/जब साइबेरिया में ठंड से कोई नहीं मरता फिर मुज्जफरनगर में कैसे मर सकता है…

जब साइबेरिया में ठंड से कोई नहीं मरता फिर मुज्जफरनगर में कैसे मर सकता है…

उत्तर प्रदेश सरकार के नेता और और अफसर संवेदनशीलता की सारी हदें पाय कर चुके हैं जिसके चलते एक तरफ मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में बच्चे और बूढ़े ठंड से मर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के नेता और आला अधिकारी अपने ऊटपटांग बयानों से उनके जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं.mujjafarnagar

राज्य के प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता के मुताबिक ‌राहत शिविरों में अधिकतर बच्चों की मौत बाहर के इलाज के बाद हुई है. उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है कि बच्चों की मौत ठंड से, इलाज के अभाव से या किसी तरह की महामारी से हुई.

समिति की रिपोर्ट के अनुसार इनमें से चार बच्चों की ही निमोनिया से मौत हुई और बाकी की अन्य कारणों से. 34 बच्चों की मौत 7 सितंबर से 20 दिसंबर के दौरान हुई, जिनमें 12 की मौत शिविरों में हुई है.

जब प्रमुख सचिव गृह अनिल कुमार गुप्ता से पूछा कि ज्यादातर बच्चों की ठंड से मौत होने की बात सामने आ रही है, इस पर उन्होंने उल्टा सवाल किया कि ठंड तो साइबेरिया में पड़ती है, तो क्या वहां लोग ठंड से मर जाते हैं?

प्रमुख सचिव गृह की इस टिप्पणी पर खासी चर्चा हुई. पूर्व में भी कई अधिकारियों द्वारा कई बार ऐसी ही टिप्पणियां की जा चुकी हैं.

प्रमुख सचिव के मुताबिक चार सौ से अधिक परिवार ऐसे हैं जो भय की वजह से शिविरों में आ गए हैं जहां हिंसा या आगजनी हुई ही नहीं. जैसे बागपत और मेरठ. उन्होंने कहा कि शिविरों में रहने वालों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है.

एक वह जिनके यहां कोई घटना नहीं हुई है लेकिन आसपास की घटनाओं से भयभीत होकर यहां आए. दूसरे वह जिनके गांव में छिटपुट घटना हुई और जान बचाने के लिए शिविरों में आए और तीसरे वह जिनके यहां आगजनी व हिंसा हुई और बेघर होकर शिविर में पहुंचे.

गुप्ता ने कहा कि मलकपुर शिविर में नवजात आदिल पुत्र अनवर की शिविर से कैराना ले जाते समय मौत हुई. सोनू पुत्र शहजाद का आठ दिनों से कैराना के एक नर्सिंग होम में इलाज चल रहा था, जिसके बाद उसकी मौत हुई.

मलकपुर शिविर में दस बच्चों की मौत की बात सामने आई थी. इसमें चार वर्षीया खुशनुमा पुत्री शौकीन की तीन दिसंबर को शिविर में मौत हुई.

उसकी मौत से पहले उसका कैराना के एक निजी नर्सिंग होम में इलाज कराने बाद शिविर में लाया गया था. एक प्री-मैच्योर बेबी नगमा की शिविर में उल्टी-दस्त की वजह से मौत हुई, जबकि 12 वर्षीय फरमान पुत्र नवाज की पानीपत में डॉक्टर शब्बीर से इलाज कराने के बाद मौत हुई.

ऐसे ही समन पुत्र दिलशाद का स्वास्थ्य खराब होने पर उसके अभिभावक इलाज के लिए कैराना ले गए थे, जहां से 15 दिन बाद शिविर वापस लौट आए थे, जबकि उसकी मौत हुई.

प्रमुख सचिव ने कहा कि 12 वर्षीय आशिक पुत्र इस्लाम, पांच वर्षीय अनस पुत्र यूनुस, शहनवाज, हारून आदि की भी ऐसे ही बाहर इलाज कराने के बाद मौत होने की बात सामने आई है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.