Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

क्यों नहीं रिलायंस के खातों की ऑडिट कैग के द्वारा कराई जाये…

By   /  December 27, 2013  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-हरेश कुमार||

आए दिन गैस के दामों में बढ़ोतरी को देखते हुए सभी हैरान हैं और सरकार है कि कान में तेल डालकर बैठी हुई है. विपक्षी दल जो हर बात पर सरकार को हर समय घेरते रहते हैं, वे गैस के मूल्य में बढ़ोतरी को लेकर हमेशा अनकही चुप्पी साध लेते हैं. क्या यह उन्हें मिलने वाले मोटे चंदे के कारण तो नहीं है. या उन्हें अपना मुंह बंद रखने के लिए मोटा चंदा, चुनावों के नाम पर दिया ही इसलिए जाता है, ताकि ये सब कॉरपोरेट व नौकरशाहों व नेताओं के रिश्तों पर ज्यादा चूं चपड़ नहीं करे.reliance

क्या आम आदमी पार्टी को विदेशों से मिलने वाली राशि यानी चंदा की जांच कराने का आदेश देने वाली केंद्रीय एजेंसियां और कांग्रेस पार्टी क्या कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य दलों को मिलने वाले चंदे सहित रिलायंस के द्वारा किए गए करार से मुकरने को भी जांच कराने को तैयार है? जब किसी ने इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो मंत्रिमंडल फेरबदल के नाम पर या जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को उचित ठहराने की कोशिश की जाती है.

आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन से निकाली जा रही गैस के मूल्य में बढ़ोतरी के निर्णय के खिलाफ लगातार विरोध होते रहने के बावजूद सरकार है कि अपने कदम पीछे उठाने को तैयार नहीं है. हाल के चार राज्यों में हार से भी उसने कोई सबक नहीं लिया है. गैस के मूल्य में बढ़ोतरी से किसानों के लिए उर्वरक के मूल्य में भी बढ़ोतरी हो जाती है. विपक्षी दल एक-दो बयान देकर चुप हो जाते हैं. उनके लिए तो बस धर्मनिरपेक्षता और गैर-धर्मनिरपेक्षता बड़ा मुद्दा है, जो वास्तव में मुद्दा है ही नहीं. यहां पर राजनीतिक दलों का व्यवहार और आचरण उनके वचन के ठीक विपरीत होता है. हाथी (यहां नेता-कॉरपोरेट व नौकरशाह गठजोड़) के दांत दिखाने के और खाने के और अक्सर देखने को मिलते रहे हैं. अब तो हिन्दुस्तान का बच्चा-बच्चा भी इस बात को अच्छी तरह से जानता व पहचानता है.

अभी केंद्र में सत्ता पर काबिज कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार के पास एक ही मुद्दा रह गया है. 2002 में गुजरात के दंगों को हवा देते रहना या नरेंद्र मोदी को किस तरह से लोकसभा चुनाव में घेरा जा सकता है या लालू के साथ किस तरह का गठबंधन किया जा सकता है, जिससे कि केंद्र में परिवार विशेष का निष्कटंक शासन चलता रहे. जनता को भ्रष्टाचार रहित, महंगाई से मुक्त शासन चाहिए वो आप दें या कोई और दल इससे क्या फर्क पड़ता है. लेकिन आप तो कुछ सीखने से रहे. इससे तो साफ जाहिर होता है कि रस्सी जल गई पर ऐंठन ना गई.kgbasin

अगर आप इसके अतीत पर नजर डालें तो पता चलेगा कि किस तरह से देश की प्राकृतिक संपदा को खुले आम सत्ताधारियों और विपक्षियों की मिलीभगत से रिलायंस द्वारा लूटा जा रहा है. देश के इन बहमूल्य संसाधनों को निजी हाथों में देने के बजाय सरकार को इसके विकास की परियोजनायें व जरूरत हो तो तकनीक विकसित करनी चाहिए इसके लिए विभिन्न देशों से सहयोग लिया जाना चाहिए था, लेकिन सरकार की मंशा तो इस क्षेत्र का विकास करने की थी ही नहीं उसे तो निजी हाथों में देकर लूट में हिस्सेदारी चाहिए थी, जिसमें विपक्षी दल का पूरा सहयोग मिलता रहा है.

