/चुक गये चन्द्रभान…

चुक गये चन्द्रभान…

-रमेश सर्राफ धमोरा||

झुंझुनू, राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा.चन्द्रभान अपने ही बुने मकडज़ाल में खुद ही उलझ गये. मंडावा से विधानसभा चुनाव क्या हारे अपने राजनीतिक कैरियर को ही दाव पर लगा दिया. डा.चन्द्रभान ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बनाये नियमो को दरकिनार कर मंडावा से चुनाव लड़ा व बुरी तरह हार गये. यहां तक कि जमानत तो बची ही नहीं वरन मात्र 15815 वोट ही प्राप्त किये जबकि मंडावा में जमानत बचाने के लिये करीबन 26 हजार वोटो की जरूरत थी. इस तरह से डा.चन्द्रभान राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले ऐसे अध्यक्ष हो गये जिनकी चुनाव में जमानत तक जब्त हो गयी.pcc_chief_dr_chandrabhan

डा.चन्द्रभान इस मुगालते में मंडावा चुनाव लडऩे चले आये थे कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते वो मंडावा से आसानी से चुनाव जीत जायेगें. इसी लिये उन्होने स्व.शीशराम ओला से हाथ मिलाकर मंडावा की मौजूदा कांग्रेस विधायक रीटा चौधरी का टिकट कटवाकर खुद टिकट ले आये. डा.चन्द्रभान टिकट कटने से नाराज रीटा चौधरी को भी मना कर बगावत करने से नहीं रोक पाये थे. जिस तरह आसानी से डा.चन्द्रभान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने व मुख्यमंत्री के साथ पूरे प्रदेश के हवाई दौरे किये उससे उनकी महत्वकांक्षा बलवती हो गयी की मौजूदा परिस्थितियों में जाट मुख्यमंत्री के रूप में वे सर्वाधिक उपयुक्त जाट नेता होंगें. अपने इस अभियान में उन्होने स्व.शीशराम ओला की भी सहमति हासिल कर ली थी.

इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर उन्होने लगातार दो बार हारे हुये नेताओं को टिकट नहीं देने के राहुल गांधी के फार्मूले को धता बताते हुये चुनाव लडऩे की जिद कर मंडावा से सीटिंग विधायक का टिकट कटवा कर स्वंय टिकट ले लिया था. जाट बहुल मंडावा सीट पर उन्हे लगता था कि जाट मुख्यमंत्री के नाम पर क्षेत्र के जाट मतदाताओं का उन्हे भरपूर समर्थन मिलेगा. इसी सोच के कारण अपने नामांकन के दौरान भी उन्होने राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनने पर जाट मुख्यमंत्री बनने की बात उछाली थी. मगर मंडावा के मतदाताओं ने पहले दिन ही तय कर लिया था कि उन्हे डा.चन्द्रभान किसी भी हालात में मंजूर नहीं हैं.

मंडावा की जनता की नजर में डा.चन्द्रभान राजनीतिक रूप से भगोड़े नेता हैं. 1990 के विधानसभा चुनाव में डा. चन्द्रभान को मंडावा की जनता ने जनता दल की टिकट पर 29454 मतो से जिताया था. जिसकी बदोलत वे उसी समय के भैंरोंसिंह शेखावत के मंत्रीमंडल में केबीनेट मंत्री बन पाये थे मगर 1993 के चुनाव में हार से डरकर उन्होने मंडावा छोडक़र नवलगढ़ से चुनाव लड़ा था. इस बात को मंडावा की जनता भुला नहीं पायी थी. मंडावा से चुनाव लडऩे को डा. चंद्रभान अपनी घर वापसी बता रहे हैं लेकिन उनकी घर वापसी वाली बात क्षेत्र के मतदाताओं के गले नहीं उतर पायी. मंडावा क्षेत्र के लोगों का मानना थ कि जब 1990 में क्षेत्र की जनता ने उन्हे रिकार्ड मतो से जिता कर सरकार में मंत्री भी बनवा दिया था तो फिर उन्हे मंडावा छोडक़र जाने की क्या जरूरत थी? यहीं रह कर संघर्ष करते मगर हार के डर से क्षेत्र छोडक़र चले गये तो अब 23 साल बाद कैसी घर वापसी हुयी है. अब हार के डर से यहां आ गये. उनकी क्या गारंटी है कि जीतने के बाद फिर मंडावा छोड़ कर नहीं चले जायेंगें. अपनी व राजस्थान में पार्टी की करारी हार के बाद डा.चन्द्रभान ने नैतिकता के नाम पर प्रदेशाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है जो स्वीकृत हो जायेगा उसके बाद डा. चन्द्रभान का राजनैतिक भविष्य अंधकारमय ही लगता है.

