/“आप” अर्थात आम आदमी पार्टी के नाम खुली चिट्ठी…

“आप” अर्थात आम आदमी पार्टी के नाम खुली चिट्ठी…

अरविंद केजरीवाल, योगेन्द्र यादव एवं आम आदमी पार्टी से जुड़े अन्य साथीगण,

चलिए जनाब़ जब “आप”ने पूछा है तो बता देते है. ‘“आप”’ने भूल नहीं बवंडर जरूर किया है. भारतीय संविधान aamदुनियां का सबसे लम्बा संविधान होने के बावजूद भी बहुत से बिन्दुओ पर अस्पष्ट है. उसमें से एक सरकार बनाने की प्रक्रिया को लेकर भी है. संविधान की धारा 163 के अनुसार राज्यपाल को सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी. इसका नेतृत्व मुख्यमंत्री करेगा. सरकार बनाने को लेकर संविधान सिर्फ इतना भर कहता है कि सरकार को सदन के बहुमत का समर्थन हासिल होना चाहिए. मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हुए यह राज्यपाल को तय करना होता है कि मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो. अर्थात यह विषय पूर्णतः राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र का है. यदि चुनाव परिणाम में किसी दल विशेष को बहुमत हासिल हो तब तो कोई समस्या पैदा नहीं होती है. राज्यपाल को बहुमत दल के नेता को बुलाना ही पड़ता है. पर त्रिशंकु विधान सभा की स्थिति में मामला उलट जाता है.

चुकिं त्रिशंकु विधान सभा की स्थिति में सरकार बनाने की प्रकिया को लेकर संविधान मौन है. अतः सरकार बनाने में राज्यपाल की भूमिका बढ़ जाती है. यह राज्यपाल के व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर करता है कि सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले दल से से पहले विधायकों की परेड़ कराने के लिये कहे अथवा या सदन में विश्वास मत के समय शक्ति परीक्षण करने के लिए कहे. चूंकि अब से पहले की स्थिति यह थी कि चुनाव के नतीजे आये नहीं कि राज-(अ)नैतिक पार्टियों में सरकार बनाने के लिये होड़ सी शुरू हो जाती थी. चुनावी मंच पर गला फाड़ फाड़ कर एक दूसरें को गरियाने वाले दल एक दूसरे के गले मिलने लगते थे. जनता को बरगलाने के लिए बिरयानी-पार्टियों में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनने लगते हैं. जनता अंगुली काली करवा कर फिर से पांच साल के लिए मूक-दर्शक की भूमिका में आ चुकी होती थी. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ये अपने “आप” में पहली घटना है जब हर पार्टी मुख्यमंत्री का ताज एक दूसरे की तरफ उछाल रही है. अभी तक का इतिहास तो ये रहा है कि ताज लेने के लिए एक होड़ सी लग जाती है. बहुमत के जादूई आकड़े को प्राप्त करने के लिए इन और आउट का गेम शुरू हो जाता है. ऐसे में एक पार्टी (कांग्रेस) बिना शर्त समर्थन उस पार्टी (आम आदमी पार्टी ‘“आप”’) को दे रही है जिसका जन्म ही कांग्रेस द्वारा पहली की गई कारगुजारियों की वजह से हुआ है, तो उसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है?

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने समर्थन देने और लेने वाले दोनों का राजनीतिक आधार खत्म किया है. ये तो रही सतर्कता की बात. पर इस सतर्कता के साथ विवशता भी है. इस समर्थन की विवसता को कांग्रेस की हृदय परिवर्तन नहीं मान लेना चाहिए. ‘“आप”’ पर सरकार बनाने का जो दबाव है उसे सिर्फ इतने भर से नहीं समझा नहीं जा सकता कि “अरे भइ “आप” बनाओ सरकार और कुछ करके दिखाओ. हम तो ‘फेल’ रहे ‘“आप”’ ही ‘पास’ होकर दिखाओ, बोलते तो बहुत थे, अब कुछ कर के दिखाओ. सरकार के बाहर रह कर आलोचना करना एक बात होती है और सरकार के अंदर रह कर कर पाना दुसरी.”

