/28 दिसंबर को रामलीला मैदान में होगा शपथग्रहण समारोह, तैयारियां जोरों पर…

28 दिसंबर को रामलीला मैदान में होगा शपथग्रहण समारोह, तैयारियां जोरों पर…

-हरेश कुमार||
दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन में हो रही देरी पर से अब धुंध का बादल छंटने लगे हैं. राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद अगले 28 दिसंबर को रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण समारोह संपन्न कराने की तैयारियां शुरू हो गई हैं. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप की सरकार का गठन होगा इसमके लिए छह मंत्रियों का नाम तय कर लिया गया है. जिसके कारण पार्टी में बिनोद कुमार बिन्नी जैसे नेताओं ने अपना विरोध जताते हुए बैठक का बहिष्कार भी किया था, लेकिन उन्हें पार्टी ने मना लिया. शायद उन्हें संसदीय सचिव का लोभ दिया गया है, लेकिन इतने से बात बनने वाली नहीं है.arvind
बिन्नी का कहना है कि निगम पार्षद रहने और एके वालिया जैसे वरिष्ठ कद के कांग्रेस नेता को हराने के बाद मंत्री पद पर उनका हक औरों से ज्यादा बनता है. लेकिन हाल में आप के प्रदर्शन को देखते हुए कोई भी पार्टी या नेता अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए इस तरह का कोई निर्णय नहीं लेना चाहता है जिससे कि आगे चलकर उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़े.
जैसा कि सबको पता है दिल्ली में विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला और एक नई पार्टी के उदय ने सबको हैरान व अंदर से झकझोर कर रख दिया. किसी को इसका अंदाजा नहीं था कि महज एक साल के अंदर में ही आम आदमी पार्टी (आप) एक बड़े दल के तौर पर ना सिर्फ उभरेगी बल्कि पहले से स्थापित पार्टियों – कांग्रेस और भाजपा को इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा, कांग्रेस की तो लुटिया ही डूब गई. कहां तो वह 15 सालों से दिल्ली पर राज कर रही थी तो कहां 15 सालों तक पार्टी की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित तक को चुनाव हारना पड़ा. उन्हें आप के संस्थापक, अऱविंद केजरीवाल ने नईदिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त दी. इसके अलावा, कई वरिष्ठ मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा और 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के मात्र 8 प्रत्याशी ही चुनाव जीतकर आ सके. वहीं आप को 28 सीटों पर जीत मिली तो भाजपा को 32 और एक सीट जेडीयू को तो एक सीट निर्दलीय को मिला.

इस कारण से सरकार गठन में मुश्किलें आ रही थीं. आज से पहले की स्थिति होती तो भारतीय जनता पार्टी कब की सरकार बना चुकी होती जैसा कि कर्नाटक, यूपी और झारखंड में वह पहले कर चुकी है. उत्तर प्रदेश में मिली-जुली सरकार और सबसे बड़े मंत्रिमंडल के गठन और अपराधियों को पार्टी में शामिल करने के कारण ही पार्टी यूपी के परिदृश्य से बाहर हो गई. अपने द्वारा उठाये गए कदम को पार्टी वक्त की जरूरत बताती रही है तो फिर वो दूसरों पर उंगली कैसे उठा सकती है.

दिल्ली में सरकार बनाने के लिए तो भारतीय जनता पार्टी को मात्र 4 विधायकों की जरूरत थी औऱ वो कांग्रेस को आसानी से तोड़ सकती थी, क्योंकि उसके तो मात्र 8 विधायक ही जीते थे और आज के समय में राजनीति में कब किसके साथ गठबंधन कर ले कहा नहीं जा सकता है. यह तो आप पार्टी के उदय ने सारा खेल बिगाड़ कर रख दिया.
इधर कांग्रेस के कार्यकर्ता इस बात से नाराज है कि आप की सरकार का गठन उनके समर्थन से ही होगा और वो उसके खिलाफ जांच की धमकी दे रहा है. अगर आपने भ्रष्टाचार किया ही नहीं तो फिर डर कैसा! कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के नेता भाड़े के कार्यकर्ताओं के द्वारा आप पर दबाव की राजनीति कर रहे हों. वैसे भी इस सरकार के ज्यादा दिन चलने की उम्मीद किसी को नहीं है. अगले साल मार्च-अप्रैल में लोकसभा का चुनाव होने वाला है और ऐसे में फरवरी महीने तक आचार संहिता लागू हो जायेगी तो सरकार के पास ज्यादा वक्त नहीं है. अरविंद केजरीवाल ने चुनाव से पहले ही पानी और बिजली को लेकर काफी कार्य किया है और जैसा कि खबर आ रही है वे ईमानदार लोगों को अपनी घोषणाओं को लागू करने की जिम्मेदारी देंगे. अभी मिल रही सूचनाओं के मुताबिक, राजेंद्र कुमार को मुख्य सचिव की जिम्मेदारी दी जा सकती है. ये वही राजेंद्र कुमार हैं जिन्होंने तीन साल पहले बिजली कंपनियों के ऑडिट करने का आदेश दिया था औऱ फिर शीला सरकार ने उनका आदेश मानने की बजाये उनका ही तबादला कर दिया था.