डा.चन्द्रभान के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्र के लोग उनसे बड़े चाव से मिलने आते थे मगर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आगन्तुक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मिलने के लिये घंटो इन्तजार करवाया जाता था. इस कारण वह कार्यकर्ता दुबारा कभी मिलने की सोचता भी नहीं था. डा.चन्द्रभान के इस तरह के व्यवहार से भी कांग्रेस को खासा नुकसान उठाना पड़ा है. वैसे भी डा.चन्द्रभान का अपना कोई जनाधार नहीं रहा है. पहले वे लोकदल में शरद यादव,मोहनप्रकाश के सहारे राजनीति करते थे. फिर अजीतसिंह से जुड़ गये थे. अजीतसिंह ने ही उन्हे वी.पी.सिंह की अध्यक्षता वाले जनता दल का राष्ट्रीय सचिव बनवाया. 1990 में चौ.देवीलाल के विरोध के कारण झुंझुनू से लोकसभा टिकट जगदीप धनखड़ को मिल गया तो विधानसभा चुनाव में अजीतसिंह ने ही उन्हे मंडावा से टिकट दिलवाया था साथ ही मंत्री भी बनवा दिया था.

1991 में लोकसभा चुनाव में जमानत जब्त होने व 1993 में नवलगढ़ से विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होने अशोक गहलोत से सांठ-गांठ कर अजीत सिंह के लोकदल को छोडक़र कांग्रेस में शामिल हो गये व 1998 के विधानसभा चुनाव मेें टोडारायसिंह से कांग्रेस टिकट पर जीत कर अशोक गहलोत की सरकार में केबीनेट मंत्री बन गये. उसके बाद 2003 व 2008 के विधानसभा में मालपुरा से लगातार हार गये. इसी दौरान अशोक गहलोत के सहयोग से जाट कोटे से कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष बन गये. गहलोत को भी एक ऐसे जाट नेता चाहिये था जो उनकी हां में हां मिला सके ऐसे में उनके लिये डा.चन्द्रभान अधिक उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता था.

डा. चन्द्रभान अपने जीवन के नौ बार चुनाव लड़ चुके हैं मगर उनके खाते में अब तक मात्र दो बार ही जीत नसीब हुयी है. जबकि सात बार उन्हे हार का मुंह देखना पड़ा है. डा.चन्द्रभान ने सर्वप्रथम 1980 में टोंक जिले की मालपुरा विधानसभा सीट से जनता पार्टी सोशलिस्ट के टिकट पर चुनाव लडक़र मात्र 9261 मत हासिल किये. अपने पहले ही चुनाव में उन्हे करारी हार का मुंह देखना पड़ा था. 1985 में उन्होने मंडावा से चुनाव लड़ा व मात्र 313 मत ही हासिल कर पाये. 1990 में भाजपा के साथ जनता दल का गठबंधन हो गया व मंडावा में डा.चन्द्रभान जनता दल की टिकट पर चुनाव लडक़र कांग्रेस की सुधादेवी को 29454 मतो से हराया था. 1990 में भाजपा से गठबंधन होने के कारण भाजपा ने डा.चन्द्रभान को ही समर्थन देकर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था. चुनाव जीतते ही डा.चन्द्रभान को जनता दल में चौ.अजीत सिंह के कोटे से भैंरोसिंह शेखावत की सरकार में सीधे ही केबीनेट मंत्री बना दिया गया था.

1991 में डा.चन्द्रभान ने झुंझुनू संसदीय सीट से जनतादल के टिकट पर लोक सभा चुनाव लड़ा मगर करीबन 40 हजार ही मत हासिल कर जमानत जब्त करवा बैठे थे. मंडावा में भारी मतो से विधानसभा चुनाव जीतने के उपरान्त भी डा.चन्द्रभान ने 1993 में मंडावा में हार होती देखकर मंडावा सीट से पलायन कर नवलगढ़ चले गये व वहां से जनता दल की टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा मगर कांग्रेस के प्रत्याशी भंवरसिंह शेखावत से 3768 मतो से हार गये. लगातार हार से डा. चन्द्रभान समझ गये कि अब लोकदल-जनतादल की राजनीति चलने वाली नहीं हैं, क्योंकि उनके पास स्वंय का कोई जनाधार नहीं है सो उन्होने अशोक गहलोत के माध्यम से 1995 में कांग्रेस में शामिल हो गये.

1998 के विधानसभा चुनाव में उन्होने अपने गृह जिले झुंझुनू को छोड़ कर पुन: टोंक जिले की टोडारायसिंह विधानसभा सीट से कांग्रेस टिकट हासिल कर लिया व भाजपा प्रत्यासी नाथूसिंह गुर्जर को 4460 मतो से हरा दिया. उस समय राज्य में अशोक गहलोत के नेतृत्व में बनी सरकार में पुन: केबीनेट मंत्री बनाये गये. वे 1998 से 2003 तक लगातार मंत्री रहे. 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्होने पुन: टोडारायसिंह सीट से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा मगर भाजपा के नाथूसिंह गुर्जर से 6364 मतो से पराजित हो गये. 2008 के विधानसभा चुनाव में उन्होने टोंक जिले के मालपुरा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्यासी के रूप में चुनाव लड़ा मगर लगातार दूसरी बार निर्दलिय रणवीर पहलवान से 3813 मतो से हार गये थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.