यहां पर गौरतलब यह है कि परिवर्तन सिर्फ सरकार का ही हो रहा है. उस सरकार को चलाने वाले मैकेनिजम अर्थात नौकरशाही का नहीं. न ही उस सरकार को चलाने के लिये जो बहुमत की जो विवशता है, उसका ही हो रहा है. अर्थात जैसा कि कांग्रेस की विशेषता रही है कि ऐन मौके पर समर्थन वापस. यहां कांग्रेस के लिये उम्मीद की किरण उसके द्वारा स्थापित ऩैकरशाही की व्यवस्था ही है. दिल्ली ही नहीं सम्पूर्ण नौकरशाही (सरकारी तंत्र) का ढ़ाचा ही कांग्रेसी संस्कृति से ढ़ला हुआ है. भारतीय  नौकरशाही के संस्कार जो विरासत में अंग्रेजों से प्राप्त हुए थे वे कांग्रेसी कल्चर में ही पले बढ़े है. कोई भी अफसर तब तक स्थाई नहीं हो सकता जब तक उसका कांग्रेसी कल्चर के अनुरूप यज्ञोपवीत संस्कार न हो जाए. कांग्रेस इस नौकरशाही के भरोसे समर्थन का दाव खेल रही है. इस लिए कह भी रही है कि ऐसे वादे नहीं करने चाहिए जो पूरे न हो सके. अर्थात भ्रष्टाचार चलते रहने देना चाहिए. लूट खसोट की व्यवस्था चलले रहनी देनी चाहिए. पुलिस को रिश्वत लेते रहने देना चाहिए. बिजली कम्पनियों को मन माफिक बिल उसुलने देना चाहिए. चलिये कांग्रेसी कल्चर  का उदाहरण के रूप में बिजली कम्पनियों को ही लेते है. जिन्होनें कांग्रेस और भाजपा के आशिर्वाद से अपने-अपने क्षेत्र  में  एकाधिकारी हसिल किया है . ये कम्पनियों केवल अपने एकाधिकार की वजह से ही मन चाहा कीमत वसूल पा रही है. ‘“आप”’ने तो दाम आधे करने की बात की है पर यदि लागतों की आडिट (जांच) करवा दी जाए तो बिजली की कीमत एक चौथाई  भी  नहीं  बचेगी. क्योंकि घपला लागतों को मनचाहा दिखा कर ही किया जा रहा है. तीन लाख की लागत तेरह नहीं तीस लाख दिखाई जाती है.

यही स्थिति कमोबेश तमाम दूसरी निजी एवं सार्वजनिक कम्पनियों पर भी लागू होती है. अतः यहां पर विवशता कांग्रेस की ये नहीं की सरकार बने या न बने अपितु विवशता ये है कि कांग्रेसी कल्चर बचे या न बचे की है. जब सम्पूर्ण राज-(अ)नैतिक  व्यवस्था इस कांग्रेसी कल्चर में सराबोर हो तो यदि एक दल इस कल्चर के खिलाफ उठ खड़ा हुआ हो,  तो सर्व प्रथम तो यही प्रयास रहना चाहिए कि वह उस कल्चर में रमे. रमने के लिये सत्ता के गलीयारें  में फंसना जरूरी है और न रम सके तो नाकारा साबित हो. और जब यह सब कुछ कांग्रेसी बैसाखी के सहारे  हो तो क्या बात है!

लेकिन एक संकट इससे भी बड़ा है यह है संविधान के अस्तित्व का संकट. यदि बिना सरकार बने दुबारा से चुनाव होते है तो सबसे बड़ा जो संदेश जायेगा वह यह कि वर्तमान संविधानिक व्यवस्था में सांसदों/विधायको की खरीद फरोख्त किए बगैर सरकार नहीं बन सकती.  संविधान द्वारा तय सरकार बनाने की प्रकिया में ही कुछ ऐसी तकनीकी खामी है कि सांसदों/विधायको की खरीद फरोख्त एवं आया राम गया राम प्रक्रिया, मिल बाँट के खाओ के सिद्धान्त पर सरकार बन सकती है . सिद्धान्त और मूल्यों के आधार पर नहीं. मान लो कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन का पत्ता न फेंका होता तो क्या होता ?  यदि तीनों ही दल इस बात पर अड़ गए होते कि वे समर्थन न लेगे न देगे तो ‘“आप”’ की सभाओं में क्या चर्चा चल रही होती? चर्चा ये होती कि सरकार बनायी जाए या ना बनायी जाए या चर्चा ये होती कि वर्तमान संविधानिक व्यवस्था में बिना सांसदों/विधायको की खरीद फरोख्त के,  बिना आया राम गया राम प्रक्रिया के,  बिना मिल बाँट के खाओ के सिद्धान्त के सरकार बनाना सम्भव है भी कि नहीं.

