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By   /  December 28, 2013  /  No Comments

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-संजोग वाल्टर ||
28 दिसंबर 2013 सर्द,अलसाई सुबह थी ,यह यकीन ही नहीं हुआ की “फारुख शेख”: नहीं रहे

“फारुख शेख” उर्फ़ मुस्तफा शेख महज़ 65 साल के थे उनकी मौत 27 दिसंबर 2013 की रात हृदय गति रुकने से हुई. तबीयत बिगड़ने के बाद फारुख शेख को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन वहां उनकी मौत हो गई.faukh shekh
उनकी आखिरी फिल्म ‘क्लब 60′ थी, जो 6 दिसंबर को रिलीज़ हुई थी. फारुख शेख ने कई फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय की छाप छोड़ी.’चश्मेबद्दूर’ ‘बाज़ार’ ‘उमराव जान’ फारुख शेख ने हर जगह अपनी एक अलग पहचान बनाई. लाहौर, ‘कथा’ ‘नूरी’ ‘गरम हवा’ ‘साथ−साथ’ उनकी यादगार फिल्में है.लाहौर’ फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. उन्होंने टेलीविजन शो ‘जीना इसी का नाम है’ जैसा शो भी किया, जिसने काफी लोकप्रियता बटोरी. फारुख शेख ने कई स्टेज परफॉर्मेंस भी दिए, जिसमें ‘तुम्हारी अमृता’ खासा मशहूर हुआ.
गौरतलब है कि फारुख शेख का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के अमरोली में हुआ. फारुख शेख ने रुपा जैन से शादी की थी. उनकी दो बेटियां हैं, शाइस्ता और सना.
अभिनेता फारुख शेख ऐसे कलाकारों में शुमार हैं जो बड़े और असाधारण श्रेणी के फिल्मकारों की फिल्मों में एक खास किरदार के लिए पहचाने जाते हैं या फिर उसी खास किरदार के लिए बने हैं. ऐसे अभिनेता पर्दे पर केवल अभिनय नहीं करते बल्कि उस अभिनय को जीते हैं. ऐसे किरदार ही आपके जहन में इतना प्रभाव छोड़ जाते हैं कि आप उन्हें लम्बे समय तक याद रखते हैं. सहज और विनम्र से दिखाई देने वाले फारुख शेख ने अपने समय के चोटी के निर्देशकों के साथ काम किया है. उन्होंनेसागर सरहदी सत्यजित रे,केतन मेहता हृषिकेश मुखर्जी, मुजफ्फर अली, , सई परांजपे, जैसे फिल्मकारों का अपने अभिनय की वजह से दिल जीत लिया.

इसी महीने 6 दिसंबर को उनकी फिल्म क्लब 60 आई थी, यह उनकी अंतिम फिल्म साबित हुई. अपने कॅरियर की शुरुआत फारुख ने थियेटर से की थी. उन्होंने सागर सरहदी के साथ मिलकर कई नाटक भी किए हैं. बॉलीवुड में उनकी पहली बड़ी फिल्म ‘गरम हवा’ थी जो 1973 में आई थी. फिर उसके बाद सत्यजित रे के साथ ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की. शुरुआती सफलता मिलने के बाद फारुख शेख को आगे भी फिल्में मिलने लगीं जिसमें 1979 में आई ‘नूरी’, बाज़ार1982 , 1981 की चश्मे बद्दूर जैसी फिल्मे शामिल हैं.
गमन का गुलाम हुसैन,अंजुमन का साजिद रंग बिरंगी के प्रो जीत सिंह जैसे किरदार किये तो नहीं लगा की यह फारुख शेख है इस कद्र डूब जाते थे वो अपने किरदारों में.
दीप्ति नवल के साथ उनकी गज़ब कैमिस्ट्री थी दोनों ने कई फिल्में की इसमें चश्मे बद्दूर, साथ-साथ, कथा, रंग-बिरंगी आदि प्रमुख हैं.

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  • Published: 4 years ago on December 28, 2013
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  • Last Modified: December 28, 2013 @ 12:04 pm
  • Filed Under: मनोरंजन

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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