/संविदा प्रथा में सिर्फ अधिकारों का हनन, महिलाएं भी सुरक्षित नहीं…

संविदा प्रथा में सिर्फ अधिकारों का हनन, महिलाएं भी सुरक्षित नहीं…

-रोहित कुमार||

पिछले कुछ सालों में देखने में आ रहा है कि जैसे-जैसे सरकारी कर्मचारी रिटायर्ड होते जा रहे हैं. वहीं उनकी जगह संविदा आधार (ठेकेदारी प्रथा) पर ढेरों कर्मचारी रखे जा रहे हैं और सरकारी कार्यालय ठेकेदारों का अड्डा बनते जा रहे हैं. जहां सरकारी क्षेत्रों में काम करना गर्व की बात समझते थे. वहीं अब यह जगह शोषण का अड्डा बन कर रह गए हैं. मगर अधिकारी इन पर लगाम लगाना तो दूर इससे अपनी जेब भरने की सोचते हैं. देश के अंदर सभी क्षेत्रों में रिसर्च होते रहते हैं एक दो बार श्रम अधिकारों के हनन के ऊपर हुए शोध भी पढ़े हैं. जिनसे एक बात तो साफ हो जाती है कि सभी अधिकारी जानते हैं कि संविदा कर्मचारियों के साथ क्या सुलूक किया जा रहा है. sanvida karmchari
इन संविदा के अंतर्गत कार्य करने वाले ज्यादातर कर्मचारी बहुत गरीब होते हैं जो कम से कम वेतन पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं. इसी मजबूरी का फायदा उठाकर ठेकेदार उनके अधिकारों का हनन करते रहते हैं. और ये मजबूर कर्मचारी नौकरी जाने के डर से कुछ भी नहीं बोल पाते हैं जिसके चलते ठेकेदारों और अधिकारियों की पौ बारह हो जाती है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. वहीं श्रम मंत्रालय इन कर्मचारियों के बारे में सोचने की बजाए न जाने किन अधिकारों की ओर ध्यान देता हुआ नजर आता है. जहां सरकार द्वारा हर इलाके का एक श्रम अधिकारी नियुक्त किया गया ताकि वह अपने इलाके के श्रमिकों के अधिकारों का ध्यान रखें, ऐसे में ये अधिकारी भी न जाने क्यों इन कर्मचारियों की शिकायतों पर ध्यान नहीं देते हैं. जबकी अब ऐसे कर्मचारियों की संख्या कम है जो अपने अधिकारों के शोषण के खिलाफ शिकायत करते नजर आते हैं. इसका एक कारण कहीं न कहीं व्यवस्था के खिलाफ अविश्वास भी है.
इन क्षेत्रों में महिला कर्मचारी के साथ भी बहुत ही बुरा व्यवहार किया जाता है. महिला कर्मचारियों के साथ छेड़छाड़ की शिकायतें तो अक्सर अखबारों और चैनलों के जरिए मिल ही जाती हैं. जबकि कानून महिला उत्पीड़न मामलों में जरा भी लापरवाही नहीं बरतने की बात करता है. फिर भी संविदा प्रथा में सबसे अधिक दुष्कर्म का शिकार सिर्फ महिलाओं को ही होना पड़ता है. क्योंकि कई बार अधिकारी इनकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए नजर आते हैं और इनके विरोध करने पर नौकरी से निकालने की धमकी भी देते हैं. इनमें कई मामले तो ऐसे हैं जो कभी सामने ही नहीं आ पाते हैं. महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष ममता शर्मा ने कहा कि ठेकेदारी प्रथा से देश में महिला यौन शोषण के मामले बढ़े हैं. यह स्थिति कई राज्यों में है. चुप्पी तोड़कर महिलाओं को अधिकारों के लिए आगे आना होगा. अधिकतर लोग अपने आस-पास के माहौल में ये सारी घटनाएं घटित होते देखते भी हैं.
वहीं देश की राजधानी दिल्ली में कई जगह ऐसी हैं जहां लोगों को बिना किसी अवकाश के काम कराया जाता है. दिल्ली के दिलशाद गार्डन में जीटीबी अस्पताल में काम करने वाले कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उसे उसका वेतन तीन हजार रुपय प्रति महीना है. वहीं दिल्ली की शान कही जाने वाली दिल्ली मेट्रो में हाउस कीपिंग में काम करने वाले कर्मचारी ने बताया कि उसे महीने के 4500 रुपए दिए जाते हैं वो भी बिना किसी अवकाश के. तो अब ये अधिकारों का शोषण नहीं तो क्या है. लोगों में जागरुकता फैलाने से पहले सरकार को अपनी व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए. क्षेत्रीय श्रम अधिकारी सिर्फ किसी की शिकायत करने का ही इंतजार न करें बल्कि अपनी तरफ से भी जांच करते रहें, अगर लोगों में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा तो उनकी एक सोच बदलेगी और वो अपनी शिकायत लेकर आगे आएंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.