने खुद संस्थान से छह महीने हटने का नाटक किया। इसे कोई भी समझ सकता है कि वे क्या दर्शाना चाह रहे थे। अपनी बेटी की उम्र की महिला सहकर्मी के साथ उनका यह व्यवहार किस तरह का आदर्श पेश कर रहा था। सभी जानते हैं कि तहलका पत्रिका अपने विज्ञापन में कौए को किस तरह इस्तेमाल करता रहा है। मैगजीन के कवर से लेकर विज्ञापन में कौए को तो दिखाया ही जाता है और फिर स्वर्गीय राजकपूर के निर्देशन में ऋषि कपूर और डिंपल कपाडिया को लेकर बनी सुपरहिट फिल्म, बॉबी के बने गाने झूठ बोले कौआ काटे.. से अपने को जोड़ता रहा है। लेकिन जब खुद पर बन आई ती सारी हेंकड़ी दूर हो गई और असली चेहरा सामने आ गया। स्टिंग ऑपरेशनों की आड़ मे तेजपान एक पत्रकार नहीं बल्कि कॉरपोरेट चेहरा थे, जिसका खुलासा अब धीरे-धीरे हो रहा है और वे इसकी सजा गोवा पुलिस की हिरासत में भुगत रहे हैं।

जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है। तहलका के प्रमुख संपादक, तरुण तेजपाल के साथ भी ऐसा हुआ है। दूसरों को सीख देने वाले इस पत्रकार को अपनी गलतियों का खामियाजा आखिरकर भुगतना ही पड़ेगा। अभी तक उन पर लोगों का जो विश्वास था, वह कमोबेश ही नहीं बुरी तरह से टूट गया है। जो लोग उच्च मूल्यों के संरक्षण की बात जोर-शोर से करते रहे हैं। उनके बारे में इस तरह की बातें सुनना किसी को भी शोभा नही देता।

हम सभी मानव हैं और हम सब से यह गलतियां हो सकती है, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम अपने आप ही जज और वकील दोनों बन जायें और फैसला सुना दें। न्याय का तकाजा यही है कि सिर्फ पद से इस्तीफा देने के बजाये न्यायिक जांच में सहयोग करना ज्यादा जरूरी है, जिससे कि पत्रिका की निष्पक्षता और लोगों का विश्वास बना रहे, जैसा कि अब तक पत्रिका का दावा रहा है वरना लोग इस पर उंगली उठाने लगेंगे।

सभी को पता है कि किस तरह से एक लड़की / महिला को कदम-कदम पर आरोपों का सामना करना पड़ता है। और अगर बात जब इस तरह की हो तो आगे चलकर कॅरियर और शादी पर भी असर पड़ता है। हर जगह इस स्थिति से लाभ लेने वाले लोग खड़े हैं।

एक रोचक तथ्य –

तहलका के कौए को कांग्रेस और इनकी सहयोगी पार्टियों के घोटालों के बारे में कभी पता ना लगना क्या साबित करता है? क्या तहलका के कौए की आंख कानी थी जो सिर्फ भाजपा या संबंधित पार्टियों के भ्रष्टाचार को ही देखा करती थी। हमने कहानियों में पढ़ा है कि इंद्र के बेटे जयंत की आंख कानी हो गई थी (उसने दूसरे की स्त्री को ओर बुरी नजरों देखा था। भगवान जाने हकीकत क्या है?)। सो, हो सकता है कि कानी आंखें होने से तहलका को कांग्रेस या समर्थक पार्टियों के भ्रष्टाचार नहीं दिखे। या वह देखना ही नहीं चाहती थी।। अब जब बुरी तरह फंस गए हैं तो अपने अपराधों को छुपाने के लिए भाजपा पर आरोप मंढ रहे हैं। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का अपराध इससे कम नहीं हो जाता है। स्टिंग में तो वो साबित हो ही गया था

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.