केजी बेसिन पर यह बात पूरी तरह से लागू होती है. देश में ओएनजीसी, गेल और ओआईएल जैसी तीन बड़ी सरकारी गैस कंपनियों को इसका विकास करने के लिए आगे करने के बजाय सरकार ने इस लूट के लिए एक नई नीति की घोषणा की जिसे न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी यानी संक्षेप में नेल्प कहा जाता है और इसी को आधार बनाकर हमारे देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों को खोजने और डवलप करने का अधिकार निजी कंपनियों को दिया गया. सबसे आश्चर्यजनक तो बात यह है कि देश की तीनों गैस कंपनियां जो विदेशों में प्राकृतिक गैस और पेट्रॉलियम की खोज में लगी है, उसे ना देने के लिए बहाना बनाया गया कि सरकार के पास पैसा नहीं है और एक ऐसी कंपनी को गैस की खोज का काम दिया गया जिसके पास इसके लिए ना तो तकनीक थी और ना ही कोई विशेष अनुभव. सरकारी स्तर पर इसे ठेका देने के लिए फाइलों और नीतियों में एक जबरदस्त खेल खेला गया था.

सरकार के पास अपने ही प्राकृतिक संसाधनों की खोज औऱ विकास करने के लिए पैसे नहीं है जबकि उसे पता था कि वहां पर गैस का अथाह भंडार मौजूद है. सरकार के पास पैसे हैं तो अन्य देशों की मूलभूत सुविधाओं को विकसित करने व मंत्रियों और नौकरशाही के द्वारा ऐसी योजनायें विकसित करने के लिए जिसमें अच्छा कमीशन मिल सके. भले ही देश को उससे कुछ मिले या ना मिले. क्योंकि देश का हित इनकी प्राथमिकता सूची में है ही नहीं.

जैसा कि सबको पता है कि नई नीति, नेल्प के अनुसार, वर्ष 1999 में केजी बेसिन जहां भारत का सबसे बड़ा गैस भंडार है, में गैस खोजने और उसे विकसित करने का अधिकार रिलायंस इंडस्ट्रीज को दिया गया था. 2005 तक वहां गैस के अठारह से ज्यादा क्षेत्र मिले और रिलायंस के लिए तो यह वैसा ही हुआ कि दसों ऊंगलियां घी और सर कड़ाही में.

किस तरह से सरकार अपनी नीतियों से खेलती है इसका उदाहरण नेल्प नीति से समझा जा सकता है. जैसा कि शुरुआत में कहा गया था कि सरकार अपनी प्राकृतिक संसाधनों पर किसी एक कंपनी का एकाधिकार नहीं होने देगी और इसके लिए सरकार अलग-अलग गैस क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियों को क्षेत्र की खोज और विकास का अधिकार देगी. वक्त के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और इस तरह से केजी बेसिन इलाके में रिलायंस ने एक तरह से अपना एकाधिकार कर लिया.

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि केजी बेसिन में गैस के अथाह भंडार होने की बात पुख्ता हो चुकी थी, लेकिन सरकार ने नेल्प की नीतियों पर अमल करने के बजाय रिलायंस के एकाधिकार पर एक तरह से चुप्पी साध ली. अगर नेल्प की नीतियों पर अमल किया जाता तो देश की बहुमूल्य संपदा की लूट इस तरह से ना होती और ना ही रिलायंस जब चाहती तो वह गैस की मनमानी कीमतें बढ़ाती. आज के समय में गैस का उपयोग बिजली, उर्वरक उत्पादन से लेकर सीएनजी वाली गाड़ियों में किया जाता है और अगर इसका मूल्य बढ़ता है तो परोक्ष तौर पर हर चीज का मूल्य बढ़ जाता है. महानगरों में सीएनजी चालित गाड़ियों और पीएनजी से बनने वाले खाने और कुकिंग गैस का सीधा संबंध तो है ही.

रिलायंस कृष्णा-गोदावरी घाटी के जिन प्राकृतिक गैस क्षेत्रों पर कब्जा किए बैठा है अगर नेल्प की सही नीतियां इस्तेमाल की जाती तो उसे मात्र पांच प्रतिशत हिस्से पर अधिकार मिलता. अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार, जहां कहीं किसी का एकाधिकार होता है, वहां रिलायंस की हाल वाली प्रवृतियां देखने को मिलती है. कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धात्मक बोलियां लगाई जाती तो ना तो इतनी महंगी गैस मिलती और ना ही आए दिन इस तरह के नाटक देखने को मिलते.

किस तरह से रिलायंस ने एक-एक करके अपनी चालों को अंजाम दिया उसका जिक्र करना यहां पर जरूरी हो जाता है. सबसे पहले तो उसने केजी बेसिन पर एकाधिकार जमाया और फिर बिजली का उत्पादन करने वाली सरकारी कंपनी एनटीपीसी यानी (नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन) के साथ गैस की आपूर्ति का एक समझौता किया. वर्ष 2004 में हुए समझौते के मुताबिक रिलायंस अगले 17 सालों तक एनटीपीसी को 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने पर सहमत हुआ. उस समय विश्व में कहीं भी प्राकृतिक गैस की कीमत इतनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए सरकार और रिलायंस की तरफ से कहा गया कि यह समझौता चूंकि अगले 17 सालों के लिए है तो इससे एनटीपीसी को ही लाभ होगा, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत.