प्रति परिवार को 700 लीटर पानी मुफ्त देने के लिए भी उन्होंने पहले से एक गैर सरकारी संस्था से इसका आंकलन कराया है. नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर पानी का वितरण किया जायेगा.
जनलोकपाल बिल को पारित करने के लिए केंद्र सरकार की सहायता चाहिए. तो बिजली के लिए भी केंद्र की सहायता चाहिए. क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है और दिल्ली ऐसा राज्य है जो बिजली का उत्पादन नहीं करता है बल्कि वह दूसरे राज्यों से खरीदता है. हालांकि, हरियाणा और दिल्ली सरकार का संयुक्त बिजली उपक्रम है लेकिन इससे बिजली उत्पादन महंगा पड़ता है.

हालांकि देखना है कि कितनी तेजी से सरकार अपने घोषणाओं को पूरा करने के लिए कदम उठाती है क्योंकि उस पर विश्व की निगाहें लगी हुई है. इससे पहले किसी पार्टी ने देश में इतनी हलचल नहीं फैलाई थी जितना आप ने दिल्ली में चुनाव जीतकर फैला दिया है.

और अंत में

राजनीति में कहावत है कि कौन कब किसके साथ चला जाये इस बात की पक्की गारंटी नहीं ली जा सकती है. बिहार में बन रहे नए समीकरणों से जो संकेत मिल रहे हैं उसके मुताबिक रामविलास पासवान और नीतीश कुमार आगामी चुनावों में एक गठबंधन के तहत साथ आ सकते हैं. चारा घोटाला में जेल से बाहर आते ही जिस तरह से लालू यादव का कांग्रेस अध्यक्ष, सोनिया गांधी ने गर्मजोशी से हालचाल पूछा और इससे पहले सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कमजोर दलीलें रखीं उससे राजनीति के जानकारों को पहले से अंदाजा लग गया कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को रोकने के लिए बिहार में नीतीश के मुकाबले में लालू आज भी कांग्रेस की पहली पसंद हैं, जबकि कुछ महीने पहले स्थिति ठीक इसके विपरीत थी.

जैसा कि भाजपा-जेडीयू गठबंधन टूटने के बाद केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जेडीयू की सरकार के लिए केंद्रीय खजाना को खोल दिया और कई तरह की आर्थिक सहायता मंजूर की तथा विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए मापदंडों में बदलाव किया वह एक अलग खिचड़ी पकने का संकेत दे रही थी, लेकिन जब लगा कि नीतीश से समझौता करके वो घाटे में रहेगी तो गिरगिट की तरह तुरंत अपना रुख बदल दिया. जैसा कि सबको पता है कि लालू यादव के पास आज भी लगभग 18 प्रतिशत वोट बैंक है औऱ जेडीयू-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद से अगर निष्पक्ष आंकलन करें तो भाजपा को लाभ हो रहा है तो जेडीयू को हानि रही है. अपनी विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्ट पर कांग्रेस लालू की तरफ हाथ बढ़ा रही है. अब यह तो यह वक्त बतायेगा. गठबंधन टूटने का ज्यादा दोष नीतीश कुमार की अपनी महात्वाकांक्षा रही है. अधिक से अधिक धर्मनिरपेक्ष वोटों के चक्कर में कहीं ऐसा ना हो कि अपनी स्थिति पहले वाली समता पार्टी की तरह कर लें. क्योंकि राजनीति में 2 से 3 प्रतिशत का वोट बैंक बहुत बड़ा बदलाव कर देता है. राम विलास पासवान के पास लगभग 8 प्रतिशत वोट है. तो जेडीयू-भाजपा गठबंधन के पास लगभग 22 प्रतिशत वोट था. अब नए समीकरणों में राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठता है यह तो वक्त ही बतायेगा. तब तक गंगा-यमुना में कितना पानी बह जायेगा …

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.