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डायन कुप्रथा से जूझ रही हैं झारखण्ड की अबलायें..

By   /  December 26, 2013  /  2 Comments

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इक्कीसवीं सदी के भारत में आज जहाँ देशवासी दिन प्रतिदिन नित्य नए आयाम छू रहे है वही झारखण्ड आज भी विभिन्न प्रकार की कुरीतियों से जूझ रहा है. झारखण्ड को बने लगभग १३ साल हो गए है लेकिन आज भी डायन कुप्रथा के नाम पर औरतो खास कर विधवाओ को प्रताड़ित किया जा रहा है. गौरतलब है कि १५ नवम्बर २००० को झारखण्ड राज्य के गठन के साथ ही राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू कर दिया गया था. इस अधिनियम के अंतर्गत डायन का आरोप लगाने वाले पर अधिकतम तीन महीने कैद या फिर एक हज़ार रुपये के जुर्माना का प्रावधान है और किसी महिला को डायन बता कर प्रताड़ित करने पर छह महीने की कैद, दो हज़ार का जुर्माना या फिर दोनों की सज़ा का प्रावधान है.
झारखण्ड प्रदेश की सरकार के अनुसार ये कुरीति पूरी तरह ख़त्म हो गई है लेकिन आये दिन समाचार पत्रों में घटनाये आती रहती है.dayan
झारखण्ड में पिछले १२ महीने में करीब १२९ महिलाओ की हत्या डायन बता कर कर दी गई जाहिर है ऐसी घटनाओ में पंचायत से ले कर गाँव वाले की मिली भगत रहती है, पुलिस इन मामले में प्राथमिक दर्ज तो करती है लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ पाती है. डायन बता कर महिलाओ को सावर्जनिक तौर पर मैला पिलाया जाता है, उसके बाल काट दिए जाते है, उन्हें निवस्त्र करके पुरे इलाके में घुमाया जाता है. आकड़ो के मुताबिक झारखण्ड गठन होने के बाद से २०१२ तक लगभग १२०० महिलाओ को डायन बता कर मार दिया गया.
कुछ महीनों पहले की एक घटना है जिसमे कोल्हान क्षेत्र में डायन बता कर तकरीबन १० महिलायों की जीभ काट दी गई थी. मई में लोहरदगा में ७० वर्षीय वृद्ध को डायन बता कर जला दिया गया था. हद्द तो तब हो जाती है जब परिवार के लोग भी डायन के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने लगते है ऐसे ही मामले में एक बेटे ने अपनी माँ की कुल्हाड़ी से मार कर हत्या कर दी थी. पुलिस के अनुसार वो अपनी माँ पर डायन होने का संदेह करता था इसलिए अपनी पत्नी के साथ अपने ससुराल में रहता था. बेटे को शक था की उसकी माँ ने टोना टोटका कर के उसके दो छोटे बच्चे की जान ले ली थी. बहुत मामले तो प्रकाश में आते ही नहीं है जो की सुदूर आदिवासी बहुल क्षेत्र में होते है. dayan630_2807
आखिर ये सब क्या हो रहा है? इसे रोकने की जबाबदेही किसकी है? देश को आजाद हुए ६६ साल हो गए. जहाँ लोग हर दूसरे दिन नए अविष्कार कर रहे हैं. विज्ञान की नई ऊँचाइयों को छू रहे है, और कुछ लोग हैं कि पाषाण युग की तरफ जा रहे है आदिम युग की तरह सोचने लगे है, अपनी नासमझी से मुर्खता की सारी हदे पार कर रहे है, इन्हें समझाने की जवाबदेही किसकी है? क्या इसी को झारखण्ड का विकास कह रहे है ? यही भारत का निर्माण हो रहा है? जब पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम चल रहा था तो जोर शोर से एक नारा दिया गया था ‘एक भी बच्चा छूटा, सुरक्षा चक्र टूटा क्या इसी तरह का नारा डायन कुप्रथा उन्मूलन में क्यों नहीं लागु किया जा सकता है.
आज के युग में जहाँ हम ऐसे तत्व को नकारते है, वही दूसरी तरफ इन्ही को स्वीकारते भी हैं. जिससे समाज में इस तरह की घटनाये देखने को मिलती है. ऐसी घटनाये वही देखने को मिलती हैं, जहाँ के लोग गरीब है, अशिक्षित है. सरकार ऐसी जगह पर विकास के दीप क्यों नहीं जला पाई. आज जरुरत है ऐसे ग्रामीण आदिवाशी इलाके में जा कर उन्हें जागरूक करने की, शिक्षित करने की.

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. ये झार खंण्ड की किसी प्रदेश की सीमा में इस समस्या को देखना हमारी गलती होंगी जैसे खाना सोना सामाजिक व्यवहार इन्द्रियों की आवशकता की पूर्ती हो न नाहोना शरिरीर में भारी हलचल उथल पुथल पेड करता है ये सम्मानीय सभी हर व्यक्ति पर लागू होता है झार खंण्ड की सामाजिक व्यवस्था कठोर मर्यादा उन का पालन करना कराना दो नो ही आशन नहीं है मिला का विधवा होना समाज की उपेक्छा का कारण बनती है उस की शारिरीक अवास्कता की पूर्ती ना होना हिप्थिरीया पेट की आग समाज की प्रतारणा गिरबी समाज से अलग नहीं चल पाने की मजबूरी ये कारण मानसिक अस्न्तुअल एसी घटनायो को जन्म दे सकता है ये इस लिए कहा जा सकता है की इसी कई घटनाएं इक जैसी क्यों हो रही है समाज के कुछ लोग इस से धिक् ना तो समझान चाहते है न सम्न्झे की वंहा पर लोग वासकता जाना चाहते है किसी बड़े सामजिक समूह को संन्ग्थान को समाज सेवी को एसी महिलायों को व्यवस्थित करने की पहल करनी चाहिए या एसी माहि लायो को तुर्रनत झार खंण्ड से बहार ले जा कर पुरार्वास कर देना चाहिए किसी अछे कुटीर उद्दोग में किसी महिला काम क़ाज़ी छेत्र में रख कर उन की देखा रेख की जानी चाहिए इस समस्या का समाधान तुर्रनत हो जाएगा

  2. joa bhia kam kkrna chahiya obhia krta hia to uskya phalya manawata ka andar krna chahiya nhia toa uskya hal mya chhoad dana cahiya dada giria nhia krnachahiya jya hiand bharat

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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