इस प्रकार कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने के दाव से एक बड़ी बहस को जन्म होने से रोक दिया . और राजनीति के बड़े धुर्धर ने सरकार बने के नहीं की चर्चा तक समेट कर रख दिया. इतना तो कांग्रेस भी जानती थी कि ‘“आप”’ उसके समर्थन को आसानी से हज़म नहीं कर पायेगा.  चुकिं ‘“आप”’ के वरिष्ठ नेताओं में भी समर्थन के बिंदु को लेकर मतभेद थे. चूँकि सरकार न बनना सबके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा था. इस लिए भाजपा नेता नितिन गडकरी “आप” को ‘ऱाईटिस्ट माओवादी’ कह रहे है. व्यवस्था का संकट संविधान के अस्तित्व का संकट है. सरकार बन जाती है तो ये चर्चा टल सकती है. सोचिये यह स्थिति दिल्ली को छोड़ अन्य चार राज्यों, जहां अभी हाल ही में चुनाव हुए है, की होती तो भी क्या राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए एक पल के लिए भी सोचना पड़ता? इसलिए कांग्रेस हो या भाजपा दोनों चाहते है कि किसी तरह से दिल्ली में सरकार तो कम से कम बने ही.

अब चूँकि सारी चर्चा का दिल्ली में सरकार बने अथवा न बने पर आ टिका है तो ‘“आप”’ क्या करे? सर्व प्रथम तो जहां यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि “आप” को दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा के मना करने के बाद, सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया गया था. पहल “आप” की नहीं थी. अतः “आप” पर सरकार बनाने से पूर्व विधायकों का समर्थन पत्र लाने के लिये नहीं कहा गया है. कांग्रेस ने समर्थन वाली चिट्ठी भी राज्यपाल को अपनी तरफ से भेजी है. न कि “आप” से विचार विमर्श करके. क्यों? कल तक जिसके राजनैतिक अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग रहे थे वे आज इतने स्वीकार्य कैसे हो गए? वर्तमान परिस्थिति में  सरकार बनाने के लिये न तो “आप” को कांग्रेस का समर्थन हासिल करने की जरुरत थी न ही भाजपा की.

“आप” को सरकार बनाने का न्योता पहले बड़े दल भाजपा के सरकार बनाने से मना करवा देने के बाद दूसरे बड़े दल होने के नाते दिया गया है. जो एक परम्परा है. कोई समर्थन “आप”को देता है अथवा नहीं यह पार्टी विशेष का अंदरूनी विषय है. बहुमत का तिलिस्मी आंकड़ा एक संविधानिक जरूरत भर है.  वर्तमान परिस्थिति में तो समर्थन देना समर्थन देने वालों की शुद्ध विवस्ता है. बहुमत है अथवा नहीं यह उस दिन की बात होती, जिस दिन “आप” को सदन में अपना बहुमत सिद्ध करना होगा. यह तब तक “आप” को विवश नहीं कर सकता जब तक “आप”की खुद की मंशा पद से चिपके रहने की न हो. यदि “आप” पद से चिपके रहना न चाहे तो दुनियां की कोई भी ताकत “आप” को सही फैसले लेने से नहीं रोक सकती है. शपथ लेने के बाद “आप” को सदन में बहुमत सिद्ध करने से पूर्व तक “आप” की सरकार फैसले लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र होगी. रही बात बिलों की तो बिलों को डॉफ्ट करना पूर्णतः सरकार के अधिकार क्षेत्र में है. हाँ, पास करने संशोधन करने का कार्य विधायिका अर्थात राज्य में विधानसभा और केन्द्र में संसद का है. सरकार बिल बनाती है और विधानसभा में रखती है. यदि वह पास हो जाता है तब कानून बनेगा और नहीं पास हुआ तो सरकार गिरेगी. सरकार गिरेगी तो क्या होगा? यदि कोई और सरकार बनवाने की स्थिति में नहीं तो बिल सीधे जनता की सभा में जाएगा. अतः “आप” को सख्त से सख्त बिल डॉफ्ट करवाना चाहिए. उन सभी केसों को खुलवा को भी खुलवाने से पीछे नहीं हटना चहिए, जो पिछली सरकार की कार गुजारियों की गवाह है . “आप” अब उन सभी फईलों को प्रत्यक्ष रूप से देख सकती है, जिस तक हम जैसे लोगो अब तक आधे अधूरे तरीके से ही आर टी आई के माध्यम से ही से पहुंच पाते है. “आप” उन्हें सार्वजनिक भी कर सकते है. “आप”  की सरकार को बिना शर्त समर्थन देने वालों को समर्थन दे अथवा न के विषय पर सोचने पर विवश कर सकते है. “आप” की सरकार बिना शर्त समर्थन देने वालों को विवश कर सकती है कि वे विश्वास मत के दौरान या तो अनुपस्थित रहे अथवा “आप” के खिलाफ वोट दें. इस प्रकार विश्वास मत के दौरान “आप” हार कर भी जीत सकते है. यदि संविधान को बचाने की विवशता से ही सही कांग्रेस समर्थन बनाए रखती है तो “आप”  की सरकार को कांग्रेस की कारगुजारियों को उजागर करने हेतु छह महीने का प्रयाप्त समय मिल जाएगा और जनता को सुशासन का स्वाद भी लग जाएगा.

