/महाराष्ट्र में पत्रकारों पर हमले बढे.. सरकार दे रही है हमलावरों का साथ…

महाराष्ट्र में पत्रकारों पर हमले बढे.. सरकार दे रही है हमलावरों का साथ…

महाराष्ट्र में 2013 में दो पत्रकार की हत्या.. एक महिला पत्रकार से बलात्कार..चार मीडिया हाऊसेज पर हमले.. चार पत्रकारों ने की खुदकुशी.. 71 पत्रकारों पर हमले…

महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती की तरफ से किए गये एक सर्वे के अनुसार महाराष्ट्र में पत्रकारिता बहुत ही जोखिम भरी हो गयी है. इसके बारे में बहुत सारे तथ्य इस सर्वे के ज़रिये सामने आये है. इस सर्वे  के कुछ अंश समिती के नियंत्रक एस.एम. देशमुख ने कल मीडिया के सामने रखे हैं.attack on journalists

महाराष्ट्र में 2013 यह साल मीडिया के लिए काफी त्रासदीभरा रहा.एक साल में राज्य में दो पत्रकारों की निर्मम हत्या की गई. इसमें से एक हत्या के आरोपी अभी तक गिरफ्तार नही किये जा सके. साल में चार मीडिया ऑफिस पर हमले किए गये. जिसमें ऑफीसेज का काफी नुकसान हुआ. एक महिला पत्रकार का सामूहिक बलात्कार किया गया. राज्य की राजधानी मुंबई में यह घिनौनी वारदात घटी. 71 पत्रकारों के उपर हमले बोल दिये गये. कुछ मामलों में चाकू, तलवार सरीखे तीक्ष्ण हथियारों का उपयोग किया गया. पुणे के एक पत्रकार के पूरे परिवार पर ऍसिड फेका गया. इस घटना में पत्रकार, उनकी पत्नी और बच्ची बुरी तरह से जल गयेयी. विविध कारणों से राज्य में साल में चार पत्रकार- फोटोगाफर्स ने खुदकुशी की, कई सारे पत्रकारों को झूठे मामलों में गिरफ्तार कर लिया गया. यह सारी घटनायें सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही नहीं बल्कि मुंबई सरीखे शहरो में भी हो गयी. पिछले साल जहा 64 पत्रकारों के उपर हमले हुए थे. इस साल इसमें बढोतरी हो गयी है. दुर्भाग्य की बात यह है कि, पत्रकारों पर जो हमले हुए हैं, उसमें से 78 प्रतिशत प्रकरणों में आरोपी किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी के तालूक रखते है.15 प्रतिशत घटनओं में हमलावर गुंडे थे या उनके पीछे किसी माफिया का हाथ था. यह तथ्य सामने आया है.

कुछ हमले पुलिस की ओर से किए गये. हमलावरों में राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं की तादाद काफी ज्यादा होने के चलते सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने में अनदेखी कर रही है. पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती पिछले पांच साल से पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की खातिर आंदोलन कर रही है. इस मांग के लिए समिती की ओर से 13 बार मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से मुलाकात की गयी, दो बार राष्ट्रपति जी से मुलाकात की गयी, दो बार प्रेस कौन्सिल के चेयरमेन को पत्रकार मिले. राज्य के गृहमंत्री, विरोधी दल के सभी नेताओं से भी समिती ने कई बार मुलाकात की लेकिन समिती की सारी कोशिशें ना कामयाब रही है. इस सब के बावजूद जब तक कानून नही हो ता तब तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान समिती के नियंत्रक एस.एम. देशमुख ने किया है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.