/अब असली परीक्षा की घड़ी है केजरीवाल एंड पार्टी की…

अब असली परीक्षा की घड़ी है केजरीवाल एंड पार्टी की…

-हरेश कुमार||

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने छह अन्य मंत्रियों से साथ शपथ ले ली है. इस शपथ ग्रहण समारोह की अनोखी बात यह रही कि यह रामलीला मैंदान में आयोजित किया गया था और शपथ ग्रहण करने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के सदस्यों ने सार्वजनिक परिवहन मेट्रो का उपयोग किया और दिल्ली के लिए ऐसा पहला अवसर था जब किसी मुख्यमंत्री ने पहली बार अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों के साथ खुले मैंदान में जनता के बीच शपथ ली. केजरीवाल के साथ छह अन्य नवनिर्वाचित विधायकों  – मनीष सिसौदिया, सौरभ भारद्वाज, गिरीश जोशी, राखी बिरला, सत्येंद्र जैन और सोमनाथ भारती ने मंत्री पद की शपथ ली. दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ने इन सबको मंत्रीपद की शपथ दिलाई.oath of cm by kejriwal

शपथ लेने के बाद अरविंद केजरीवाल ने उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि दो साल पहले ऐसा सोचना मुमकिन नहीं था और यह आम आदमी की जीत है. यह शपथ दिल्ली की जनता ने ली है और हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि हम अकेले सब कर सकते हैं लेकिन दिल्ली की जनता मिलकर सारी समस्याओं का समाधान निकाल सकती है.

गौरतलब है कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है और एक नई पार्टी के उदय ने सबको हैरान व अंदर से झकझोंर कर रख दिया. किसी को इसका अंदाजा नहीं था कि महज एक साल के अंदर में ही आम आदमी पार्टी (आप) एक बड़े दल के तौर पर ना सिर्फ उभरेगी बल्कि पहले से स्थापित पार्टियों – कांग्रेस और भाजपा को इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा, कांग्रेस की तो लुटिया ही डूब गई. कहां तो वह 15 सालों से दिल्ली पर राज कर रही थी तो कहां 15 सालों तक पार्टी की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित तक को चुनाव हारना पड़ा. उन्हें आप के संस्थापक, अरविंद केजरीवाल ने नईदिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त दी. इसके अलावा, कई वरिष्ठ मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा और 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के मात्र 8 प्रत्याशी ही चुनाव जीतकर आ सके. वहीं आप को 28 सीटों पर जीत मिली तो भाजपा को 32 और एक सीट जेडीयू को तो एक सीट निर्दलीय को मिला.

शपथ ग्रहण समारोह में ना तो अन्ना हजारे और ना ही उनका कोई नजदीकी ही दिखाई पड़ा. वैसे तो अरविंद केजरीवाल ने किसी को व्यक्तिगत तौर पर बुलावा नहीं भेजा था, लेकिन अन्ना हजारे, कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त, संतोष हेगड़े और किरण बेदी जैसे पुराने सहयोगियों को उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए निजी तौर पर आमंत्रण दिया था. इन सबके बावजूद अन्ना हजारे ने अपने स्वास्थ्य का बहाना बनाया तो किरण बेदी भी अपने निजी कारणों का हवाला देते हुए नहीं आई तो संतोष हेगड़े ने उन्हें शुभकामना संदेश दिया.

ये वही किरण बेदी हैं जिन्हें अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास ने पहले नईदिल्ली विधानसभा क्षेत्र में शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया था तथा उनसे पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने की भी घोषणा की थी. लेकिन हाल की स्थिति से दो साल पहले अन्ना के साथ आंदोलन में कदम से कदम मिलाकर चलने वाले लोगों में एक तरह से स्पष्ट विभाजन दिख रहा है. विधानसभा का परिणाम आने के बाद पहले तो अन्ना ने केजरीवाल को बधाई संदेश दी लेकिन फिर ना जाने क्या हुआ कि सारा परिदृश्य ही बदल गया. या तो अन्ना के साथ जो लोग खड़े हैं वे उन्हें गलत तरीके से हैंडल कर रहे हैं या उन्हें ऐसा लगता है कि केजरीवाल ने उनके आंदोलन का व्यक्तिगत तौर पर लाभ लिया. कुछ भी हो, देश के लोगों को राजनीतिक गंदगी साफ होने का भरोसा थोड़ा ही सही जाग तो उठा है. तभी तो राजनीतिक दलों में हड़ंकप मचा हुआ है. नहीं तो स्थापित राजनीतिक दल इस तरह से एक नई पार्टी को मौका देने और सीखने के बजाये अपने निम्न स्तर को जनता के सामने ना लाते.

अब जबकि केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल ने शपथ ले ही लिया है तो सबसे पहले उनके सामने अपने उन वादों को पूरा करने की चुनौती है जो उन्होंने दिल्ली की जनता के साथ किया है. देश के लोग बडी ही बेसब्री से इसे पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं.

दिल्ली की जनता को बिजली-पानी के बढ़ते बिल और महंगाई से निजात दिलाना आप पार्टी की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. उसके बाद जनलोकपाल बिल को पास करना भी पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल है. लेकिन इसके साथ दिक्कत यह है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं होने के कारण उसे कदम-कदम पर केंद्र सरकार से सहयोग लेना होगा, जिसके मिलने की उम्मीद कम ही है. कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को रोकने के लिए मन मारकर भले ही आप को अपना समर्थन दे दिया हो लेकिन ना तो इसके विधायक औऱ ना ही कार्यकर्ता कभी चाहते हैं कि आप पार्टी अपने वादे पूरे करे, क्योंकि उसे डर है कि जिस पार्टी को वे समर्थन दे रहे हैं वह उसकी जड़ ना खोद दे.