केंद्र में सरकार बदलते ही हालात रिलायंस के ही पक्ष में हो गए. यानी दोनों हाथों से लूटते रहो. रिलायंस ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 2005 में गैस उत्पादन की कीमतों में बढ़ोतरी का हवाला देते हुए एनटीपीसी को प्राकृतिक गैस की सप्लाई करने से मना कर दिया और मौजूदा राष्ट्रपति और तत्कालीन सांसद, प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली समिति ने तुरंत गैस का मूल्य 4.2 डॉलर प्रति यूनिट बढ़ा दी. जबकि 2008 तक ओएनजीसी सरकार को 1.83 डॉलर प्रति यूनिट सप्लाई कर रही थी एनटीपीसी गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटाखटा रही थी तो सरकार रिलायंस के द्वारा देश की प्राकृतिक संपदा लूटने के लिए पहले दोगुणा औऱ फिर चार गुणा ज्यादा दाम देने पर राजी हो गई थी. ऐसे में सरकारी कंपनी एनटीपीसी की हालत को कोई सामान्य बुद्धि का आदमी भी समझ सकता है कि किस तरह रही होगी.

एक बार लूट का जो सिलसिला चल पड़ा तो यह थमने की बजाये बढ़ता ही गया. सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए रिलायंस ने उत्पादन का स्तर बेहद कम कर दिया और इतना ही नहीं केजी बेसिन के प्राकृतिक गैस के उत्पादन की कीमत अब 14 डॉलर प्रति यूनिट की मांग करने लगा. योजना आयोग के अध्यक्ष, मोंटेंक सिंह अहलूवालिया ने रिलायंस की कीमत पर तुरंत मुहर लगा दी थी और इस बढ़ोतरी में अड़ंगा लगाने वाले पेट्रॉलियम मंत्री, जयपाल रेड्डी का तबादला कर दिया गया. इस तरह से रिलांयस ने अन्य मंत्रियों को अपनी धौंस का अंदाजा दिखा दिया.

यहां कई सवाल खड़े होते हैं. जिनमें से कुछ है, अगर तकनीकी खामियों को रिलायंस 10 सालों से अधिक समय में दूर नहीं कर सका था तो उसने बोली में हिस्सा ही क्यों लिया. क्या उसके पास वित्तीय संसाधन कम थे. सरकार ने तो इसी बहाने से इसमें हिस्सा नहीं लिया कि उसके पास ना तो उचित तकनीकी संसाधन है और ना ही पैसा. भले ही सरकारी कंपनी विदेशों में पेट्रॉलियम पदार्थों की खोज करने में लगी हो, जहां उसे इससे ज्यादा विशेषज्ञता की जरूरत महसूस होती रही है. अगर ऐसा नहीं था तो ब्रिटेन की कंपनी – बीपी ने कृष्णा-गोदावरी इलाके में 7.2 अरब डॉलर की मोटी रकम क्यों झोंक दी थी. क्या उसे इसका अंदाजा नहीं था या वह इन सब परिस्थितियों से अंजान थी. इसके अलावा, जब सरकार ने गैस की मात्रा तय कर दी थी तो उससे कम उत्पादन करने पर केजी बेसिन में रिलायंस का ठेका रद्द क्यों नहीं किया. किसी दूसरी कंपनी को वहां काम का मौका क्यों नहीं दिया गया? आखिर इतनी मेहरबानी किस लिए दिखाई जा रही थी.

एक बार फिर से लोगों की आंखों में धूल झोंकने और निष्पक्ष होने का दिखावा करने हेतु सरकार ने रंगराजजन समिति का गठन कर दिया. जिसने अपनी रिपोर्ट में रिलायंस के कहने के मुताबिक गैस की कीमतों में वृद्धि करने का प्रस्ताव रखा और इसके लिए उसने जापान का उदाहरण दिया. यहां अमेरिका या इस जैसे कई अन्य देश जो सस्ते गैस का उत्पादन करते हैं से तुलना ना करके जापान का उदाहरण देना रिलायंस की मांग को उचित ठहराना था, जबकि सबको पता है कि जापान गहरे समुद्र में गैस निकालता है लेकिन भारत में केजी बेसिन का प्राकृतिक गैस भंडार तो नदी घाटी से निकल रहा था. तो फिर इस तरह की बेतुकी तुलना क्यों की गई.