अब जरा इतिहास से कुछ उदाहरण उठाते है. यदि “आप” को वाजपेयी जी की तरह 14 दिन का समय मिलता है तो उस 14 दिनों में कांग्रेस सरकार की एक एक कारगुजारियों के सबुत “आप” के हाथ में होगे.(14 दिन = 336 घण्टें ).  वी पी सिंह ने मंडल को लागू करने से पूर्व न तो सुरजीत जी न ही आडवाणी जी से विचार विमर्श किया था. वी पी सिंह की अल्पमत सरकार सीपीएम तथा बीजेपी के सहारे चल रही थी. और वी पी सिंह को मालूम था कि उनकी सरकार चंद दिनों की मेहमान है. मंड़ल कमीशन के माध्यम से उन्होनें सीपीएम, भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक ज़मीन को समेट कर रख दिया और देश की राजनीति का समीकरण बदल कर रख दिया.

जनता ने “आप” को समर्थन भ्रष्टाचार के खिलाफ दिया है. अतः जनता चाहती है कि “आप” सख्त से सख्त जनलोकपाल लाए. चाहे उसके बाद सरकार जाती है तो जाय़े. छह महीने के कार्यकाल के आधार पर पांच साल में पूरे किये जाने वाले वादों का मूल्यांकन तो हो नहीं सकता. न ही अल्पमत सरकार से पूर्ण बहुमत वाले कार्य की अपेक्षा की जा सकती है. अतः “आप” की टीम सरकार जरूर बनाए. य़दि लक्ष्य पांच साल तक सत्ता से चिपके रहना नहीं है तो सख्त से सख्त फैसले ले और दफ़तर आने से पहले अपने जेब में अपना त्याग पत्र रखना न भूलें. यदि ऐसी अवस्था में सरकार गिरती है तो संविधान पर बहस वश्य होगी.

जो लोग चुनाव के बोझ का रोना रोते है.  उन्के लिए जबाब यह है कि  दिल्ली में हुए चुनाव का खर्च 100 करोड़ है. यह रकम कम से कम 100000 करोड़ से तो कम ही है, जो महज एक घोटाले की कीमत है. 100 करोड़ के डर से लोग पांच साल तक दुबके रहे और फिर एक दिन (चुनाव के) निकल कर अपने आकाओं को चुन ले कहा तक सही है.

अब जरा चलते चलते “आप” ने जो कांग्रेस और भाजपा को जो पत्र भेजा है उसके बिन्दु 15 और 16 का मुख्य फोक्स निजी विद्यालय और निजी अस्पताल है. पर अफसोस आम आदमी पढ़ने के लिए सरकारी विद्यालयों में जाता है न की निजी. डोनेशन बन्द होने के बाद भी आम आदमी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में नहीं पढ़ा सकता है. इन दो बिन्दुओं को देख कर लगता है कि “आप” का आम आदमी मिडिल क्लास अर्थात मध्यम वर्ग है. शायद इस शहर में आठ-दस हजार पर गुजारा करने वाले आम आदमी में नहीं आते है. दिल्ली की आधी से अधिक आबादी किराये पर रहती है. उनके लिए न तो मेनिफैस्टो मे ही कोई जगह है न ही 18 सूत्रीय शर्तों में. हाँ, झुग्गी झोपड़ी की जमीनों का जिक्र जरूर है, क्योकि उस के आधार पर राजनीति की जा सकती है. पर उन के दर्द को सहलाने तक का प्रयास नहीं किया गया है, जो हर साल अपना सामान उठा कर फिरते रहते हैं. मकान मालिक नाम का एक छोटा सा वर्ग पैदा हो गया है. जिसका काम किरायेदारों का शोषण करना है. क्या आज जो ज़मीन /मकान/ फ्लैटों की क

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.