और देखिए किस तरह का संयोग है कि 28 दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना के 128 साल पूरा होने को है औऱ महज 28 सीटों वाली पार्टी ने उसे एकदम से जड़ से हिला कर रख दिया है. तभी तो इसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी आप से सबक सीखने को कह रहे हैं, भले ही यह एक सार्वजनिक वक्तव्य ही हो और हकीकत से इसका लेना-देना नहीं हो. क्योंकि अभी भी कांग्रेस के नेता वीवीआईपी कल्चर को ही अपनी प्राथमिकता दे रहे हैं.

अभी कल ही एक निजी चैनल ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में कांग्रेस के पांच विधायकों को बेनकाब किया है जिसमें कांग्रेस के ये विधायक आप के नेता और संयोजक, केजरीवाल को कभी बंदर तो कभी उनके बाप को गाली दे रहे थे. तो दसरी तरफ, भाजपा के नेता केजरीवाल के नार्को टेस्ट की बातें कर रहे थे. देश के लोग यह सब देख-सुन रहे हैं.

पहले तो कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन की बात कही और फिर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जिस तरह से शर्त के साथ समर्थन की बात कही और उसके बाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, जयप्रकाश अग्रवाल जैसे नेताओं का तल्खी भरा बयान आया, इससे जिस किसी को संदेह था वह दूर हो गया है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तरह व्यवहार कर रहे हैं. क्या यह सही नहीं है कि भातीय जनता पार्टी को दिल्ली की जनता ने 32 सीटें देकर उसे सरकार बनाने का मौका दिया था और उसे बनाना चाहिए था लेकिन अपने को पाक-साफ दिखाने के चक्कर और लोकसभा को नजदीक देखते हुए उसने अपने हाथ पीछे खींच लिए. वरना चार विधायकों को तोड़ना पार्टी के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी. कांग्रेस के 8 विधायकों को देखते हुए यह असंभव भी नहीं था. क्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और कर्नाटक में आपने पहले ऐसा नहीं किय था क्या?

अरे भाई, कुछ समय तो पार्टी को काम करने को दो फिर आपको जो चाहे वो आप कहें, फिर जनता भी आपका साथ देगी. किसी को काम के लिए समय देने के बजाये उसे पहले ही टार्गेट करना कहां का न्याय है. प्राकृतिक नियमों का यही तकाजा है कि अगर जनता ने किसी को अपना मत दिया है तो उसे अपने वादों को पूरा करने का समय दीजिए और समर्थन भी. वरना जनता आपको अच्छी तरह से बिना सर्फ-साबुन के धो डालेगी और वो भी बिना मेहनत के. फिर आप सफाई देते फिरोगे की आपका कहने का यह मतलब नहीं था. आपने तो यह कभी कहा ही नहीं. अरे आज ना सिर्फ सोशल मीडिया का जमाना है बल्कि आपके स्टिंग जनता के सामने हैं.

अभी तो सरकार बनी नहीं कि सब देख रहे हैं कि किस तरह से सचिव स्तर के अधिकारियों में खलबली मची हुई है और वे अपना तबादला कराने में जुट गए हैं. हाल ही में नियुक्त किए गए दिल्ली प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली के पूर्व कार्यालय में तो पुराने फाइलों से कागजों को निपटाया जा रहा था. इसे सबने कैमरे से देखा है. जल बोर्ड के कर्मचारियों का नाश्ता का बिल करोड़ों में है इसे तो खुद वहां के कर्मचारियों ने ही स्वीकार किया है. सभी जानते हैं कि सरकारी अस्पतालों और स्कूलों का क्या हाल है. हर जगह निजी क्षेत्र का बोलबाला है, आखिर ऐसा क्यों है? क्यों दिल्ली में सरकार गठन के कुछ समय पहले ही गैस के दामों में बढ़ोतरी का फैसला ले लिया जाता है. क्यों नहीं नई सरकार पर इसके फैसले लेने का इंतजार किया जाता है?

सबको पता है कि यह सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है. लेकिन कांग्रेस के एक विधायक के अनुसार, हम उन्हें साल, दो साल का मौका देंगे. तभी तो जनता के बीच में जायेंगे और कहेंगे कि इतना समय देने के बाद भी देखो इन्होंने अपने वादों को पूरा नहीं किया है. ये तो शुरू से आपको बरगला रहे थे. इनकी मंशा तो सिर्फ सत्ता में हिस्सेदारी की थी. दिन में तारे दिखाना और शासन करना अलग-अलग बातें हैं. वगैरह-वगैरह. सबको कांग्रेस का इतिहास मालूम है. किस तरह से चौधरी चरण सिंह, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल की सरकार गिराई और किस तरह से मनमोहन सिंह को अपना पीएम बनाए हुए हैं. इस पर विस्तार से प्रकाश डालने की जरूरत नहीं है. सो जितना वक्त मिले बस जनता को यह जरूर दिखना चाहिए कि आम आदमी पार्टी ने ईमानदारी से प्रयास किया था ना कि वो भी अन्य पार्टियों की तरह ही है या जैसा कि भाजपा कहती रही है कि वह कांग्रेस की बी पार्टी है. अब तो केजरीवाल एंड पार्टी को काम करके दिखाना होगा. क्योंकि वादे तो बहुत हो चुके हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.