यहां पर कॉरपोरेट जगत के हाथों खेलने वाले अर्थशास्त्रियों को हम आसानी से समझ सकते हैं. कोई गांवों में 26 रुपये खर्च करने वाले को गरीब नहीं मानता है तो कोई शहरों में 32 रुपये खर्च करने वालों को. इनकी मानसिकता किस कदर गिर चुकी है इसका दो ताजा उदाहरण आप देख व समझ सकते हैं. पहला उदाहरण, उत्तर प्रदेश के मेरठ क्षेत्र में मुजफ्फरनगर दंगे में अपने-अपने घरों को छोड़कर शिविरों में रहने वाले बच्चों की मौत पर प्रदेश के मुख्य सचिव का यह कहना कि ठंड से कोई नहीं मरता है, निमोनिया या इसी तरह के लक्षण जरूर विकसित हो जाते हैं. अगर ठंड से लोग मरते तो विश्व के सबसे ठंडे क्षेत्र साइबेरिया में कोई जिंदा नहीं बचता. देखिए संवेदनहीनता की पराकाष्ठा. ये यही लोग थे, जो चुनावों के समय इन शिविरों में जाकर उनकी हर मांगें पूरी करने व समय पर मदद का भरोसा दिया करते थे. खैर, दूसरा उदाहरण देखिए. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार अभी बनी नहीं कि सचिव स्तर के अधिकारीगण या तो ट्रांसफर ले रहे हैं या अपने सचिवालय के पुराने कागजों को फाड़ रहे हैं. अगर, आपने कुछ गलत नहीं किया तो भैया डर कैसा!! तो क्या पिछले 15 सालों से आपने इसी आधार पर सरकार बनाई कि तुम भी खाओ और हमें भी खाने दो. जिसकी पोल खुलने की उम्मीदें अब पहले से बढ़ गई है, क्योंकि इन्हीं वादों पर तो जनता ने आप को जिताया है. अगर वो अपने किए गए वादों में से थोड़े भी पूरा करने का प्रयास करती दिखती है तो जनता उन्हें सर-माथे पर बिठायेगी वरना जैसा कि पहले से होता आया है, वैसा फिर से होगा और छह महीने में कोई और सरकार आयेगी और वो फिर चुन चुनकर बदला लेगी.

निष्पक्षता का दावा करने वाली कांग्रेस सरकार की इंतिहा तो देखिए कि रंजराजन समिति ने सरकार को अपनी सिफारिश में गैस की कीमत को मौजूदी स्तर से दोगुणा बढ़ाते हुए 8.8 डॉलर प्रति यूनिट करने का प्रस्ताव दिया. फिर, सरकार ने थोड़ी रहमी दिखाते हुए रिलायंस को 8.4 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस के दाम वसूलने की मंजूरी दे दी.

रिलायंस को मिलने वाली गैस की कीमत पूरी दुनिया में सबसे अधिक है. अंदरखाने जले पर सरकार ने नमक यह कर दिया कि रुपये की घटती कीमतों को देखते हुए सरकारी कंपनियों को संरक्षण देने के बजाए रिलायंस को किया जाने वाला भुगतान डॉलर में कर दिया है. इस तरह से एक और लूट की छूट.

इस बीच, संसद में एक मात्र आवाज जो उठी थी वह थी गुरुदास दास गुप्ता की, उन्होंने गैस की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर पीएम को पत्र लिखा, लेकिन विपक्षी पार्टियां खासकर भारतीय जनता पार्टी का रुख तो इस पर एकदम से हैरान करने वाला रहा है. नरेंन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में सरकार बनाने का सपना संजोये इस दल के लिए आम आदमी को होने वाली परेशानियों का कोई खास मतलब नहीं है. क्योंकि चंदे के तौर पर कॉरपोरेट जगत से जो मोटा पैसा मिलता है उस पर रोक लग जायेगी. तभी तो ये पार्टियां कभी भी खुलकर काले धन और कॉरपोरेट-नेता गठजोड़ पर बात नहीं करना चाहती हैं. इस देश के विकास में बाधक और भ्रष्टाचार का यह एक बड़ा कारण है.

यह सब बातें इसलिए उछल रही है कि एक बार फिर से गैस की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी गई है. जबकि पाठकों को याद होगा कि यही कांग्रेस सरकार थी जिसने कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पेट्रॉल की कीमतों में 3 रुपये की कमी कर दी थी और फिर चुनाव में जीतते ही फिर से वही पुराना सिलसिला.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    मोदी,भा ज पा , आम आदमी पार्टी के खिलाफ कोई जाँच करनी हो तो उसकी बात कीजिये, शीघ्र कार्यवाही की जायेगी.जहाँ कांग्रेस के खुद के हाथ रंगे हों उसे नजरअंदाज कर दीजिये’

  2. मोदी,भा ज पा , आम आदमी पार्टी के खिलाफ कोई जाँच करनी हो तो उसकी बात कीजिये, शीघ्र कार्यवाही की जायेगी.जहाँ कांग्रेस के खुद के हाथ रंगे हों उसे नजरअंदाज कर दीजिये'

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: